सनातन धर्म
एक थे "बौधा प्रचंड".!
विशुद्ध वामी नीला दोपाया।
वह स्वघोषित सर्वज्ञ थे।
उनका मानना था कि उन्होंने सभी शास्त्रों को पढ़ कर छोड़ा है।
अपने ऊलजलूल, बेसिरपैर के कुतर्कों से सारे गाँव के नाक में दम किये हुए थे।
किसी भी तार्किक बात से सहमत नहीं होना उनका परमप्रिय आदत था।
इन नट सेल में उनका व्याख्या [ "मुखे कानून छे" या कहें कि "खूँटवा यहीं गाड़ब" ] था।
सारे गाँव वाले त्रस्त थे।
उन्हें इस संकट से उबरने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।
हार पार कर गाँव वालों ने मीटिंग किया और निर्णय लिया कि "शुक्ला जी" से ही इसका निदान पूछा जाय।
"शुक्ला जी" एक सीधे साधे कर्मकांडी ब्राह्मण।
अत्यंत भद्र और सुशील व्यक्ति थे।
गाँव वालों ने "बौधा प्रचंड" का सारा मानसिक उत्पीड़न उन्हें कह सुनाया और इस संकट से त्राण दिलाने का आग्रह किया।
शुक्ला जी ने चिंतन किया और निर्णय लिया कि..
"लोहे को सोने के आरी से काटने का प्रयास निरर्थक ही होता है।"
कहा भी गया है कि..
भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस रहे पगुराय।
तो कुतर्क को कुतर्क से पराजित करने का निश्चय किया।
उन्होंने गाँव वालों से कहा कि "बौधा प्रचंड" को एकादशी को पूर्वाह्न में लेकर आए।
गाँव वालों ने इसकी सूचना "बौधा प्रचंड" को देकर उसे आने के लिए मनाया।
निश्चित समय पर गाँव वालों ने "बौधा प्रचंड" को शुक्ला जी के द्वार पर लाए।
शुक्ला जी ने सबों को बैठने का आसन प्रदान किया।
बैठते ही "बौधा प्रचंड" धाराप्रवाह चालू हो गया।
तेईस मिनट लगातार 'वर्बल डियारिया' के पश्चात "बौधा प्रचंड" रुका तो..
शुक्ला जी ने कहा - अब मैं....
शुक्ला जी के इतना कहते ही...
"बौधा प्रचंड" बोल पड़ा - अरे पंडी जी आप क्या बोलेंगे? आपका सब पोथी-पतरा मेरा पढ़ा हुआ है.!
उसके पुनः चुप होने पर शुक्ला जी ने कहा -
"धनुष्क गुणतिलक धनंजय करूणारत्न दिनेशा।
प्रमोद मधुषन तुषार राजपक्षा मतिष जयविक्रम महेशा॥
इतना कहकर शुक्ला जी चुप हो गए।
अब "बौधा प्रचंड" की बारी थी।
उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था।
उसने यह श्लोक तो आजतक किसी भी शास्त्र में पढ़ा ही नहीं था।
उसने शुक्ला जी से कहा कि उसे कोई अत्यावश्यक कार्य याद आ गया है तो इसका उत्तर कल देगा।
वह घर आकर हर सम्भव प्रयास किया कि इस श्लोक का संदर्भ ग्रन्थ ढूँढे।
परन्तु उसे कोई मिल ही नहीं रहा था।
उसने दंडबैठक, अनुलोम विलोम, पद्मासन, सिरसासन सब करके देख लिया।
किंतु सब अकारथ...
रात भर आँखों में नींद नहीं..
भोर की प्रथम लाली के साथ ही सारे गाँव वाले को लेकर शुक्ला जी के घर पहूँच गया।
शुक्ला जी के बाहर आते ही उनके पैरों पर गिर गया।
उनके पाँव पकड़ उनसे क्षमा माँगने और अपना शिष्य बनाने का याचना करने लगा।
शुक्ला जी ने उसे उठाया और उसे अपना शिष्य बनाने की स्वीकृति दी।
ततपश्चात "बौधा प्रचंड" ने उस श्लोक का अर्थ और सन्दर्भ ग्रन्थ पूछा।
शुक्ला जी ने कहा - बौधा प्रचंड, किसी उद्दंड को उचित मार्ग पर लाने के लिए सदा शास्त्र का ही उपयोग नहीं किया जाता है। इसीलिए साम दाम दंड भेद का यथोचित उपयोग करने को कहा गया है। यह कोई श्लोक नहीं है।
"यह श्रीलंकन टीम के सदस्यों का नाम है।"
बौधा प्रचंड अवाक...........….......
#प्रेमझा
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