सनातन धर्म और हम

आधुनिक विज्ञान की पुस्तकों में लिखा है कि...
सौर परिवार खोज और अन्वेषण क्लॉडियस टॉलमी ने किया और बताया कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है और सभी ग्रह पिण्ड इसकी परिक्रमा करते हैं।

परन्तु निकोलस कॉपरनिकस ने १५३० ई. में इस परिकल्पना को पुनर्परिभाषित कर बताया कि सूर्य ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है और सभी ग्रह पिण्ड इसकी परिक्रमा करते हैं।

पुनः इसने १५१६ ई. में सौर प्रणाली को बताया।

१६०९ में केपलर ने ग्रहों के गति का नियम दिया जो आधुनिक विज्ञान का खोज माना जाता है।

अब इससे सहस्रों वर्ष पूर्व आर्यावर्त भरतखण्ड की बात करते हैं.!!!

छान्दोग्योपनिषद को देखते हैं...!!
(इसकी रचना को आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है जबकि वास्तविकता में यह पन्द्रह सहस्र वर्ष पूर्व होना चाहिए.!)
इसमें स्पष्ट रूप से वर्णित है कि.....

अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवीदेता नास्त्मेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः।
न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन देवास्तेनाहंसत्येन् मा विरधिषि ब्रह्मणेति।
सूर्य का न तो उदय होता है न ही अस्त होता है।
यह तो केंद्र है...छान्दोग्योपनिषद.(३.११.१,२).!!

अर्थात् जब समस्त विश्व ने पढ़ना भी आरम्भ नहीं किया था तब हमारे सनातनी महर्षियों, मनीषियों, विज्ञानियों को इस ब्रह्माण्ड के रहस्य पूर्ण रूप से ज्ञात थे।

हमारे सनातनी पूर्वजों को आदिकाल से यह ज्ञात था कि नवग्रह क्या हैं और उनका महत्व क्या है।

हमारे सनातनी पूर्वजों को ज्ञात था कि जगत का विस्तार "पाताललोक से ब्रह्मलोक" तक है।

आज आधुनिक विज्ञान दूरबीन लगा कर नौ ग्रहों को खोजने की बात तो कर रहा है।

परन्तु आधुनिक विज्ञान आज भी पाताललोक से ब्रह्मलोक तक के सभी रहस्यों से अनभिज्ञ है।

आज भी हम अपने सनातनी पूर्वजों के उस गौरवशाली अतीत को वर्तमान में भी ला सकते, आवश्यकता है कि हम अपने धर्मग्रंथों का सम्पूर्णता से अध्ययन/चिंतन/मनन करें.!!

अपने शिशुओं की प्रारंभिक शिक्षा "A for Apple" से नहीं अपितु संस्कृत और श्रीमद्भगवद्गीता से आरम्भ करें।

आईए लौटें सनातन धर्म की ओर.!!!
(चित्र - साभार)

महान सनातन धरोहर..!!

जय सनातन धर्म🙏🚩

जय महाकाल🙏🔱🚩
#प्रेमझा

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