सनातन धर्म
म्लेच्छों का काम ही विनाश रहा है। विधर्मी का सभी कुकर्म विनाश से ही प्रेरित रहा है।
अतः सनातनी पूर्वजों के सदृश्य महानता विधर्मी म्लेच्छों को प्राप्य नहीं रहा।
वहीं सनातनी पूर्वज सदैव सृजन को ही संकल्पित रहे हैं।
यह जो कलाकृति देख रहे हैं किसी भीत पर निर्मित नहीं है। अपितु मन्दिर के भीतर छत पर निर्मित है।
(चित्र-साभार)
इस मन्दिर का निर्माण होयसल साम्राज्य में १११३ - १११४ ई. में हुआ है।
जिस काल में पश्चिमी देश त्रिआयामी कला से अनभिज्ञ थे उस काल में सनातनी वास्तु शिल्पकारों ने पाषाण पर त्रिआयामी मूर्तियों को गढ़ दिए हैं।
और ध्यान रखें कि यह टुकड़ों में बना कर नहीं जोड़ा गया है अपितु एक ही अखण्ड पशन शिला से निर्मित है।
श्री लक्ष्मी देवी मन्दिर, कर्नाटक, होयसल वास्तुशिल्प की सबसे प्राचीन मन्दिरों में से यह एक है।
क्या वामपंथियों के गैंग समकालीन विश्व के किसी अन्य देशों में ऐसा दुर्लभ निर्माण कार्य बता सकता है.??
क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि किन उन्नत तकनीक का उपयोग इस अद्भुत शिल्प के निर्माण में किए गए हैं।
अकल्पनीय सनातन धरोहर...!!
जय सनातन धर्म 🙏🚩
जय महाकाल 🙏🔱🚩
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