सनातन धर्म

श्री त्र्यंबकेश्‍वर मन्दिर.!!!
नासिक, महाराष्ट्र।

त्र्यंबकेश्‍वर ज्योर्तिलिंग मन्दिर महाराष्ट्र-प्रांत के नासिक जनपद में त्र्यंबक गाँव में हैं।

यहाँ के निकटवर्ती ब्रह्म गिरि नामक पर्वत से गोदावरी नदी का उद्गम है।

गौतम ऋषि तथा गोदावरी के प्रार्थनानुसार भगवान शिव इस स्थान में वास करने की कृपा की और त्र्यंबकेश्‍वर नाम से विख्यात हुए।

मन्दिर के अंदर एक छोटे से कुण्ड में तीन छोटे-छोटे लिङ्ग हैं।

ये त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव- इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं।

गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्र्यंबकेश्‍वर मन्दिर कृष्णवर्णा पाषाणों से निर्मित है। (चित्र - साभार)

मन्दिर का स्‍थापत्‍य अद्भुत है।

इस मन्दिर के पंचक्रोशी में कालसर्प शांति, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबलि की पूजा संपन्‍न होती है।

इन क्रियाओं को भक्‍तजन विभिन्न मनोकामना पूर्ति हेतु करवाते हैं।

इस प्राचीन मन्दिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था।

इस मन्दिर का जीर्णोद्धार १७५५ में आरम्भ हुआ था और इकत्तीस वर्ष के लंबे अवधि के पश्चात १७८६ में सम्पूर्ण हुआ।

कहा जाता है कि इस भव्य मन्दिर के निर्माण में लगभग १६ लाख रुपए व्यय किए गए थे, जो उस समय बहुत बड़ी धनराशि मानी जाती थी।

त्र्यंबकेश्वर मन्दिर की भव्य भवन सिंधु-आर्य शैली का उत्कृष्ट कृति है।
(चित्र-साभार)

मन्दिर के भीतर गर्भगृह में प्रवेश करने के पश्चात शिवलिङ्ग की केवल अरघा दिखाई देता है, पूर्ण लिङ्ग नहीं।

ध्यान से देखने पर अर्घा के अंदर एक-एक इंच के तीन लिङ्ग दिखाई देते हैं।

इन लिङ्गों को त्रिदेव- ब्रह्मा-विष्णु और महेश का अवतार माना जाता है।

भोर के समय होने वाली पूजन के उपरांत इस अरघा पर रजत का पंचमुखी मुकुट चढ़ा दिया जाता है।

प्राचीनकाल में त्र्यंबक गौतम ऋषि की तपोभूमि थी।

अपने ऊपर लगे गोहत्या के पाप से मुक्ति पाने हेतु गौतम ऋषि ने कठोर तप कर भगवान शिव से माँ गङ्गे को यहाँ अवतरित करने का वरदान माँगा।

फलस्वरूप परमपिता महादेव के अनुग्रह से दक्षिण की गङ्गा अर्थात गोदावरी नदी का उद्गम हुआ।

वैभवशाली सनातन धरोहर...!!

जय सनातन धर्म🙏🚩

जय महाकाल🙏🔱🚩
#प्रेमझा

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