सनातन धर्म

सनातनी सदा से ही यह कहते और मानते हुए आए हैं कि...
आदि से अंत तक...
अंत से अनंत तक...
सभी चराचर "शिव" से ही है, शिव ही है।

क्योंकि कंकड़ - कंकड़ में "शङ्कर" ही व्यक्त हो रहे हैं।

यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शिव में ही समहित है।

परमपिता देवाधिदेव महादेव सभी मानव काया में स्वयं को ही व्यक्त किए हैं।

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मानव देह में व्यक्त है।

बस आवश्यकता है कि हम उसे अपने भीतर ध्यान/समाधि में उतर कर अनुभव करें..देखें। 

पूरी स्पष्टता से वह ब्रह्माण्ड भीतर दिखाई देगा।

आदि काल में सनातनी मनीषियों ने कहा/बताया है।

योगसूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने इस विधा को अनुपम रूप में वर्णित किया है।

सतयुग में यह भीतर की यात्रा का अनुसंधान अपने चरम बिंदु पर था।

और सनातनी पूर्ण चैतन्य ब्रह्माण्ड से एकाकार होकर आनंद में जीवन जीते थे।

तभी तो आशीर्वाद फलित और श्राप घटित होता था।

कलयुग में हम भीतर की यात्रा से विमुख होकर बाहर - बाहर ही भागे जा रहे हैं।

इसी लिए हमारे हाथ रिक्त ही हैं।

एक बार बाहर को समग्रता से जानने हेतु भीतर की यात्रा पर चलें तो आज भी उस परम् संपदा को प्राप्त कर सकते हैं।

मानव देह के भीतर किस प्रकार ब्रह्माण्ड व्यक्त है उसका एक अल्प उदाहरण संलग्न चित्र में देखा जा सकता है।
(चित्र - साभार)

आईए इस परम् यात्रा पर चलें...!

ॐ नमः परम् शिवाय 🚩

जय सनातन धर्म 🙏🚩

जय महाकाल 🙏🌺🚩
#प्रेमझा

Comments

Popular posts from this blog

सनातन धर्म और हम

सनातन धर्म और हम

सनातन धर्म और हम