सनातन धर्म और हम

मानव जीवन के लिए सूर्यदेव का स्थान अतुलनीय है।

सूर्यदेव की ऊर्जा से ही यह सम्पूर्ण सृष्टि पोषण प्राप्त करता है।

सूर्यदेव से ऊर्जा का स्थानांतरण सागर में, सागर से मेघों में, मेघों से वृष्टि में, वृष्टि से धरा में, धरा से पेड़ पौधों में, पेड़ पौधों से फल व अन्न में यही ऊर्जा संचित होती है।

फल व अन्न से सभी जीव-जंतुओं में यही ऊर्जा पोषण करने का कार्य करता है।

इसीलिए सूर्यदेव की आराधना प्राचीन काल से सनातन धर्म की परम्परा रही है।

सूर्यदेव की आराधना के लिए सनातनियों ने वैभवशाली भव्य मन्दिरों का निर्माण किए।

उदाहरण स्वरूप कश्मीर का मार्तण्ड मन्दिर, कोणार्क, ओडिशा का सूर्य मन्दिर, देव, औरंगाबाद, बिहार का सूर्य मन्दिर, ग्वालियर, मध्यप्रदेश का सूर्य मन्दिर, इत्यादि।

इनमें से कई मन्दिर विधर्मी म्लेच्छ रेगिस्तानी पशुओं के द्वारा ध्वस्त व विखंडित होने के कारण भग्नावशेष के रूप में ही हैं।

इन्हीं सूर्यदेवता का एक अद्भुत सौंदर्यपूर्ण मन्दिर श्री सूर्य मन्दिर झालरापाटन, राजस्थान है।

नौवीं शताब्दी में, भुमिज शैली में निर्मित यह सूर्यमन्दिर सनातन वस्तुशिल्प व स्थापत्य कला का अद्वितीय आदर्श प्रतिकृति है।(चित्र-साभार)

मन्दिर में भगवान का अतिप्राचीन विग्रह स्थापित है।

सनातनियों में मन्दिर के लिए अखण्ड आस्था है।

वैभवशाली सनातन धरोहर....!!

जय सनातन धर्म 🙏🚩

जय आदित्य भाष्कर🙏🌺

जय महाकाल 🙏🔱🚩
#प्रेमझा

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