सनातन धर्म और हम
वामजीवियों का कहना है कि आर्यावर्त में "सुई" का भी निर्माण नहीं होता था जबतक कि विधर्मी म्लेच्छों और आँग्ल फिरंगियों ने इस देश में पैर नहीं रखा।
उन सनातन द्रोहियों के लिए तो इस पवित्र भूमि पर हर ओर प्रमाण बिखरे पड़े हैं जो किसी "थप्पड़" के जैसे ही उनके मुखमण्डल को रक्तिम करने को पर्याप्त हैं।
परन्तु निर्लज्ज को लाज कहाँ आता है।
इस नयनाभिरामी वास्तुशिल्प को देखें..!!
यह अद्भुत निर्माण आठवीं शताब्दी का माना जाता है।
इसे पाण्ड्य शासकों ने बनवाया था, किन्तु किसी अज्ञात कारणवश यह अपूर्ण ही रह गया, कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाया।
यह देखने पर किसी पुष्पित-पदम्-पुष्प (कमल के फूल) के सदृश लगता है।
इसका निर्माण शैली महाराष्ट्र के अजन्ता कन्दराओं में बने कैलाश मन्दिर से मिलता है।
यह अविश्वसनीय श्री वेत्तुवन कोइल मन्दिर, कलुगुमालाई, तमिलनाडु में स्थित है।
(चित्र-साभार)
तमिलनाडु के थूतुकुड़ी पहाड़ी के एक अखण्ड ग्रेनाइट पाषाण शिला को काटकर यह मन्दिर सृजित किया गया है।
इसे देखकर ही उस समय के सनातनी वास्तुशिल्प के तकनीकी उत्कृष्टता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।
इसमें बने सूक्ष्म कलाकृतियों और संरचनाओं को ध्यानपूर्वक देखें.!! आप अचंभित रह जाएँगे.!! दाँतों तले उँगली दबा लेंगे.!!
परन्तु दुर्भाग्यवश इन जैसे सनातनी धरोहरों को पाठ्य पुस्तकों में वामजीवियों ने कोई स्थान नहीं दिया है।
आज सोशल मीडिया के कारण इन प्राचीन सनातनी धरोहर को लोगों तक पहुँचाया जा सकता है और उन सनातनी पूर्वजों को सम्मान दिया जा सकता है जिनके अथक परिश्रम से ये निर्माण कार्य सम्पन्न हुए हैं।
नमन है इनके निर्माणकर्ताओं को.!!
अविश्वसनीय सनातन धरोहर...!!
जय सनातन धर्म🙏🚩
जय महाकाल🙏🔱🚩
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