सनातन धर्म
दासता दो प्रकार की होती है।
१. शारीरिक दासता और २. मानसिक दासता।
व्यक्ति शारीरिक दासता में विवशता में अपने ऊपर शासन करने वाले का सभी आदेश भले ही मानता है पर भीतर एक अकुलाहट, एक छटपटाहट, एक व्यग्रता होती है कि किसी भी प्रकार से इस दासता की बेड़ियों से मुक्त होना है। और वह व्यक्ति इस मुक्ति हेतु तब तक प्रयत्नशील रहता है जब तक कि वह दासता से मुक्त नहीं हो जाता।
जबकि मानसिक दासता में व्यक्ति इस दासता को मन से स्वीकार कर इसे ही अपनी नियति मान लेता है। इसी दासता में रस लेने लगता है। मुक्ति की बात नहीं सोचता। यहां तक कि "स्टॉकहॉम सिंड्रॉम" से ग्रसित हो दासता में ही प्रसन्नता ढूंढ़ लेता है।
सिकुलर हिनुओं का भी यही हाल है। उसने भी पराधीन रहते हुए "मानसिक दासता" स्वीकार कर लिया।
यह सिकुलर समुदाय शुद्धतावादी सनातनी संस्कार को त्याग कर सुविधावादी हिनू हो कर रह गया।
इस समुदाय को हर बात में पश्चिम के लोगों का प्रमाणपत्र चाहिए होता है जिससे यह किसी भी बात को प्रमाणित कर सके।
नीचे दिए चित्रों में चित्र १ को अधिकांश लोग जानते भी नहीं होंगे जबकि चित्र २ विश्व विख्यात है। (चित्र - साभार)
अब इन चित्रों को देख कर विचार करें, सोचें.....
जो मोनालिसा को सबसे सुंदर रचना कहते हैं वे क्या एक बार भी इन पाषाण पर निर्मित नृत्य भंगिमाओं को zoom करके कभी देखे हैं।
क्या उन्होंने कभी यह तुलनात्मक समीक्षा किए कि इन दोनों में निर्माण कार्य में किस कलाकार ने अधिक मात्रा में परिश्रम, एकाग्रता, निपुणता, उत्कृष्टता संपूर्णता का प्रदर्शन किया है.!!
हम तो बस पाश्चात्य देशों के कहे का अंधानुकरण कर उसे ही सत्य मानते हुए चले जाते जा रहे हैं।
और दुर्भाग्य से यही शिक्षा अपने आने वाली पीढ़ी को भी दे रहे हैं।
हमारे पूर्वजों ने कितने कठिन परिश्रम से तैयार कर हमारे धरोहर के रूप में छोड़ गए हैं।
चेन्नाकेशवा मन्दिर, कर्नाटक, आर्यावर्त।
पाश्चात्य संस्कृति परंपरा के अंधानुकरण पर पुनर्विचार अवश्य ही करें.!!!
मानसिक दासता से मुक्त हो स्वतन्त्र अस्तित्व में आनंदित रहें.!
गर्व है महान सनातन धरोहर पर...!!
जय सनातन धर्म🙏🚩
जय महाकाल 🙏🔱🚩
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