सनातन धर्म और हम
सनातनी शिल्पकार कितने सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों को ध्यान में रखकर उसे अपने सृजन में समाहित करते थे, इसका यह मूर्ति आदर्श उदाहरण है।
इस मूर्ति में वस्त्र-परिधान को ध्यान से देखें, वस्त्र के गाँठ, उनके कलाकृतियों इत्यादि को कितनी निपुणता से सजीव चित्रित किया गया है।
इनके वस्त्र ठेठ गंवई वेश में गढ़े गए हैं।
सम्पूर्ण मूर्ति में अप्रतिम भाव संप्रेषण और सौन्दर्य है।
यह अल्प खण्डित मूर्ति नन्द बाबा और मैया यशोदा के हैं। उनके गोद में बाल गोपाल व बाल बलभद्र हैं।
(चित्र-साभार)
बाल गोपाला की गैया भी पार्श्व में निर्मित है।
यह मूर्ति श्री दसावतार मन्दिर, देवगढ़, उत्तरप्रदेश में है।
यह गुप्तकालीन मूर्ति पाँचवीं शताब्दी का माना गया है।
मन्दिर के खम्भे में उकीर्ण कलाकृतियाँ मनमोहक हैं।
इस अनुपम कृति को जब गढ़ा जा रहा होगा उस समय के सनातनी शिल्पकार के मस्तिष्क में लल्ला कान्हा, बाल बलदाऊ, नन्द बाबा, मैया यशोदा की जो छवि अंकित होगी उसे कल्पना करते ही सर्वांग पुलकित हो उठता है।
रोम रोम रोमांच से भर जाता है।
धन्य हैं वे सनातनी शिल्पकार जिन्होंने इस अनमोल रचना को गढ़ा है.!!
दुर्लभतम सनातन धरोहर...!!
जय सनातन धर्म 🙏🚩
जय नंदलाला जय गोपाल 🙏🌺
जय महाकाल 🙏🔱🚩
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