सनातन धर्म और हम
हमारे सनातनी पूर्वजों ने सघन अनुसंधान के पश्चात शिखा (चोटी) रखने का प्रावधान किया था।
यह एक अमूल्य निधि का कोष हमें सौंपा गया था परन्तु आधुनिकता व पाश्चात्य अन्धानुकरण में हमने उस कोष की महत्ता को भुला दिया है।
चोटी जिस स्थान पर रखा जाता है वह "बिन्दु चक्र" के स्थान पर है।
"बिन्दु चक्र" आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र के मध्य होता है।
पशुओं के लिए मूलाधार चक्र ही सर्वोच्च चक्र होता है अतः पशु मात्र तीन वस्तुओं का अभिलाषी होता है, भोजन, निद्रा और काम (सेक्स)।
किन्तु मानव में मूलाधार चक्र प्रारम्भिक है ततपश्चात स्वाधिस्ठानचक्र, मणिपुरचक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धि चक्र, आज्ञा चक्र और सहस्रार चक्र सर्वोच्च है। (आरोहण में)
योगी अपने योग में पूर्णता प्राप्त करने हेतु आरोहण और अवरोहण दोनों को ही समग्र रूप से करते हैं तो ही प्रज्ञा प्राप्ति होती है।
इसके कारण ही मनुष्य में मन, बुद्धि, अहंकार होते हैं।
परिकल्पना है कि बिन्दु चक्र में चन्द्र व मणिपुर चक्र में सूर्य होते हैं। बिन्दु चक्र के चन्द्र से अमृत झरता है जिसका भक्षण मणिपुर चक्र के सूर्य द्वारा किया जाता है।
बिन्दु चक्र के अमृत झरने की प्रक्रिया परम् आनन्दपुर्ण होता है।
शिशुओं को प्रायः अँगूठा चूसते हुए देखा होगा। वास्तव में वह अनभिज्ञता से ही अपने बिन्दु चक्र को उत्तेजित करता है जिससे वह अमृत झरना प्रारंभ होता है और उस आनन्द के लिए ही बच्चे अँगूठा चूसते रहते हैं।
खेचरी मुद्रा में योगी अपनी जिह्वा को पीछे कंठ में ले जाकर बिंदु चक्र को गुदगुदा कर इस झरन को आरंभ करवाते हैं और सतत परमानंद की अवस्था में रहते हैं।
बिन्दु चक्र में "खिंचाव" आवश्यक होता है, इसीलिए शिखा बन्धन की परम्परा आरम्भ हुए की बिन्दु चक्र पर खिंचाव बना रहे।
बिन्दु चक्र पर खिंचाव मानसिक व शारिरिक संतुलन के लिए भी आवश्यक है।
सबसे प्रमुख कारण "हमारे ऋषि मुनि बिन्दु चक्र के स्राव को आत्मसात करने की कला में दक्षता प्राप्त कर लिए थे। इस स्राव के आत्मसात के कारण ही वे दीर्घ काल तक भोजन व जल रहित तपस्या करने में सक्षम होते थे।"
शिखा रखने के के कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं।
शिखा को किन अवसरों पर ग्रंथि डालकर अर्थात् गाँठ लगा कर और कब खुले रखना है यह निर्धारित है। यथा - यज्ञ, अग्निहोत्र, पूजन, अनुष्ठान, तर्पण, जप, दान आदि के समय शिखा को बाँध कर रखा जाता है।
भोजन, लघुशंका, दीर्घशंका, मैथुन, रन्थि के साथ जाने पर शिखा को खुला रखा जाता है।
शिखा बंधन का मंत्र :
ॐ चिद्रूपिणि महामाये दिव्यतेजः समन्विते।
तिष्ठ देवि शिखा मध्ये तेजोवृद्धि कुरुष्व मे।।
शिखा में तीन गाँठ देना चाहिए।
आवश्यकता है कि इस ज्ञान को कथित आधुनिकता वादी संततियों को बताया जाए जिससे वे इसके वैज्ञानिक महत्व को समझ कर इसे अपनाएँ।
जय सनातन धर्म 🙏🚩
जय महाकाल 🙏🔱🚩
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