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Showing posts from March, 2026

सनातन धर्म और हम

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विश्व के स्यात एकमात्र अद्वितीय "जीवित" शिवलिङ्गम जिनके आकर में प्रतिवर्ष १" ईंच की वृद्धि होती है, ऐसी मान्यता है। यह माप प्रति वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को मुख्य पुजारी जी के द्वारा किया जाता है। वर्तमान में इस विशाल शिवलिङ्गम की ऊँचाई ९' फुट है। यह शिवलिङ्गम मतङ्गेश्वर मन्दिर, खजुराहो, मध्यप्रदेश में हैं। ऐसी मान्यता है कि परमपिता परमेश्वर महादेव के अनुग्रह से "मार्कण्ड" मणि युधिष्ठिर को प्राप्त हुआ था। यह मार्कण्ड मणि युधिष्ठिर से मतङ्ग ऋषि को तथा उनसे हर्षवर्धन को प्राप्त हुआ। हर्षवर्धन ने इसे भूमि के अन्दर गाड़ दिया। परंतु इनका उचित देखभाल नहीं होने के कारण इनके आकर में वृद्धि होने लगा। ऐसा कहा जाता है कि यह शिवलिङ्गम कलियुग के द्योतक हैं। इनके शिखर स्वर्गलोक व आधार पाताललोक की ओर अग्रसर हैं। जिस दिन इनके आधार पाताललोक को स्पर्श करेंगे कलियुग का अंत हो जाएगा। ऐसा माना जाता है कि आज भी मार्कण्ड मणि इसके नीचे ही दबा हुआ है। मतङ्ग ऋषि के नाम पर ही इनका नाम मतङ्गेश्वर पड़ा है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर आदिदेव महादेव और माँ पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था। इ...

सनातन धर्म और हम

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सनातन वास्तुशिल्प कितना अद्भुत, अकल्पनीय और रहस्यमय रहा है इसका प्रमाण तो यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याप्त है। श्री नेल्लीअप्पयर मन्दिर, तिरुनेलवेली, तमिलनाडु के ४८ विलक्षण खम्भों में से प्रत्येक को एक अखण्ड पाषाण शिला से निर्मित किया गया है। (चित्र-साभार) सनातनी शिल्पकला कितना वैज्ञानिक था इसका जीवंत साक्ष्य यह खम्भे हैं। इन खम्बों निर्माण इस प्रकार किया गया है कि इनसे शास्त्रीय संगीत के सभी सात सुरों :- षड़ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद, का शुद्ध ध्वनि उत्पन्न होता है। ध्यान रखें, यह निर्माण १३०० वर्ष पूर्व किया गया है। गर्व करें कि वैदिक काल में जो भी हमारे सनातनी पूर्वजों ने बनाकर हमें सौंप गए हैं उनकी प्रतिकृति भी आज वर्तमान समय में आधुनिक विज्ञान से नहीं बनाया जा सकता है। अकल्पनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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दक्षिण का कैलाश (वल्लीअंगिरी पर्वत) समुद्रतल से १००० मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि जो इन पर्वतों पर चढ़कर भगवान शिव के दर्शन करते हैं उन्हें कैलाश मानसरोवर से समान तृप्ति, सन्तुष्टि, आंनद और पुण्य प्राप्त होता है। पुराणों में वर्णन है कि पराशक्ति का अवतार देवी कन्याकुमारी के रूप में देवाधिदेव महादेव की अर्धांगिनी बनने के लिए हुआ। माँ भगवती ने यह प्रतिज्ञा लिया कि एक निश्चित समय में प्रभात होने से पूर्व ही भगवान महादेव से उनका विवाह हो यदि ऐसा नहीं होता तो वे अपने काया को समाप्त कर लेंगी। यही प्रतिज्ञा कर उन्होंने तपस्या आरम्भ किया। परमपिता देवाधिदेव महादेव उनके तपस्या से प्रसन्न हो उनसे विवाह हेतु कैलाश से दक्षिण दिशा में प्रस्थान किए।  परंतु बहुत सारे लोग इस विवाह के विरुद्ध थे और विवाह रोकने के लिए व्यवधान करने लगे। इसी षड्यंत्र में छल से उन्होंने बहुत से कर्पूर जला कर प्रभात होने का भ्रम उत्पन्न कर दिया। इस भ्रम में कि वह पवित्र मुहूर्त व्यतीत हो गया, भगवान महादेव अत्यंत व्यथित हो वापस लौटने लगे। लौटने के क्रम में भगवान महादेव वल्लीअंगिरी पर्वत पर विश्राम ...