सनातन धर्म

हम सनातनी के लिए मन्दिर में अपने आराध्य देव का दर्शन भी भक्ति का एक महत्वपूर्ण भाग है।

बहुतों को आपने यह कहते हुए सुना होगा कि "इतने वर्षों से मन्दिर जा रहा हूं और मेरा मनोरथ पूर्ण नहीं हुआ।"

ऐसा क्यों होता है??

आइए चिंतन करें.!!

गहरे तल पर विचार करें तो यह पाएंगे कि अधिकांशतः हम जब आराध्य देव के समक्ष उपस्थित होते हैं तो दो ही काम करते हैं--

१. असंतोष के उद्गार प्रगट (Putting a complaint list) करते हैं।
या
२. क्रय पत्रिका (Putting a shopping list) प्रस्तुत करते हैं।

अर्थात...
(१) यह कहते हैं कि मुझे अच्छा घर नहीं दिया, अच्छा आय, अच्छी भार्या, संस्कारी बच्चे, अच्छा सुख साधन उपलब्ध नहीं कराए, आदि आदि.!
या फिर...
(२) मुझे बहुराष्ट्रीय कंपनी में CEO बना दें, मुझे चुनाव जिताकर सबसे बड़ा नेता बना दें, मुझे सबसे बड़ा सत्ता पद दें, मुझे सबसे बड़ा प्रशासनिक अधिकारी बना दें, मुझे मनाली में भवन दें, लिमोजिन दें, मेरे बच्चों को विदेशों में सेटल करें, आदि आदि.!

आराध्य देव/देवी परम् पिता और जगतमाता हैं।

इन दोनों परिस्थिति को अपने ऊपर लागू कर के सोचें। यदि आप माता पिता हैं और आपके बच्चे जब भी आपसे मिलने आपके समक्ष उपस्थित हो तो वह यही दोनों परिस्थिति उत्पन करे तो आप किस प्रकार से प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे??
या यदि आप जिसके पुत्र पुत्री हैं उनके समक्ष सदा यही परिस्थिति उत्पन करेंगे तो आपके माता पिता किस प्रकार से प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे??

दोनों ही स्थितियों में प्रतिक्रिया रुचिकर नहीं ही होगा।

अब आप इसे परम् पिता और जगतमाता के परिपेक्ष में रख कर सोचें....!

क्या कोई भी माता पिता इन परिस्थितियों में हर्षित/उल्लासित/आह्लादित होकर अपने बच्चों को अंक में भरेंगे??

क्या कभी हम अपने परम् पिता या जगतमाता से उसी प्रकार लिपट कर मिले जैसे अपने माता पिता से मिलते हैं??

ध्यान रखें विग्रह प्राण प्रतिष्ठा के उपरांत सजीव हैं।

जो प्रार्थना हम करते हैं क्या यह वास्तव में प्रार्थना है??

एक महान व्यक्ति ने कहा है - प्रार्थना मांग नहीं है।
प्रार्थना चुप हो जाना है।
प्रार्थना उसके द्वार पर अहोभाव से सिर को झुका देना है।
उसे धन्यवाद देना है कि तूने बिना मांगे इतना दिया, और हम धन्यवाद देने के योग्य भी नहीं।
हम किस मुंह से तुझे धन्यवाद दें।
हमारी उतनी भी तो कोई अर्जित संपदा नहीं है।
हम बस आनंद से नाच सकें।
यही तेरी प्रार्थना हो सकती है।

कभी एक बार बिना किसी इच्छा/आकांक्षा बस आराध्य देव से मिलने जाएं।
उनके पांवों से लिपट कर तो देखें।
आप स्पंदन अनुभव करेंगे।
एक दिव्य उष्णता का आभास होगा।

बिना कुछ मांगे हुए मिलें और आपके सकल मनोरथ पूर्ण होंगे।
क्योंकि कोई भी समर्थ माता पिता अपने बच्चों को कष्ट/विपन्नता/निर्बलता/असहाय की स्थिति में नहीं रहने देंगे।

और आराध्य देव/देवी तो सर्व समर्थ/सर्वशक्तिमान/सर्वज्ञ हैं।
(चित्र - साभार)

सबों के सकल मनोरथ सिद्ध हों।🌷

जय जगतमाता महामाया महाकाली🙏🌷
जय महाकाल 🙏🌷🚩
#प्रेमझा

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