सनातन धर्म और हम
इस भग्न मन्दिर को ध्यान से देखें....!!
इस भग्नावशेष को देखकर यदि किसी के रक्त में आक्रोश व्याप्त नहीं होता है और वो "भाई-चारे" की पीपनी बजाता है तो समझ लें कि उसके रक्त के लाल रंग में "हरे रंग" का मिलावट हो चुका है।
यह भग्नावशेष विराट "मार्तण्ड मन्दिर, अनन्तनाग, कश्मीर के हैं।
आर्यावर्त में प्रचलित आराध्य परम्पराओं में "शैव, वैष्णव, सौर, गाणपत्य, शैव-शाक्त व स्मार्त" रहे हैं।
यह मार्तण्ड मन्दिर "सौर परम्परा" का प्रमुख सुविख्यात मन्दिर था।
मार्तण्ड मन्दिर का निर्माण कर्कोटक वंश के महान शासक सम्राट ललितादित्य मुक्तपिड के द्वारा उनके शासनकाल में आठवीं शताब्दी में किया गया था।(चित्र-साभार)
इस भव्य मन्दिर को ध्वस्त करने का कुकर्म ¢स्लामी पापी सिकन्दर शाह मीरी ने किया था।
चौदहवीं शताब्दी में सिकन्दर शाह ने इस विराट मन्दिर को ध्वस्त करवाकर अपने नाम के साथ "बुतशिकन" का ¢स्लामी उपाधि धारण किया जिसका अर्थ 'मूर्तिभंजक' होता है।
इस मन्दिर के भग्नावशेष को देखकर ही इसके सौंदर्य और भव्यता के अनुमान लगाया जा सकता है कि जब यह मन्दिर अपने यौवनावस्था में होगा तो कितना वैभवशाली रहा होगा।
इस भग्नावशेष के इतिहास को जानकर भी जो उस पापी के वंशजों से "भाई-चारा", निभाने कहे वो सनातन द्रोही ही है।
वैभवपूर्ण सनातन धरोहर के भग्नावशेष....!!
जय सनातन धर्म 🙏🚩
जय महाकाल 🙏🔱🚩
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