सनातन धर्म और हम

परमपिता महादेव के डमरू से ही नाद की उत्पत्ति हुई।

नाद से ही ध्वनि का निर्माण हुआ।

नाद ही सम्पूर्ण सृष्टि का मूल है।

नाद के प्रभाव से किसी भी पदार्थ में औषधीय गुण उत्पन्न हो जाता है।

पखावज सनातन संस्कृति का आदि वाद्ययंत्र रहा है।

कालान्तर में पखावज को दो भागों में विभक्त कर तबला-डुग्गी चर्म वाद्ययंत्र का निर्माण हुआ।

आज भी पखावज एवं तबला शास्त्रीय संगीत का मुख्य अवयव हैं।

उत्तर भारत में शास्त्रीय संगीत में तबला का प्रयोग और कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में पखावज का प्रयोग अधिक देखा जाता है।

पखावज के दाहिने 'स्याही' लगा होता है परन्तु बाएँ में नहीं।

पखावज, तबला, मृदंग आदि चर्म वाद्ययंत्रों में जो काला कठोर अवयव लगा होता है उसके लिए "स्याही" शब्द प्रयुक्त होता है।

बाईं ओर वादक गेहूं के आटे को गिला करके लगा कर पखावज बजाते हैं।

हथेलियों के थाप से वह आटा सूखकर झड़ता है।

यह सत्य है कि ज्ञानीजन कहते थे कि उस झड़े आटे को किसी भोजन में मिलाकर ग्रहण करने से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है। जैसे - तपेदिक, दमा इत्यादि।

अब विचार करें कि सनातनी पूर्वजों की दिव्य दृष्टि और ज्ञान कितना उच्चतम स्तर का रहा था कि उन्होंने नाद के औषधीय प्रभावों को ढूंढ निकाला था।

इस चित्र में भगवान रुद्र के अवतार नन्दी महाराज नर-रूप में आनन्दित हो पखावज बजा रहे हैं।
(चित्र साभार)

यह अनुपम मूर्ति भगवान शिव की अर्धांगिनी माँ पार्वती के मन्दिर के भीत पर उत्कीर्ण हैं।

श्री काम-कामेश्वरी मन्दिर, मैसूरु, कर्नाटक।

श्री काम-कामेश्वरी मन्दिर होयसल साम्राज्य के शासकों ने बारहवीं शताब्दी में बनवाया था।

इसके पश्चात भी इसका पुनर्निर्माण कई बार हुआ।

होयसल शासक के आराध्य देव भगवान शिव रहे हैं।

मन्दिर में निर्मित पुष्प-पौधे, आभूषण, बेल-बूटे अपने उत्कृष्ट शिल्पकला के जीवन्त प्रमाण हैं।

अपने सनातनी मन्दिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्ति के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाएँ और गुरुकुल परम्परा को पुनर्जीवित करने में सहयोग करें.!!

वैभवशाली सनातन धरोहर....!!

जय सनातन धर्म🙏🚩

जय गणपति भईया 🙏🌺

जय महाकाल🙏🔱🚩
#प्रेमझा

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