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Showing posts from April, 2026

सनातन धर्म और हम

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सनातनी पूर्वजों के लिए धर्म का स्थान सर्वोपरि रहा था। अपने आराध्य देव के प्रति आस्था और समर्पण उच्चतम स्तर पर होने से ऐसा अकल्पनीय शिल्प का निर्माण सम्भव हो पाया। ये मूर्ति श्री चेन्नाकेशव मन्दिर में स्थित हैं। बेलूर, हसन जनपद, कर्नाटक। (चित्र – साभार) चेन्ना केशव का शाब्दिक अर्थ है "सुन्दर केशव" अर्थात सुन्दर विष्णु/नारायण। चेन्नाकेशव मन्दिर की स्थापना का श्रेय होयसल नरेश विष्णुवर्धन को जाता है जिन्होंने १११६ ई. में चोलों पर अपनी जीत के उपलक्ष्य में इसका निर्माण कराया था। चेन्नाकेशव मन्दिर का निर्माण होयसल साम्राज्य की प्रारंभिक राजधानी बेलूर में यागाची नदी के तट पर किया गया था। चेन्नाकेशव मन्दिर को केशव मन्दिर या बेलूर का विजयनारायण मन्दिर भी कहा जाता है। Zoom करके देखने पर इसमें कोई भी १" ईंच का भाग भी बिना नक्काशी के नहीं है। ध्यान रहे... यह सम्पूर्ण निर्माण बिना किसी विद्युत चालित यंत्रों के स्वहाथों से ही किया गया है। उस लुप्त पाषाण वास्तुशिल्प विधा के बारे में सोचकर ही मन पुलकित हो जता है, रोमांच से भर जाता है। किन्तु दुर्भाग्य से विधर्मियों ने उन दिव्य ज्ञान से प...

सनातन धर्म और हम

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वामजीवियों का कहना है कि आर्यावर्त में "सुई" का भी निर्माण नहीं होता था जबतक कि विधर्मी म्लेच्छों और आँग्ल फिरंगियों ने इस देश में पैर नहीं रखा। उन सनातन द्रोहियों के लिए तो इस पवित्र भूमि पर हर ओर प्रमाण बिखरे पड़े हैं जो किसी "थप्पड़" के जैसे ही उनके मुखमण्डल को रक्तिम करने को पर्याप्त हैं। परन्तु निर्लज्ज को लाज कहाँ आता है। इस नयनाभिरामी वास्तुशिल्प को देखें..!! यह अद्भुत निर्माण आठवीं शताब्दी का माना जाता है। इसे पाण्ड्य शासकों ने बनवाया था, किन्तु किसी अज्ञात कारणवश यह अपूर्ण ही रह गया, कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाया। यह देखने पर किसी पुष्पित-पदम्-पुष्प (कमल के फूल) के सदृश लगता है। इसका निर्माण शैली महाराष्ट्र के अजन्ता कन्दराओं में बने कैलाश मन्दिर से मिलता है। यह अविश्वसनीय श्री वेत्तुवन कोइल मन्दिर, कलुगुमालाई, तमिलनाडु में स्थित है। (चित्र-साभार) तमिलनाडु के थूतुकुड़ी पहाड़ी के एक अखण्ड ग्रेनाइट पाषाण शिला को काटकर यह मन्दिर सृजित किया गया है। इसे देखकर ही उस समय के सनातनी वास्तुशिल्प के तकनीकी उत्कृष्टता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। इसमें बने सूक्...

सनातन धर्म और हम

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सृजनात्मकता का उच्चतम स्तर क्या हो सकता है यह जानना है तो सनातन संस्कृति के शिल्पकला को देखें.!! किसी भी शिल्प को मूर्तरूप देने से पूर्व उसका एक कल्पित चित्र मस्तिष्क में बनाना ही होता है। इस शिल्प को देखें...!! यह सनातनी शिल्पकार पूर्वजों के हाथों निर्मित एक अद्वितीय रचना है। जिसे आज कागज पर उकेरना भी असम्भव ही प्रतीत होता है उसे हमारे सनातनी पूर्वजों ने पाषाण, धातु, हाथीदाँत पर गढ़ कर विश्व को सौंप दिए हैं, वह भी सहस्रों वर्ष पूर्व ही। श्री रंगनाथस्वामी मन्दिर, श्रीरंगम के गोपुरम का यह लघु रूप हाथीदाँत पर निर्मित किया गया है। (चित्र-साभार) यह शिल्प वर्तमान में सैनफ्रांसिस्को के एशियाई संग्रहालय के कला संकाय में सुरक्षित है। ध्यान से इस शिल्प को देखें, कितनी निपुणता से प्रभु शेषशायी, शेषनाग, देवी देवताओं, गणों, ऋषियों, तोरणों, आभूषणों, अलंकरणों, मन्दिर इत्यादि को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है। क्या किसी किताबी पंथ में ऐसा अद्भुत सृजन देखने को प्राप्त होता है.?? नहीं, कहीं नहीं.!! पुनः लौटें सनातन संस्कृति परम्परा की ओर.!! कथित आधुनिकता ने केवल आपसे छीना ही है, दिया कुछ नहीं.!! अकल...

सनातन धर्म और हम

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जिन्होंने भारतवर्ष के सनातन संस्कृति के अद्भुत मन्दिरों का भ्रमण कर दर्शन ही नहीं किया उनके लिए भारतीय वास्तुकला ताजमहल से प्रारम्भ हो कुतुबमीनार पर समाप्त हो जाता है। ये चित्र चेन्नाकेशवा मन्दिर, कर्नाटक के हैं। इस में नर्तकियों की जीवंत मूर्तियों की भाव भंगिमाओं को देख मुग्ध हो जायेंगे। ये हैं सनातन पूर्वजों द्वारा निर्मित अकल्पनीय शिल्प। शिल्पकार के निपुणता और परिश्रम के बारे में सोचकर ही अचंभित हो जायेंगे। क्या यह निर्माण केवल छेनी हथौड़ी से सम्भव है??? विधर्मी आक्रांताओं ने इस रहस्यमयी सनातन कला को मृत कर दिया। इस मूर्तियों से आप मोनालिसा की तुलना करें और निर्णय लें कि कौन सी कलाकृति अतुलनीय है। वमियों कांगियों ने वैभवशाली सनातन धरोहरों की सत्यता छुपाने के निकृष्टतम पाप किया है। अतुलनीय सनातन धरोहर...!!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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आर्यावर्त में अनेक राजकोष रहे थे जिन्हें विधर्मी आक्रांताओं ने लूट लिया था। परन्तु उन्हीं में एक ऐसा भी गुप्त राजकोष रहा है जिसे कोई भी विदेशी नहीं लूट नहीं पाया। क्या आप उसे जानते हैं??? वह गुप्त राजकोष "सोन भण्डार" गुफा के नाम से जाना जाता है। सोन भण्डार गुफा बिहार के राजगीर, नालन्दा में स्थित है। (चित्र - साभार) सोन भण्डार गुफा का इतिहास हर्यक वंश (५४४ - ४९२ ई.पू.) के शासक बिम्बिसार से जुड़ा है। बिम्बिसार ने अपने शासनकाल में एक बड़े पहाड़ को काटकर उसमें कृत्रिम गुफा का निर्माण कराया था। उस गुफा में अपने बहुमूल्य संपदाओं को छुपा कर रख दिया था। इस गुफा का नाम सोन भण्डार पड़ा था। इस गुफा में दो कोठरी बनवाया गया था। एक में धन सम्पदा (स्वर्ण/माणिक्य आदि) रखा गया था और दूसरे कोठरी में उसकी सुरक्षा करने हेतु सैनिकों के रहने की व्यवस्था थी। इस गुफा को एक विशाल पाषाण खण्ड से ढंक दिया गया था। फिरंगी अंग्रेज़ों ने परतंत्रता के समय इस सोन भण्डार को खोलने के लिए इस पर तोप के गोले दागे थे। तोप दागने के चिह्न आज भी यहाँ विद्यमान हैं और उसे देखे जा सकते हैं। पर अंग्रेज लाख प्रयास के उपरां...

सनातन धर्म और हम

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सनातन धर्म संस्कृति के गूढ़ रहस्यों को अनावृत करना आज के आधुनिक विज्ञानियों के लिए असम्भव ही प्रतीत होता है। अनेक अबूझ पहेली हैं जो आधुनिक विज्ञानियों को चकित कर रहे हैं। ऐसा ही एक रहस्यमयी श्री अचलेश्वर महादेव मन्दिर हैं। यह मन्दिर धोलपुर, राजस्थान में स्थित हैं। (चित्र – साभार) श्री अचलेश्वर महादेव मन्दिर भारतवर्ष के सबसे पुरातन मन्दिरों में से एक हैं। इसका इतिहास ढाई सहस्र वर्षों से अधिक प्राचीन है। इस मन्दिर के रहस्यमय शिवलिङ्गम का रङ्ग दिन में तीन बार प्रवर्तित हो जाता है। इस शिवलिङ्गम का रङ्ग पूर्वाह्न में लाल, मध्याह्न में केशरिया व अपराह्न में श्याम (काला) रङ्ग का हो जाता है। समय के साथ इनके स्थिति में भी कुछ परिवर्तन होते हैं। इनके निर्माण कर्ता के पाषाण ज्ञान की कल्पना मात्र से रोमाञ्च अनुभव होता है। ध्यान रखें सनातनियों के मन्दिर केवल आराधना पूजन स्थल ही नहीं थे बल्कि अनुसंधान के उच्च केन्द्र थे। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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जो लोग कहते हैं कि विश्व में केवल ७ आश्चर्य (WONDERS) हैं वो सम्पूर्ण आर्यावर्त में निर्मित सनातन मन्दिरों, महलों, भवनों, स्मारकों इत्यादि को समग्रता में देखा ही नहीं है। नहीं तो ७०००००००००००००००००००००००००१ आश्चर्य तो आर्यावर्त में ही मिल जाएंगे। ये श्री सुब्रमण्यम स्वामी मन्दिर, मरुधमलाई, कोयम्बटूर हैं। (चित्र – साभार) Zoom करके देखने पर इसमें विस्मयकारी मूर्ति कला का दर्शन होता है। कितना श्रमसाध्य रहा होगा इतनी सूक्ष्मता से मूर्तियों का जीवंत निर्माण.!!! निर्माण कार्य तो दूसरे या तीसरे चरण में आरम्भ किया जाता है।  सबसे पहले तो इस मन्दिर के प्रारूप की जिसने परिकल्पना की होगी उसके मानसिक और बौद्धिक क्षमता के उत्कृष्टता का अनुमान लगाएं.! कितने उच्च स्तर का यह शिल्पकला और स्थापत्य कला का आदर्श उदहारण है। आज विज्ञान इतना आधुनिक और विकसित हो गया है तो भी इसकी प्रतिकृति बनाना असम्भव सा प्रतीत होता है। सनातनी पूर्वजों के विलक्षण प्रतिभा और कला की निपुणता पर गर्व है। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय षण्मुख स्कन्द कार्तिकेय स्वामी 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा ...

सनातन धर्म और हम

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चमत्कार देखने हेतु सनातनी दृष्टि चाहिए ना कि वामजीवियों की दूषित दृष्टि। सनातनी चमत्कार तो एक ढूंढो सहस्र मिलेंगे.! अनिवार्यता है सनातनी दृष्टि की क्योंकि वामजीवियों ने तो सनातनी गौरव/शौर्य/संस्कार/पवित्रता का सत्यानाश करने में कोई कमी नहीं छोड़ा है। यह अद्भुत दृश्य श्री सप्तेश्वर महादेव का है। इस अतिप्राचीन शिवलिङ्गम का अभिषेक सप्त (सात) धाराएँ अनवरत करती रहती हैं। अतः इसे सप्तेश्वर महादेव कहा जाता है। ये निरंतर गिरने वाली सप्त धाराएँ किस श्रोत से आती हैं, इसका उद्गम स्थल क्या है, यह आज भी रहस्य बना हुआ है। एक अद्वितीय विशिष्टता है कि ऋतु ग्रीष्म हो या शरद ऋतु या शिशिर ऋतु शिवलिङ्गम पर गिरने वाले जल के तापमान में कोई अंतर नहीं होता है। यह जल सदैव स्वच्छ और शीतल ही बना रहता है। क्यों है ना अचंभित करने वाली बात.??? पौराणिक कथाओं के अनुसार यह साढ़े तीन सहस्र वर्षों से सभी अनुसंधान को धता बताते हुए एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है। यह अलौकिक दृश्य श्री सप्तेश्वर महादेव मन्दिर, साबरकांठा जनपद, गुजरात में है। (चित्र – साभार) इस दुर्लभ दृश्य से युक्त महादेव मन्दिर बीजापुर के निकट साबरमती नदी के तट ...

सनातन धर्म और हम

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आर्यावर्त के मन्दिरों, भवनों, राजप्रासादों, धर्मस्थलों को देखकर यह लगता है कि विश्व के "वंडर्स/wonders" का निर्णय वास्तविक प्रतिष्ठानों को देखकर नहीं अपितु किसी "वातानुकूलित कोठरी" में बैठकर किया गया है, तभी तो बस एक तेजोमहालय ही इसमें स्थान बना पाया। अकल्पनीय वास्तुशिल्प का निर्माण क्या होता है यह आज भी विश्व को सनातन धर्म से ही सीखना पड़ेगा। इस छवि में निर्मित मन्दिर को ध्यान से देखें और सोचें कि जिस स्थान पर मनुष्य का पहुँचना भी दुःसह है वहाँ इतने भव्य मन्दिर का निर्माण सनातनी पूर्वजों ने किस प्रकार किए होंगे.!! यह श्री संजीवराय पेरुमल मन्दिर, एरुमापट्टी प्रखंड, नमक्कल जनपद, तमिलनाडु में स्थित हैं। यह सिरागिरी पहाड़ी पर भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित मन्दिर है। इस अकल्पनीय मन्दिर का निर्माण सत्रहवीं शताब्दी में हुआ है। इस मन्दिर के निर्माण का श्रेय मदुरै साम्राज्य के नायक राजवंश के शासकों को है जिन्होंने अपने आराध्य देव भक्ति में ऐसा अद्वितीय मन्दिर का निर्माण करवाए। नमन है उन सनातनी पूर्वजों को जिन्होंने इस अद्भुत मन्दिर का निर्माण किया है। अतुलनीय सनातन धरोहर.....

सनातन धर्म और हम

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मानता हूँ कि यह सम्भव है और ऐसा किया भी गया है कि... सनातनियों को म्लेच्छों द्वारा बल प्रयोग कर के, अनैतिक रूप से, यातना एवं प्रताड़ना देकर..  मन्दिर से बाहर निकाल दिया जा सकता है.. परन्तु.. क्या कोई भी विधर्मी शक्ति सनातनियों के हृदय से मन्दिर को निकाल सकता है.?? अतिप्राचीन दत्ता मन्दिर के साथ भी यही हुआ है। यह मन्दिर कश्मीर में आज जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। मान्यता है कि इस मन्दिर का निर्माण पांडवों के द्वारा किया गया था। विधर्मियों ने इस मन्दिर को अपवित्र और नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। आज भी इसके अपवित्र होने की पीड़ा सनातनियों के हृदय में है। आज भी सनातनी इस प्रतीक्षा में हैं कि इनका कभी तो जीर्णोद्धार होगा। क्या कभी पुनः कोई पुष्यमित्र शुंग जन्म लेगा...?? अनुतरित्त प्रश्न....!!! श्री दत्ता मन्दिर, उरी, कश्मीर। (चित्र-साभार) वैभवशाली सनातन धरोहर के भग्नावशेष...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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यदि अन्य पंथ मजहब के अनुयायी के साथ हिनू की तुलना किया जाए तो परिणाम बड़ा ही वेदनादायक प्रतीत होता है। अन्य पंथ मजहब के अनुयायी जहाँ जीवन में समृद्ध होने पर अपने पंथ मजहब के प्रति समर्पण भाव से अधिक आकृष्ट व समर्पित होते हैं वहीं हिनू समृद्ध होते ही सिकुलरिज्म वायरस से संक्रमित हो अपने धर्म से छिटक कर दूर बहुत दूर होता जाता है। अन्य पंथ मजहब के अनुयायी अपने धार्मिक स्थल के देख-रेख को प्रथम प्राथमिकता देते हैं जबकि हिनू को समृद्ध होते ही घर, वाहन, मोबाईल फोन की ललक होती है धर्म स्थल के लिए सोचने का तो समय ही नहीं मिलता है। यह अति प्राचीन दुर्लभतम शिवलिङ्गम परळी (महाराष्ट्र) में सज्जनगढ़ गाँव के निकट प्राचीन मन्दिर के गर्भगृह में स्थापित है। यह मन्दिर किस कालखण्ड का है, इसका कोई निश्चित प्रमाण किसी के पास नहीं है। परन्तु मन्दिर की वास्तुकला बहुत ही अद्भुत है। मन्दिर के भीत, स्तंभों पर उकेरे हुए सूक्ष्म रचनाओं को बहुत ही निपुणता से गढ़ा गया है। मन्दिर के शिखर और कलश की कलाकृति सनातनी शिल्पकार के विशेषज्ञता को स्वतः प्रमणित करता है। शिवालय के बाहर ही नन्दी महाराज की प्रतिमा स्थापित की गई थ...

सनातन धर्म और हम

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परमपिता भगवान शिव के सुंदरेश्वर रूप की अर्धांगिनी माँ मिनाक्षी अम्माँ हैं। माँ मिनाक्षी अम्माँ को श्री हरि नारायण का अनुजा माना जाता है। इस प्रतिमा में माँ मिनाक्षी अम्माँ अपने दुर्लभतम, अद्वितीय, दिव्य रूप में हैं। (चित्र-साभार) यह प्रतिमा मीनाक्षी मन्दिर के पुडुमण्डपम, मदुरै, तमिलनाडु में हैं। जैसा कि सदैव ही होता रहा है, यह प्रतिमा भी म्लेच्छों के हीनभावना, शत्रुता और द्वेष का भेंट चढ़ कर खंडित हो गया है। सनातनी शिल्पकारों के कला निपुणता का यह जीवंत प्रमाण है। कला की उत्कृष्टता अनुमान इस प्रतिमा के मुकुट, आभूषणों और वस्त्रों को देखकर सहज हो जाता है। प्रतिमा के ठेहुना को ध्यान से देखें, वस्त्र के साथ अस्थि और मांसपेशियों के सूक्ष्मता को कितने सजीवता से दर्शाया गया है। मुखमण्डल पर मातृत्व और वत्सलता स्पष्ट रूप में परिलक्षित होता है। गर्व है अपने सनातनी पूर्वजों पर जिन्होंने इस जीवंत प्रतिमा का निर्माण किए। सर्व मङ्गल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥ ॐ सर्वसम्मोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै च धीमहि तन्नो शक्तिः प्रचोदयात॥ अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सना...