सनातन धर्म

इस पटल पर भिन्न भिन्न प्रकार के लेखों को देखने के पश्चात यही लगता है कि यहां प्रयुक्त डेकोरेटिव शब्द बड़े लुभावने रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं।
यथा...
हिनू संगठन के लिए,
हिनू जागरण के लिए,
देस भक्ति के लिए,
रास टर्र भक्ति के लिए ,
हिनू एकत्रीकरण के लिए,
हिनू रास टर्र के लिए,
शाकाहारी के लिए,
मांसाहार विरुद्ध
नसा विरुद्ध,
आदि आदि....!!
जबकि सत्यता कुछ और ही रहता है.!!
सब आत्मसंतुष्टि का खेला है।

अब कुछ प्रश्र.......
क्या कभी भी किसी ने इन वस्तुओं का उपभोग किया है.??
चिकित्सीय उपचार में "कैप्सूल",
होमियोपैथ का कोई औषधि,
पेप्सिन युक्त औषधि,
Elixir वाली औषधि,
जैली वाला खाद्य पदार्थ,
खमीर युक्त खाद्य पदार्थ,
योगर्ट,
आदि आदि....!!

अब ऊपर लिखित वस्तुओं की विवेचना करें तो पाएंगे कि...

पशु को वध किए बिना और उसके हड्डियों को बिना प्रोसेस किए "जिलेटिन" प्राप्त नहीं किया जा सकता है।
पेप्सिन hog पैंक्रियाज से ही प्राप्त होता है, अन्यथा नहीं।
तो अब कैप्सूल और जैली वाला पदार्थ, एंजाइम जो भी ग्रहण कर रहे हैं क्या वे शाकाहारी हैं.?? मांसाहारी तो मांसाहारी है, हां मात्रा और रूप में अंतर हो सकता है।

Elixir हो या होमियोपैथी औषधि इनका बेस अल्कोहल ही होता है तो क्या इन्हें खाने वाले को अल्कोहल मुक्त माना जा सकता है.?? क्योंकि अल्कोहल तो अल्कोहल है, हां मात्रा में अंतर हो सकता है।

खमीर के spores अंडे ही होते हैं और योगर्ट में जीवित जीवाणु होते हैं।
तो इन्हें ग्रहण करने वाले वाले को क्या माना जाए "शाकाहारी या मांसाहारी"..?? हिंसा तो हिंसा है, हां रूप और विधि में अंतर हो सकता है।

लोग अनावश्यक रूप में शाकाहारी vs मांसाहारी या हिंसा vs अहिंसा या मद्य निषेध vs मद्य ग्रहण जैसे निरर्थक विमर्श में ऊर्जा क्षरण करते हैं।

जिस प्रकार किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में सभी गुणों वाले जीवों को होना अनिवार्य होता है।

उसी प्रकार सनातन संस्कृति में भी सभी गुणों वाले लोगों से ही सशक्त समुदाय का निर्माण किया जा सकता है। अन्यथा नहीं।

यहां सब कुछ तुलनात्मक रूप से ही अहिंसक, मद्य मुक्त, मांसाहार मुक्त हो सकता है, समग्रता में नहीं।
क्योंकि सभी कभी न कभी हिंसक, मद्य सेवक, जीव उपभोगकर्ता ही रहता है।
पारिस्थितिकी तंत्र में जहां शार्दुल का महत्व है वहीं बकरी का भी महत्व है।
हिंसा हो या अहिंसा संतुलित समाज हेतु दोनों ही अनिवार्य है, क्योंकि शत्रु द्वारा आक्रमण करने पर हम अहिंसा का तुनतुना बजाते हुए प्राण नहीं दे सकते।

इसलिए अनावश्यक रूप में ऊर्जा क्षरण कर हीन भावना से ग्रसित होने से कहीं उत्तम है कि अपने जीवन में सभी साधनों/वस्तुओ का उपभोग करने हुए सुख समृद्धि संपदा और उल्लास उमंग में जीवन जीए जाएं।

शेष तो अपनी अभिव्यक्ति के लिए सभी स्वतंत्र हैं परंतु किसी के भी जीवन जीने के तरीके पर टिका टिपण्णी को मैं उचित नहीं मानता।
अस्तु.!!
शुभेच्छा सहित....
#प्रेमझा

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