सनातन धर्म और हम

वसन्त नवरात्र आरम्भ होने वाला है।

इस बार वसन्तनवरात्रारम्भ व हिन्दुनववर्षारम्भ २०८२ तदनुसार ग्रिगेरियन कैलेंडर 30 मार्च, 2025 से होगा।

नवरात्र चार होते हैं....
१. वासंती नवरात्र - चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से इसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना होती है।

२. ग्रीष्म नवरात्र - इसे गुप्त नवरात्रि भी कहा जाता है। यह आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होता है और इसमें दस महाविद्या साधना किया जाता है।

३. शारदीय नवरात्र - यह आश्विन शुक्ल प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होता है और नौ दुर्गा का आराधना करते हैं।

४. शिशिर नवरात्र - यह भी गुप्त नवरात्रि पर्व है। यह माघ शुक्ल प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होता है और दस महाविद्या साधना किया जाता है।

सनातनी पूर्वजों द्वारा देवी/देवों के अनेकानेक प्रतिमाएँ भिन्न भिन्न भाव भंगिमाओं में देवालयों, मन्दिरों, धार्मिक स्थलों आदि पर बड़े ही मनमोहक रूप में गढ़े गए हैं।

माँ भगवती महिषासुरमर्दिनी की इस अनुपम प्रतिमा को ही देखें.! (चित्र – साभार)

माँ अम्बे की यह षोडशभुजी प्रतिमा "रानी की बाव" पाटन, गुजरात में स्थित है।

रानी की बाव गुजरात में पवित्र सरस्वती नदी के तट पर ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित किया गया था जो एक राजा के स्मारक के रूप में बनाया गया था।

बाव या बावड़ी आर्यावर्त भरतखण्ड भूमि का भूमिगत जल संरक्षण भंडारण प्रणाली का एक विशिष्ट रूप है।

बावड़ी या बाव को जल संसाधन संरक्षण भंडारण हेतु तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से ही यहाँ बनाया जाने लगा था।

आरम्भ में यह बलुई मिट्टी में एक गड्ढे के रूप से विकसित हो कर चलते हुए कालांतर में शिल्पकला एवं वास्तुकला का बहुमंजिली संरचना के अतुलनीय रूप तक पहुंच गया।

रानी की बाव का निमार्ण गुर्जर–मारू स्थापत्य शैली में जटिल तकनीक की उत्कृष्टता, अनुपात और विस्तार को महान सौन्दर्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

जल की पवित्रता और महत्व को प्रकाशित व्याख्यातित करते हुए इस बाव को एक उल्टे मन्दिर के रूप में निर्मित किया गया है।

यह इसके सर्वोच्च गुणवत्ता कलात्मकता वाले मूर्तिकला के सपाट पट्टिका श्रृंखलाओं के साथ सीढ़ियों के सात स्तरों में विभाजित किया गया है।

यह बाव पञ्चशत बृहत मूर्तियों प्रतिमाओं और सहस्रों लघु एवं सूक्ष्म मूर्तियों से भरी पड़ी है जिनके सन्दर्भ पौराणिक, धार्मिक, साहित्यिक कथाएँ एवं किंवदंतियाँ हैं।

चौथा स्तर सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे गहरा है जो आयताकार कुण्ड के रूप में निर्मित है।

यह ९.५ * ९.४ * २३ मीटर के माप में बनाया गया है।

माँ सिंहवाहिनी के सभी षोडश भुजाओं में अस्त्र शस्त्र शोभायमान हैं।

भैंसे के खण्डित ग्रीवा से महिषासुर असुर रूप में प्रकट होता हुआ बनाया गया है।

महिषासुर को उसके केश से माँ अम्बे वध हेतु पकड़ी हुई हैं।

वाहन सिंह महिष के पृष्ट भाग पर दाँत गड़ाए हुए है।

लघु मूर्तियों, तोरण को अत्यंत सुंदर रूप में निर्मित किया गया है।

अतुलनीय सनातन धरोहर...!!

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

जय सनातन धर्म 🙏🚩

जय माँ भगवती भवानी सर्वमङ्गला 🙏🌺

जय महाकाल 🙏🌺🚩
#प्रेमझा

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