सनातन धर्म
नदी का जल सतत प्रवाहित होने के कारण सदा शुद्ध रूप में रहता है जबकि तलैया का जल बंधा हुआ होता है और उसके सड़न उत्पन्न होने लगता है।
यही वह विशिष्टता है जो सनातन धर्म को अन्य मज.हबो. से अलग करता है और उच्चतम स्तर पर स्थापित करता है।
सनातन धर्म सतत विकासवान रहा है।
इसलिए इसमें त्रुटि की संभावना क्षीण है।
ये अपने अंदर सदैव विकास के लिए तत्पर रहते हैं।
सनातनी अपने आराध्य देव की आराधना विभिन्न रूपों में विग्रहों/प्रतिमाओं/मूर्तियों को बनाकर करते हैं।
ये एक दुर्लभ पञ्च-शिवलिङ्ग हैं जो हम्पी, कर्नाटक में प्राप्त हुआ है।
विजयनगर साम्राज्य का समृद्धशाली नगर हम्पी जो समकालीन विश्व में सर्वोच्च स्थान रखते हैं।
हम्पी जो विधर्मियों के नष्ट भ्रष्ट करने पर भी अतुलनीय हैं।
यह सनातनियों के उत्कृष्ट शिल्पकला की आदर्श प्रतिमूर्ति है।
इस पञ्च-शिवलिङ्ग में रुद्रावतार आञ्जनेय महावीर जी को भगवान शिव का पूजन अर्चन करते हुए अनुपम रूप में दर्शाया गया है।
(चित्र-साभार)
अद्वितीय सनातन धरोहर...!!
जय सनातन धर्म🙏🚩
जय महाकाल🙏🔱🚩
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