सनातन धर्म और हम
यह चित्र उस पवित्र स्थल का है जो सनातन संस्कृति में देवियों के सर्वोच्च मानदण्ड को स्थापित किया है जिन्हें पढ़कर नेत्र सजल, हृदय गर्व से ऊँचा था मस्तक नमन करने स्वमेव झुक जाता है।
यह वीरांगना महारानी और सोलह सहस्र देवियों का "जौहर कुण्ड", चितौड़गढ़, राजस्थान है।
(चित्र-साभार)
जिसके अत्याचार और पाशविकता को जानकर नेत्रों में लहू उतर आता है और क्रोध से सर्वाङ्ग आक्रोशित हो जाता है।
वह दुर्दान्त हत्यारा और कोई नहीं विधर्मी म्लेच्छ अल्लाउद्दीन खिलजी था।
जिसे महिमामण्डित करने में वामपंथियों और लहरू गैंग के चरण-चाटूकारों ने इतिहास में कोई कमी नहीं छोड़ा है।
यही वो दुर्दान्त हत्यारा था जिसके कारण सोलह सहस्र (१६०००) हिन्दू वीरांगनाओं को जौहर करने को विवश होना पड़ा था। और उन वीरांगनाओं ने अपने नारी सम्मान की रक्षा हेतु सोलह सिंगार कर सहर्ष जौहर कर मृत्यु का आलिंगन कर लिया था।
आज भी इन वीरांगनाओं के गौरवगाथा को पढ़ एक ओर नेत्र सजल होते हैं तो दूसरी ओर मस्तक गर्व से ऊँचा हो नमन करने इनके श्री चरणों में झुक जाता है।
कभी प्रख्यात इतिहासविद श्री अतुल रावत की पुस्तक पढ़ें, जिसमें उन्होंने लिखा है कि :-
"सोलह सहस्र वीरांगना रानियों की चिता के भस्म से हत्यारे अलाउद्दीन खिलजी ने 'सवा चौहत्तर मन सोना' (एक मन =३७.३२४२ कि.ग्रा.) लूटा था।"
इतिहासविद श्री अतुल रावत का कथन पढ़िए :–
"भारतीय सन्दर्भ में लोक परम्परा किस प्रकार इतिहास को संरक्षित किए रहती है यह रानी पद्मिनी की महान गाथा से स्पष्ट है"।
जौहर की ज्वाला शांत होने के पश्चात अलाउद्दीन ने उस विशाल चिता को भी नहीं छोड़ा।
सभी राजपूतानियाँ पूरा श्रृंगार करके चिता पर आरूढ़ हुई थीं। अलाउद्दीन ने चिता की राख से "सवा चौहत्तर मन सोना" लूटा था।
हिन्दू समाज ने वीरांगना राजपूतानियों के उस महान बलिदान की स्मृति बनाये रखने के लिए एक लोक परम्परा आरम्भ की जो अब से पचास-साठ वर्ष पूर्व तक चलती रही।
हिन्दू अपने पत्रों पर "सवा चौहत्तर का अंक" अंकित किया करते थे।
इसका आशय यह था कि जिसको पत्र लिखा गया है उसके अतिरिक्त यदि कोई अन्य व्यक्ति इस पत्र को खोले तो उसे वही पाप लगे जो पाप महारानी पद्मिनी की चिता से सवा चौहत्तर मन सोना लूटने पर अल्लाउद्दीन को लगा था।
लोक इतिहास संरक्षण का यह अनूठा तरीका था। इसीलिए यह इतिहास दो पीढ़ी पहले तक तो बचा रहा।
ये हमारा दुर्भाग्य है कि वर्तमान पीढ़ी विकृत इतिहास और गल्प इतिहास ही पढ़ पाई है।
इन्हें अपने अहंकार से नीचे उतरकर स्वयं को जानने का समय ही नहीं है।
वास्तविकता से दूर सपनों में जीने के आदी युवा पीढ़ी इस संरक्षण के योग्य बची ही नहीं हैं जो महारानी पद्मिनी को रंच मात्र भी समझ पाये।
सभी वीरांगनाओं को कोटिशः नमन🙏
बलिदानी वीरांगनाओं का सनातन धरोहर...!!
जय सनातन धर्म 🙏🚩
जय भवानी 🙏🌺
जय महाकाल 🙏🔱🚩
Comments
Post a Comment