सनातन धर्म

सनातनी और फुटबॉल "धर्मो रक्षति रक्षितः"🚩
__________________

एक बार एक बालक अपने गुरू के साथ फुटबॉल का मैच देखने गया।
बालमन अत्यंत जिज्ञासु होता है।
फुटबॉल खेल देखते हुए उसे कुछ उत्कण्ठा हुई।
उस बालक ने अपने गुरू जी से पूछा; "गुरुदेव, मेरी कुछ जिज्ञासा है। क्या यह पूछने की अनुमति है.?"
गुरू जी ने कहा; "अवश्य पूछो.!!"

बालक :- ये जितने भी खिलाड़ी हैं जिन्हें फुटबॉल के खेल में पदक और मान-सम्मान इस फुटबॉल के कारण ही मिलता है तो भी ये सभी खिलाड़ी मिलकर अपने लातों से इसे ही ठोकर मारे जा रहे हैं। ऐसा क्यों.??

देखिए गुरू जी ने कितना अप्रत्याशित उत्तर दिया..

गुरू जी :- वत्स, इस फुटबॉल की इतनी ही गलती है कि यह अंदर से "रिक्त/खाली" है अन्यथा कोई भी इसे लातों से ठोकर मारने का दुस्साहस नहीं करता।

आज हम सनातनियों की स्थिति भी उसी फुटबॉल के सदृश्य है। हम भीतर से अपने धार्मिक ज्ञान से रिक्त हैं, विमुख हैं।😢

सभी राजनीतिक भिखारी हाथ जोड़कर मत(वोट) की भीख सनातनियों से माँगते है और इनके मत से जीतने के उपरांत सनातनियों को ही दुत्कारते और ठोकर मारते हैं।

इसका प्रमुख कारण है कि जहाँ अन्य पन्थ/मज.हब के अनुयायी अपने पन्थ/मज.हब के प्रति कट्टर है सनातनी अपने धर्मनिष्ठा को त्याग "सिकुलर, उदार और सहिष्णुता" के धुंध में दिशाहीन भटक रहा है।

किस प्रकार हम अपने परम्पराओं/संस्कारों से विरक्त हो गए हैं, देखिए...

सनातनियों के पारिवारिक व सामाजिक सम्बन्धों के सर्वांगीण विकास के लिए हमारे पूर्वजों ने सोलह संस्कारों का प्रावधान किया था।
गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्त, जातकर्म, नामकरण, कर्णवेध, निष्क्रमण, अन्नप्रासन, चूड़ाकर्म, विद्यारम्भ, उपनयन, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह व अन्त्येष्टि, आज इन सोलह संस्कारों में से अधिकतर को आधुनिकता के नाम पर तिलांजलि दे दिया गया है।

पुरुष के लिए शिखा/चोटी व महिलाओं को लिए जूड़ा कभी अनिवार्य होता था क्योंकि इन दोनों में ही केश के जड़ को बन्धन दिया जाता था जो "बिन्दु चक्र" पर खिंचाव उत्पन्न कर उसे सक्रिय रखता था। परिणामस्वरूप मनुष्य का मानसिक व शारिरिक विकास पूर्णता से होता था। किन्तु इसे भी त्याग दिया गया है। क्योंकि शिखा और जूड़ा आज पिछड़ापन और गँवार होने का चिह्न माना जाने लगा।

तिलक व टीका जो "आज्ञाचक्र" प्रभाव डालता है और मनुष्य को प्रज्ञावान बनाने में सहायक होता है, इसे आज पूर्णतया त्याग दिया गया है।

पहले यत्र तत्र गाँव नगर में यज्ञ होते ही रहते थे किन्तु अब यदा कदा ही यह दृश्य देखने को मिलता है।

अपने बालक बालिकाओं को प्रथम शिक्षा जहाँ अन्य पँथ/मज.हब वाले अपने धर्म ग्रंथों की शिक्षा से करते हैं, किन्तु दुर्भाग्यवश सनातनी "A for apple और twinkle-twinkle" से करता है। इन सनातनियों को "भए प्रकट कृपाला, या धर्म क्षेत्रे कुरूक्षेत्रे या आ नो भद्रा क्रतवो यन्तु विस्यतः या श्री गुरु चरण सरोज रज" सिखाने में हीनता का अनुभव होता है।

आज अधिकतर सनातनी घरों में वेद उपनिषद तो छोड़िए, श्री रामायण, श्री महाभारत भी छोड़ दीजिए, श्रीमद्भगवद्गीता और श्री हनुमानचालीसा भी उपलब्ध नहीं है।

आज का कथित आधुनिक सनातनी अपने हाथों में "सिडनी शेल्डन, आइज़ैक कोशिमोव, रोबिन कूक आदि" के उपन्यास को हाथों में लेकर चलना "status symbol" और गर्व समझता है किन्तु "श्रीमद्भगवद्गीता" लेकर चलना "backwardness" और लज्जाजनक मानता है।

आज बाहर जितना भी ज्ञान बघार लें अपने "धार्मिक ज्ञान" के सन्दर्भ में रिक्तता के कारण ही कोई भी सरकार या न्यायालय हमारे धार्मिक रीतियों/परम्पराओं में अनावश्यक हस्तक्षेप और छेड़छाड़ करने की धृष्ठता भी करता है और सफल भी हो जाता है। हम विवश हो केवल हाथ मलते रह जाते हैं।

आज आवश्यकता है कि हम अखण्ड धर्मनिष्ठ बनें। अपने सनातन धर्म को सर्वोपरि जानें। अपने धर्म ग्रन्थों तथा धार्मिक शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। अपने धर्मस्थलों को सर्वश्रेष्ठ जानें। यदि हम सभी धर्मनिष्ठ हो गए तो स्वमेव ही संगठित होकर अनअपेक्षित हस्तक्षेप व छेड़छाड़ का सामूहिकता से प्रबल विरोध कर पाएंगे।

एक बार हम सनातनी अखण्ड धर्मनिष्ठ हो गए तो ये सभी राजनीतिक दल और संवैधानिक संस्थाएँ सनातनियों के समक्ष नत होंगे।

आइए सनातन धर्म निष्ठा हेतु प्रथम पग का शुभारंभ करें...!!

जय सनातन धर्म🙏🚩

जय महाकाल🙏🔱🚩
#प्रेमझा

Comments

Popular posts from this blog

सनातन धर्म और हम

सनातन धर्म और हम

सनातन धर्म और हम