सनातन धर्म और हम

सतयुग के द्वितीय चरण में देवताओं और असुरों ने यह निर्णय लिया कि समुद्र मंथन किया जाए।

समुद्र मंथन हेतु मन्दार पर्वत को मथानी तथा नागराज वासुकी को नेती (डोरी) के रूप में प्रयोग किया गया।

परन्तु मंथन में अवरोध उत्पन्न हो गया क्योंकि मथानी मन्दार पर्वत आधार विहीन होने के कारण टिक नहीं पा रहा था।

समस्या के समाधान हेतु श्री हरि विष्णु ने कूर्म अवतार लिए।

कूर्म (कच्छप) पर मथानी मन्दार पर्वत टिकाया गया और समुद्र मंथन आरम्भ हुआ।

सर्वप्रथम मंथन से हलाहल विष निकला।

विष के प्रचण्ड प्रभाव से कोलाहल मच गया, सम्पूर्ण सृष्टि जलने लगी।

विष को स्वीकार करने कोई भी आगे नहीं आ रहे थे।

अन्ततः परमपिता देवाधिदेव महादेव ने उस हलाहल विष का पान कर सृष्टि की रक्षा किए।

हलाहल विष को प्रभु ने अपने कण्ठ में ही रोक लिए।

विष के प्रभाव से उनका कण्ठ नील वर्ण का हो गया और वे नीलकण्ठ कहलाये।

परन्तु विष के ताप ने भगवान शङ्कर को विह्वल किया और उस ताप की शान्ति के लिए जगतमाता पार्वती आगे बढ़ कर अपने कर स्पर्श से परमपिता को शीतलता प्रदान किए।

इसी स्पर्शानुभूति की प्रक्रिया को सनातनी पूर्वजों ने सजीव चित्रण पाषण पर किए हैं।

यह अद्भुत मूर्ति श्री कण्ठेश्वर मन्दिर, नंजनगुडू, कर्नाटक में स्थित हैं। (चित्र - साभार)

भगवान शिव और माता पार्वती के मुखमण्डल, उनके भावों को, उनके आभूषण व परिधानों को कितने स्पष्टता और पूर्णता से निर्मित किया गया है, यह देखकर हर्ष और कौतूहल होता है।

शिल्पकार सनातनी पूर्वजों को नमन.!!

अद्भुत सनातन धरोहर...!!

जय सनातन धर्म🙏🚩

जय माँ भवानी 🙏🌺

जय महाकाल🙏🔱🚩
#प्रेमझा

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