सनातन धर्म

पवनसुत आञ्जनेय के भक्तों ने अपने आराध्य देव का विग्रह अपनी श्रद्धा और भावनाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों में बनाए हैं।

यह दुर्लभतम विग्रह भी अपने अंदर वैसे ही विलक्षणताओं को समाहित किए हुए हैं।

इस विग्रह का निर्माण और स्थापना श्री व्यासराजा द्वारा करवाया गया था (१४६०-१५३९ ई.)।

इस अनुपम विग्रह को "अवतारताराय-आञ्जनेय" के रूप में जाना जाता है।
(चित्र-साभार)

यह अद्वितीय विग्रह नव-वृंदावन, हम्पी, कर्नाटक (जो तुंगभद्रा सरिता के निकट एक द्वीप है) पर स्थापित हैं।

इस अद्भुत विग्रह में तीन युगों के सनातनी अवतारों को अत्यंत सौंदर्यपूर्ण रूप में दर्शाया गया है।
१. इनकी मुखाकृति अतुलितबलधामं, श्रीराम भक्त हनुमानजी के रूप में हैं। त्रेतायुग।
२. इनकी भुजाएँ महाबली, गदाधारी कौन्तेय भीम के रूप में हैं। द्वापरयुग।
(पुष्ट-बाहु/कंधे पर ध्यान दें)।
३. इनके कर में सुशोभित ग्रँथ-पांडुलिपियाँ, श्री माधवाचार्य जी के रूप में हैं। कलयुग।

श्री आञ्जनेय अपने विरल रूप में भक्तों के मध्य अत्यंत लोकप्रिय हैं।

अद्वितीय सनातन धरोहर...!!

जय सनातन धर्म🙏🚩

जय श्री आञ्जनेय महावीर हनुमान जी 🙏🌺

जय महाकाल🙏🔱🚩
#प्रेमझा

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