सनातन धर्म और हम

आर्यावर्त का अतीत गौरवपूर्ण रहा है।
यहाँ के वीर योद्धाओं ने विश्व विजय किया है।
यहाँ के मन्दिर, भवन, राज प्रासाद, व अन्य प्रतिष्ठान अपने वास्तुशिल्प एवं स्थापत्य कला के लिए विश्व विख्यात और अद्वितीय, अतुलनीय रहे हैं।

एक अन्धकार का समय भी आया जब राष्ट्र विधर्मियों के अधिकार में चला गया।
सामान्यतः यह राजनैतिक दासता का काल था।
इसे हमें मानसिक दासता के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए था लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित हुई।
जब विधर्मियों से मुक्ति मिली तो हमें अपने स्वाभिमान की स्थिति में आ जाना चाहिए था।
परंतु नहीं.!
हम आजतक मानसिक दासता की मनःस्थिति में ही जी रहे हैं।
हमें आज भी अपने किसी गौरव पर गर्व करने के लिए फिरंगियों के 'प्रमाणपत्र' की आवश्यकता होती है।

यह चित्र श्री रत्नेश्वर मन्दिर की है जो भगवान शिव को समर्पित है।

श्री रत्नेश्वर मन्दिर मणिकर्णिका घाट के निकट, वाराणसी, उत्तरप्रदेश में है। (चित्र - साभार)

इसकी विशिष्टता है कि यह ९ डिग्री के झुकाव पर है। 

इस मन्दिर की ऊँचाई ७४ मीटर है।

अब इसकी तुलना में "पीसा की मीनार" से करें जो ५ डिग्री के झुकाव पर और ५४ मीटर ऊँचा है।

श्री रत्नेश्वर मन्दिर पीसा की मीनार से ४ डिग्री अधिक झुकाव और २० मीटर अधिक ऊँचाई होने पर भी अधिकांश लोगों को ज्ञात नहीं है, जबकि पीसा की मीनार विश्व के आश्चर्य में गिना जाता है।

इसका एकमात्र कारण है कि इस मन्दिर को किसी फिरंगी ने प्रमाणपत्र नहीं दिया है।

यहाँ तक कि सिकुलर सरकार भी इसे पर्यटकों के लिए प्रचारित/प्रसारित नहीं करता है।

क्या हम इस पर गर्व कर इसे विख्यात बना सकते हैं.??

निर्णय आपको करना है.!!

अतुलनीय सनातन धरोहर...!!

जय सनातन धर्म🙏🚩

जय महाकाल🙏🔱🚩
#प्रेमझा

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