सनातन धर्म

क्या वास्तव में "रेगिस्तानी पशुओं के झुण्ड" के आर्यावर्त में प्रवेश से पूर्व यहाँ "वास्तुशिल्प" या"सूई" भी नहीं बनता था.??? आईये देखते हैं.!!

कितना दुर्लभतम भव्यतापूर्ण यह मन्दिर है जिसे सनातनी पूर्वजों ने अपने हाथों से सम्पूर्ण पहाड़ को ही काटकर ही बना डाले हैं।

यह निर्माण कार्य "रेगिस्तानी पशु" के आने से पूर्व का है।

यह अतुलनीय श्री नेमिनाथ मन्दिर, ग्वालियर किला, ग्वालियर, मध्यप्रदेश में स्थित है।

मन्दिर के विशालकाय पाषण कक्ष में श्री नेमिनाथ ध्यान साधना में पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं।

श्री नेमिनाथ के मस्तक पर अतिसौन्दर्यपूर्ण पाषाण छत्र बना हुआ है।

कक्ष के छत पर पूर्ण पुष्पित कमल निर्मित है जो सनातन संस्कृति का पवित्र चिह्न है (अष्टदल कमल सनातन धर्म में पवित्र हैं)।

आश्चर्यजनक रूप से यह सभी निर्माण एक ही अखण्ड पाषाण शिला को काटकर निर्मित किया गया है।

कक्ष के बाहरी निर्माण को मन्दिर के रूप में गढ़ा गया है।

मन्दिर के ऊपर और निचले तले के बाँयीं ओर के भीत पर ध्यान दें।

ऐसा प्रतीत होता है कि किसी मिट्टी के भीत को धारदार छुरी से काट कर यह बनाया गया है।

क्योंकि इस प्रकार की कटाई छेनी-हथौड़ी का  नहीं हो सकता है। (चित्र - साभार)

वास्तव में प्राचीनकाल काल में शिल्पकार "राग मालकौंस" में भक्ति गीत गाते हुए पत्थरों पर शिल्पकारी करते थे।

राग मालकौंस कोमल राग है। इस राग में 'ऋषभ' का प्रयोग वर्जित है, अर्थात जिस में ऋषभ सुर लग गया वह 'कौंस' परिवार के अंतर्गत नहीं आता है।

इस राग में भगवान शिव के अनेक उत्कृष्ट भक्ति-वंदना हैं।

मालकौंस कोमलता का राग है अतः इसके प्रभाव से पाषाण मृदुल हो जाता है और उसे मनोनुकूल आकर प्रकार में काटना/गढ़ना अत्यंत सुगम हो जाता है।

पत्थरों पर लघु व सूक्ष्म कलाकृतियाँ सनातनी शिल्पकार के शिल्पकुशलता व निपुणता के परिचायक है।

दुर्भाग्यवश जैसा कि प्रायः सनातनी मन्दिरों, धार्मिक स्थलों के साथ अतीत में होता रहा है, इस सौन्दर्यपूर्ण मन्दिर को भी "रेगिस्तानी पशु मुगलों" ने छिन्न भिन्न कर दिया।

गौरवान्वित सनातन धरोहर...!!

जय सनातन धर्म🙏🚩

जय महाकाल🙏🔱🚩
#प्रेमझा

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