सनातन धर्म और हम

सनातनी पूर्वजों ने अपने सांस्कृतिक/सामाजिक जीवन के सभी घटनाओं को पाषाण शिला पर ही गढ़ कर इतिहास लेखन किया जो आज सम्पूर्ण आर्यावर्त में अनमोल बिखरे मोती के समान हैं।

अब यह हम पर निर्भर करता है कि उन इतिहास को हम कितना डिकोड कर पाते हैं, कितना पढ़ पाते हैं।

यह जीवंत मूर्ति गुल्लिका अज्जी की है।

यह गोमतेश्वर मन्दिर, श्रवणबेलगोला, कर्नाटक में स्थापित है। (चित्र - साभार)

जैन अनुयाइयों के लिए गोमतेश्वर एक महत्त्वपूर्ण धर्मिक स्थल है।

श्री बाहुबली को गोमतेश्वर भी कहा जाता है।

श्री बाहुबली का निर्माण ९८१ ई. में गंगा मंत्री और सेनापति चामुंडराय ने करवाया था।

श्री बाहुबली की ऊंचाई ५७' फीट है।

गुल्लिका अज्जी की कथा कुछ इस प्रकार है।

किंवदंती है कि श्री गोमतेश्वर का सेनापति चामुंडराय निर्माण कार्य संपन्न होने के पश्चात उनका अभिषेक करने का विचार किया।

श्री गोमतेश्वर अभिषेक हेतु उसने पाँच पवित्र द्रव दुग्ध, कोमल नारियल जल, मधु, शर्करा, एवं पवित्र सरिता जल को सैकड़ों पात्रों में इकट्ठा किया।

जब उसने अभिषेक आरम्भ किया तो आश्चर्यजनक रूप से द्रव पदार्थ मस्तक के नाभी तक ही आता था।

नाभी से नीचे द्रव पदार्थ बहकर नहीं आ रहा था।

तब उसने देवी कुष्मांडिनी का स्मरण कर आवाहन प्रार्थना किया।

देवी कुष्मांडिनी एक वृद्ध महिला के रुप में प्रकट होकर हाथों में आधे श्वेत गुल्लिकायी फल के गोले में दुग्ध लिए प्रकट हुईं।

और उस दुग्ध से अभिषेक करने पर आपादमस्तक अभिषेक पूर्ण हुआ।

चामुंडराय ने अपने भूलों के लिए अहं को त्याग कर क्षमा याचना किया, और इस बार महाअभिषेक किया तो वह सम्पूर्ण रहा।

इसीलिए मुख्य मन्दिर के प्रवेश द्वार पर बाहुबली की ओर मुख किए गुल्लीका अज्जी (गुल्लिकाई) की मूर्ति है।

गुल्लिकाई मूर्ति के मुखमंडल, केश विन्यास, कुंडल, आभूषण, वस्त्र परिधान, अंग विन्यास को ध्यान से देखने पर सनातनी शिल्पकार के निपुणता, विशिष्टता, और उत्कृष्टता का अनुमान सहज लगाया जा सकता है।

धन्य हैं वे सनातनी शिल्पकार जिनका योगदान इन अतुलनीय निर्माण में रहा है।

वैभवशाली सनातन धरोहर...!!

जय सनातन धर्म 🙏🚩

जय श्री गोमतेश्वर बाहुबली 🙏🌺

जय महाकाल 🙏🌺🚩
#प्रेमझा

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