सनातन धर्म
आदौ राम तपोवनादिगमनं, हत्वा मृगं कंचनं।
वैदीहीहरणं जटायुमरणं, सुग्रीवसंभाषणम्॥
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं, लंका पुरीदाहनम्।
पश्चाद् रावण कुम्भकर्ण हननं, एतद्धि रामायणम्॥
यह अद्भुत दुर्लभतम प्रतिमा मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, आञ्जनेय महावीर हनुमान और संग में माता जानकी सीता जी की है।
यह प्रतिमा हमारे सनातनी पूर्वजों द्वारा निर्मित अमूल्य धरोहर है जो सनातन कलाकृति की अनुपम भेंट है जिसे वे अपने आधुनिक संतति को सौंप गए हैं।
यह मूर्ति श्री वैकुण्ठनाथ पेरुमल मन्दिर, तूतीकोरिन, तमिलनाडु में है।
ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित इस मूर्ति के परिधान के निर्माण में शिल्पकार के निपुणता को देखें।
इस सम्पूर्ण निर्माण को एक ही अखण्ड प्रस्तर शिला से काट कर गढ़ा गया है। इसमें कोई जोड़ नहीं है। (चित्र - साभार)
अब एक बार अवश्य ही विचार करें और निर्णय लें कि वामियों/कांगियों/लिब्रानडों के कहे हुए शब्दों कि 'इस देश में मलेच्छों विधर्मियों के आक्रमण से पहले कुछ नहीं बनता था' को क्या समझा जाए.??
यदि मलेच्छों विधर्मियों के आने से पहले आर्यावर्त में कुछ भी नहीं था तो तो ये लोग बार बार यहाँ आक्रमण कर किसलिए इस देश पर शासन करने को लालायित रहते थे.??
यह सनातनी शिल्पकारों की अपने शिल्पकला मूर्तिकला में श्रेष्ठता ही थी जिससे म्लेच्छ और विधर्मी जलते थे।
उनकी कला निपुणता, पारंगतता इस कृति के मुखमंडल, वस्त्र परिधान, अंगविन्यास, भावभंगिमा, आयुध, आभूषण, मुकुट, मुंद्रिका, कंगन, वेणु आदि से ही परिलक्षित होते हैं।
मूर्ति में निर्मित पादुका विशिष्टता लिए हुए हैं।
आज आधुनिक काल में जिन पादुकाओं को "लेटेस्ट फैशन" कहा जाता है उसे सनातनी शिल्पकारों ने सहस्रों वर्ष पूर्व ही बना कर छोड़ गए हैं।
उत्कृष्ट सनातन धरोहर...!!
जय सनातन धर्म 🙏🚩
जय सी सियाराम 🙏🌺
जय महाकाल 🙏🔱🚩
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