सनातन धर्म और हम
इतिहास को कागज पर लिखने की कला तो आधुनिक युग में विकसित किया गया है।
परंतु हमारे सनातनी पूर्वजों ने तो सम्पूर्ण इतिहास को प्राचीन काल में ही पाषाण शिला पर गढ़ कर हमारे लिए रख छोड़े हैं।
अब यह भिन्न बात है कि इस इतिहास की लिपि और भाषा को पढ़ना अतिआधुनिकता में अंधे होकर रहने वाले मनुष्यों को आता भी है या नहीं।
महाभारत युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था और इस इतिहास को पाषाण शिला पर चित्रों की लिपि में लिखवाने का श्रेय जाता है होयसल नरेश विष्णुवर्धन को।
नरेश विष्णुवर्धन ने होयसलेश्वर मन्दिर के भीत पर इस इतिहास लेखन का आरम्भ ११२१ ई. में करवाया और यह कार्य सम्पन्न हुआ ११६० ई. में।
इस कार्य संपादन में सनातनी शिल्पकारों के अथक परिश्रम, कर्मठता, निपुणता और समर्पण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इस मन्दिर के भीत पर सम्पूर्ण चक्रव्यूह, वाणवर्षा, गज युद्ध, रथ युद्ध आदि को जीवन्त रूप में चित्रित किया गया है।
(सभी चित्र - साभार)
होयसल साम्राज्य का ध्वज १५० वर्षों तक लहराता रहा था।
परंतु इस अद्वितीय सनातनी धरोहर पर रेगिस्तानी पशु की कुदृष्टि पड़ गई।
और विधर्मी म्लेच्छ मलिक कफूर के जंगली झुंड ने चौदहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में इसे छिन्न भिन्न कर दिया।
इसके प्रमाण आज भी श्री होयसलेश्वर मन्दिर, हलीबिदू, कर्नाटक में देखा जा सकता है।
(हली - बिदू का अर्थ ही पुराना - नगर होता है)
आज भी इसे देख कर अपने सनातनी पूर्वजों पर गर्व एवं अभिमान होता है।
अद्वितीय सनातन धरोहर...!!
जय सनातन धर्म 🙏🚩
जय महाकाल 🙏🌺🚩
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