सनातन धर्म
यह जीवन भी तो एक द्यूत क्रीड़ा के सदृश्य ही है।
हर पल हम सुख/आनन्द की अपेक्षा/अभिलाषा में अज्ञात पर दाँव लगाते चले जाते हैं।
यह द्युत क्रीड़ा ही था जिसने आर्यावर्त के भविष्य को बदल कर रख दिया था।
द्यूत क्रीड़ा का द्वापरयुग के साथ विशिष्ट सम्बंध रहा है।
द्यूत के दो विशिष्ट (विख्यात और कुख्यात) व्यक्ति द्वापरयुग में हुए।
एक द्यूत प्रेमी जो सदा अधर्म को पोषित करते रहे - गन्धार नरेश शकुनि हुए।
ये अपने कृत्यों के कारण कुख्यात रहे।
दूसरे द्यूत शिक्षक कंक (धर्मराज युधिष्ठिर) हुए जिन्होंने विराट के राजा को अपने अज्ञातवास की अवधि में द्यूत क्रीड़ा का शिक्षा दिए।
ये धर्म समर्थन के कारण सुविख्यात रहे।
द्यूत क्रीड़ा में द्युत पट्टिका और गोटियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
संलग्न चित्र विश्व के सबसे प्राचीनतम द्यूत क्रीड़ा पट्टिका और गोटियों का है।
यह उत्खनन में गुजरात के लोथल से प्राप्य है।
जाँच करने पर यह पट्टिका ईसापूर्व २४०० ई. का माना गया है।
जी हाँ, ठीक सुना.!! ईसा पूर्व २४०० ई...!
(चित्र-साभार)
गोटियाँ दुर्लभ रूप में हैं।
सनातन संस्कृति के भग्नावशेष...!!
जय सनातन धर्म🙏🚩
जय महाकाल 🙏🔱🚩
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