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सनातन धर्म और हम

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सभी सनातनियों के लिए पवित्र पावन सनातन धर्म के चार पीठों में से एक श्री द्वारिका पीठ है। श्री द्वारकाधीश मन्दिर, द्वारका, गुजरात। यह मन्दिर लीलाधर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है। यह स्थान द्वापर में यशोदानंदन भगवान श्री कृष्ण की राजधानी थी और आज कलयुग में भक्तों के लिए महा-तप तीर्थ है। गोमती नदी के तट पर स्थित द्वारका को आध्यात्मिक विशिष्टता प्राप्त है। श्री द्वारकाधीश मन्दिर पाँच तल वाला दिव्य भवन तथा ७२ स्तंभों द्वारा समर्थित है, जिसे जगत मन्दिर या त्रिलोक सुन्दर (तीनों लोको में सबसे सुन्दर) मन्दिर के रूप में जाना जाता है। पुरातात्विक साक्ष्यों द्वारा बताया गया है कि यह मन्दिर २२०० वर्ष प्राचीन है। १५वीं-१६वीं सदी में मन्दिर का विस्तार एवं सौंदर्यीकरण हुआ था। आठवीं शताब्दी के हिन्दू धर्मशास्त्रज्ञ और दार्शनिक जगतगुरु श्री आदिशङ्कराचार्य के द्वारा पीठ स्थापना के पश्चात यह मन्दिर भारतवर्ष में सनातनियों द्वारा पवित्र माना गया ‘चार धाम’ तीर्थ का पवित्र अंग बन गया। अन्य तीनों में रामेश्वरमपीठ,  बद्रीनाथपीठ, और पुरीपीठ, सम्मिलित हैं। मन्दिर के आसपास की अन्‍य कलात्‍मक संरचनाओं का निर्मा...

सनातन धर्म और हम

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सनातन संस्कृति के किसी भी शिला खण्ड को आप देखेंगे तो पाएँगे कि उस में निर्मित शिल्प पर एक सम्पूर्ण ग्रन्थ लिखा जा सकता है। यह शिल्प बादामी गुफा, बादामी जिला, बागलकोट, कर्नाटक में है। (चित्र - साभार) इस मूर्ति के अंगविन्यास, भाव भंगिमाएँ, आभूषणों और चित्र अलंकरणों को देखकर इसके निर्माण और निर्माण कार्य से पूर्व परिकल्पना और प्रबंध के बारे में अनुमान लगाएँ। आप इस अनुमान की कल्पना मातृ से मन्त्रमुग्ध और अचंभित होकर रह जाएंगे। शिल्पकार ने इतने आकर्षक रूप में कटाव और कमनीता की परिकल्पना कैसे किया होगा। ध्यान रखें उस समय ना कंप्यूटर था और ना ही ग्राफिक डिजाइनर। अनायास ही इसे देखने पर जीवित होने का भ्रम उत्पन्न होता है। इस मूर्ति में देवी एक हाथ से बालक के सिर को सहला कर वात्सल्य प्रकट कर रही है तो दूसरे हाथ से तोते को दाना चुगा रही है। कितना जीवन्त और भावपूर्ण है यह शिल्प। सनातनी शिल्पकार ने जिस निपुणता और सटीकता ने इसे निर्माण किया है कि देखकर मन पुलकित हो जाता है। नमन है उन सनातनी पूर्वजों को जिन्होंने इसे निर्मित किया है और यह सहस्रों वर्षों पश्चात भी अपने पूर्ण आकर्षण में शोभायमान है। अत...

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अद्वितीय, अकल्पनीय, अद्भुत शिल्प जिसे हमारे सनातनी पूर्वजों ने अपने हाथों से निर्मित किया है। जैसा कि वामपंथी इतिहासकार ने ताजमहल, क़ुतुबमीनार को मुगलों का बनाया हुआ बताता रहा है, क्या  ऐसा एक भी उदाहरण इस प्रतिमा के जैसा समकालीन मुगलों के देशों में बना हुआ दिखा सकता है?? इस दिव्य शिल्पकला को वामपंथियों, गुलाबों के वंशजों ने इतिहास से ही मिटा दिया है। यह मुग्ध करने वाली वाद्ययंत्र सह देवी की मूर्ति श्री चेन्नाकेशवा मन्दिर, बेलूर, कर्नाटक में है। (चित्र - साभार) इसके जैसा आभूषणों, नैन - मुखाकृति, और भाव-भंगिमाओं का जीवंत प्रदर्शन अन्य किसी मूर्ति में दृष्टिगोचर नहीं होता। इसके नयनों, भाल, चिबुक, बिरौनियों, ओष्ठों, नासिका के गढ़न, स्कंधों के ढलान, कमर की कमनीयता, उंगलियों के घुमाव को ध्यान से देखें तो आप शिल्पकार के कला निपुणता और दक्षता से चमत्कृत हो जाएंगे। इस वाद्ययंत्र के तार तक को पाषाण से ही निर्मित किया गया था, जो अब खंडित हो गया है। और यह ध्यान रखें कि कि यह संपूर्ण निर्माण जोड़ रहित अखण्ड पाषाण शिला से ही किया गया है तो कितनी सावधानी बरतनी पड़ती होगी.?? कितनी कुशलता पूर्वक एक...

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मानता हूँ कि यह सम्भव है और ऐसा किया भी गया है कि... सनातनियों को म्लेच्छों द्वारा बल प्रयोग कर के, अनैतिक रूप से, यातना एवं प्रताड़ना देकर..  मन्दिर से बाहर निकाल दिया जा सकता है.. परन्तु.. क्या कोई भी विधर्मी शक्ति सनातनियों के हृदय से मन्दिर को निकाल सकता है.?? अतिप्राचीन दत्ता मन्दिर के साथ भी यही हुआ है। यह मन्दिर कश्मीर में आज जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। मान्यता है कि इस मन्दिर का निर्माण पांडवों के द्वारा किया गया था। विधर्मियों ने इस मन्दिर को अपवित्र और नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। आज भी इसके अपवित्र होने की पीड़ा सनातनियों के हृदय में है। आज भी सनातनी इस प्रतीक्षा में हैं कि इनका कभी तो जीर्णोद्धार होगा। क्या कभी पुनः कोई पुष्यमित्र शुंग जन्म लेगा...?? अनुतरित्त प्रश्न....!!! श्री दत्ता मन्दिर, उरी, कश्मीर। (चित्र-साभार) वैभवशाली सनातन धरोहर के भग्नावशेष...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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इस चिर प्रतीक्षा में बैठे नन्दी महाराज के चित्र को zoom करके ध्यान से देखें.!! क्यों.!!! अचम्भित हो गए.?? चौंक गए.?? क्या इस नन्दी महाराज के गहने और आभूषणों में कोई त्रुटि दिखाई देती है.?? अब एक बार स्वयं कल्पना करें.... विचार करें... चिंतन करें.. कि क्या इतनी सूक्ष्म कलाकारी मात्र "छेनी-हथौड़ी" से सम्भव है (उस समय तक आधुनिक लेजर तकनीक उपलब्ध नहीं था).?? यदि इतनी सटीकता और सम्पूर्णता छेनी से बनाया जा सकता है तो आज इस जैसा निर्माण क्यों हो पा रहा है.?? इस नन्दी महाराज की सम्पूर्णता का अनुमान लगाने हेतु इसके मुखाकृति, नासिका छिद्र, खूर, पाँव के घुमाव पर ध्यान दें आप इसके जीवंतता से स्वयं प्रभावित हो जाएँगे। सत्य तो तो यह है कि वामपंथी इतिहासकारों ने षड़यंत्र और सनातनियों को हीन दिखाने के उद्देश्य से ही हमसे झूठ बोला। हमारी सनातन सभ्यता प्राचीन काल में वर्तमान समय से कहीं अधिक उन्नत थी। गर्व करें कि हमारे सनातनी पूर्वजों की थाती आज भी अपने गौरवगाथा को विश्व को सुनाने और दिखाने में सक्षम है। एक बात और.. यह नन्दी महाराज एक ही अखण्ड पाषाण शिला से निर्मित किया गया है। इसमें कोई जोड़ न...

सनातन धर्म और हम

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नाम/संज्ञा कभी कभी कितना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देश की राजधानी में खड़े होकर यदि आप किसी से पूछें कि "विष्णु स्तम्भ" कहाँ है तो स्यात १ प्रतिशत लोग भी नहीं बता पाए कि यह राजधानी क्षेत्र में है भी कि नहीं.!?! वास्तव में इन्द्रप्रस्थ के "विष्णु-स्तम्भ" को इसके वास्तविक नाम और रूप में रहने ही कहाँ दिया गया.! म्लेच्छों के अवैध अतिक्रमण के पश्चात तो इसे दिल्ली का कुतुबमीनार कहा जाने लगा। विचार करने की बात है कि जब गुलाम कुतुबुद्दीन मात्र चार वर्ष ही राज कर पाया तो उसने इस अद्भुत कृति का कैसे निर्माण करवा दिया.?? परन्तु यहाँ एक अन्य "विष्णु-स्तम्भ" की बात करते हैं.... इस विष्णु-स्तम्भ को "कीर्ति-स्तम्भ" के नाम से भी ख्याति प्राप्त है। राजपुताना शासकों में राणा कुम्भ सबसे पराक्रमी और शौर्यशाली राणा रहे हैं। राणा कुम्भा ने महमूद खिलजी को धरती पर नाक रगड़वा कर १४४८ में पराजित कर दिए थे। महमूद खिलजी पर अपने विजय को राणा कुम्भा ने भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित कर इस विजय के स्मृति में इस "कीर्ति-स्तम्भ" का निर्माण करवाये थे। यह कीर्ति-स्...

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प्रभु भोलेनाथ के शिवालय में शिवलिङ्गम के सामने से भगवान शिव के गण नन्दी ही अनुपस्थित रहें ऐसा कोई कल्पना कर सकते हैं क्या.?? सामान्य रूप में ऐसा सम्भव नहीं है। किन्तु आर्यावर्त में एक ऐसा शिव मन्दिर है जहाँ नन्दी महाराज अनुपस्थित हैं। और इसके पीछे एक अद्भुत पौराणिक कथा है। दक्ष प्रजापति के पुत्री का विवाह भगवान शिव के संग सम्पन्न हुआ था। परन्तु जब भगवान शिव दक्ष प्रजापति के चरण स्पर्श नहीं किए तो दक्ष प्रजापति इसे अपना अपमान समझ बैठे थे। जब दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया तो सभी देवताओं, ऋषियों आदि को आमंत्रित किया परन्तु भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण पत्र नहीं भेजा गया। माता सती पति की अनिच्छा की अवहेलना कर भी नन्दी महाराज पर सवार होकर अपने पिता के घर यज्ञ स्थल पर गईं। किन्तु वहाँ अपने पिता दक्ष प्रजापति और कुछ कुपात्र लोगों द्वारा अपने पति देवाधिदेव महादेव के अपमान को सहन नहीं कर पाईं। यज्ञ स्थल पर ही देवी सती ने योगाग्नि में आत्मदाह कर लिया। इसकी सूचना मिलने पर भगवान शिव सती वियोग में कुपित और विह्वल हो गए। रुद्र अंश से वीरभद्र उत्पन्न हुए और यज्ञ विध्वंस कर दक्ष प्रजापति के...