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सनातन धर्म और हम

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जब जब भी प्रभु यशोदानंदन श्री वासुदेव कृष्ण की चर्चा होती है तो श्री राधा रानी जी और श्री मीराबाई जी की चर्चा अनिवार्य रूप से होती ही है। श्री कृष्ण भक्त मीराबाई जी का सनातन संस्कृति में अपना अद्भुत योगदान और विशिष्ट पहचान है। मीराबाई जी मेवाड़ में ६०० वर्ष पूर्व भगवान श्री कृष्ण के जिस विग्रह की पूजा करती थीं.. इस मन्दिर में प्रभु श्री कृष्ण के वही विग्रह स्थापित हैं। श्री मीराबाई मन्दिर, मेड़ता, राजस्थान। इस मूर्ति को आमेर के शासकों ने दुर्दांत अत्याचारी म्लेच्छ मुगलों से युद्ध करके बचाया था। मन्दिर का निर्माण महाराजा मानसिंह प्रथम की पत्नी महारानी कनखावती जी ने करवाया था। इस मन्दिर का वास्तुशिल्प मन को चमत्कारिक रूप से सम्मोहित कर लेता है। (चित्र - साभार) इसे दर्शन करें और श्री कृष्ण भाव सरिता में आनंदपूर्ण गोते लगाएं। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! म्हारे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई 🌺❤️🚩 जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय प्रेम पुजारिन मीरा बाई जी 🙏🌺 जय श्री गिरधर गोपाल जी🙏🌷🚩 जय महाकाल 🙏🌺🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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कथित स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही हमारे शिक्षा व्यवस्था में ही चूक रहा है कि हमारे पाठ्यक्रम में हमारे सनातनी विरासत को सम्मिलित/समाहित नहीं किया गया। वामियों, लिब्राण्डों, कांगियों ने जैसा कल्पित कहानी इतिहास के पुस्तकों में पढ़ाया, हमने उसे ही प्रामाणिक मान लिया। और इन सनातन द्रोही गैंग ने कहा कि विधर्मी म्लेच्छों के आर्यावर्त में आक्रमण कर आने से पूर्व यहाँ एक "सूई" भी नहीं बनता था। उस द्रोही गैंग से प्रश्न है कि यह भी बताओ कि इस शिला-सुन्दरी के समान कोई निर्माण समकालीन विधर्मी म्लेच्छों के देश में एक भी है क्या.?? यदि नहीं है तो उसने ऐसा निर्माण अपने देश में क्यों नहीं किया.?? कभी एकांत में अवश्य ही चिंतन करें कि क्या कोई दस्यू गैंग जो समृद्धि को लूटने ही आया हो वह कोई सकारात्मक निर्माण कर सकता है क्या?? ये सनातनी शिल्पकार के कला निपुण हाथों का चमत्कार है जो यह पाषण शिला भी जीवन्त हो मधुर स्वर-लहरियों को सहस्रों वर्ष उपरान्त आज भी सुना रहा है। यह शिला-सुन्दरी चोल शासकों द्वारा निर्मित मन्दिर में स्थित है जिसे विजयनगर साम्राज्य के काल में निर्मित किया गया है। ध्यान रखें, व...

सनातन धर्म और हम

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यह भक्ति की शक्ति ही है जो एक मानव का रूपांतरण महामानव में कर देता है। भक्ति में भक्त अपने को सम्पूर्ण समर्पित कर आराध्य देव को प्राप्त कर लेता है। यह भक्ति की शक्ति और आराध्य देव के प्रति समर्पण ही है जो उसके कार्य में भगवान के अनुग्रह से दिव्यता का सम्मिश्रण हो जाता है। ग्रेनाइट का MOHS SCALE में कठोरता ८ है जबकि सबसे कठोरतम हीरा का MOHS SCALE में कठोरता १० है। आज आधुनिक युग में लेजर उपकरण के द्वारा भी ग्रेनाइट पर शिल्पकला अत्यंत कठिन है। किन्तु सहस्रों वर्ष पूर्व सनातनी शिल्पकारों ने बिना आधुनिक तकनीक के इस नन्दी का निर्माण अपने हाथों से किया है। यह नन्दी महाराज, रामप्पा मन्दिर, वारंगल जनपद, तेलंगाना। यह नन्दी एक ही अखण्ड पाषण शिला ग्रेनाइट से बना है। इस नन्दी के प्रतिमा पर कहीं भी "छेनी-हथौड़ी" का कोई चिह्न दिखाई देता है क्या.?? ऐसी स्निग्धता सतह पर लाने में कितना श्रम, समय और निपुणता लगा होगा इसकी कल्पना करें.!!!! इनके ऊपर निर्मित आभूषणों की सूक्ष्मता में एक छोटी सी चूक सम्पूर्ण प्रतिमा को कुरूप कर सकता था। परन्तु उन सनातनी पूर्वजों के धर्म और कला के प्रति समर्पण और धैर्य...

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भगवान श्री हरि नारायण के कुल चौबीस अवतार माने जाते हैं। जिनमें दशावतार प्रमुख हैं। इनके अतिरिक्त चौदह अन्य अवतारों को माना जाता है। भगवान श्री हरि विष्णु के हयग्रीव अवतार को सोलहवें अवतार के रूप में माना जाता है। भगवान हयग्रीव का यह अतिदुर्लभ प्रतिमा "निंरा नारायण पेरुमल मन्दिर, तिरुथनकाल, शिवकाशी, तमिलनाडु में स्थापित है। यह मन्दिर भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है। यहाँ भगवान विष्णु "निंरा नारायण" के रूप में व माँ लक्ष्मी "अरुणकमला महादेवी" के रूप में पूजे जाते हैं। भगवान हयग्रीव अवतरण की कथा इस प्रकार है..... एक दैत्य हयग्रीव ने माँ महामाया का घोर तपस्या कर माँ को प्रसन्न कर लिया। माँ महामाया उसे तामसी शक्ति के रूप में दर्शन दे वर माँगने को बोलीं। दैत्य हयग्रीव ने अमरत्व का वर माँगा तो माँ ने कहा कि अमरत्व का वरदान किसी को भी नहीं दिया जाता, कुछ और माँग लो। दैत्य हयग्रीव ने माँगा की उसकी मृत्यु हयग्रीव (मेरे) के हाथों ही हो। माता महामाया ने "एवमस्तु" कहा और अंतर्ध्यान हो गईं। अब तो दैत्य हयग्रीव प्रसन्नता से पागल ही हो गया क्योंकि वह स्वयं तो अपन...

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विशालकाय लोनार झील लगभग पचास सहस्र वर्ष पूर्व उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने से बना है। लोनार झील को "लोनार क्रेटर" भी कहा जाता है। लोनार का अर्थ "नमक की क्यारी" होता है। अत्यधिक लवण तथा "HALOARCHAEA" लवण प्रेमी जीवाणुओं के कारण इसके जल का रँग गुलाबी है। विश्व भर के विज्ञानी इस लवणीय जल के झील की ओर अनुसंधान हेतु आकर्षित होते हैं। लोनार झील मुम्बई से लगभग ५०० कि.मी. दूर बुलढाणा जनपद, महाराष्ट्र में है। लोनार झील के निकट भगवान महादेव के कुछ बारह मन्दिर रहे हैं। उन्हीं शिवालयों में से एक में यह सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान भगवान शिव की अति प्राचीन दुर्लभतम शिवलिङ्ग स्थापित हैं। अनुपम शिवलिङ्ग के समक्ष नन्दी महाराज चिरप्रतीक्षित अवस्था में प्रभु के ध्यान में मग्न बैठे हैं। शिवालय की संरचना जीर्ण-शीर्ण हो गई है तो भी शिवलिङ्ग तथा नन्दी सुरक्षित हैं। भगवान शिव के भक्त इस भग्न शिवालय में भी आराधना, उपासना हेतु सहर्ष आते हैं। पर्यटकों के लिए यह एक महत्वपूर्ण धर्म स्थली है। महान सनातन धरोहर...!! ॐ नमः परम् शिवाय 🚩 जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा ...

सनातन धर्म और हम

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विश्व के सभी सातों आश्चर्य (seven wonders) जिसके चौखट पर आकर अपने दम तोड़ देंगे, ये वो अकल्पनीय सनातन संस्कृति की सर्वोत्कृष्ट कृति है। (Zoom करके अवश्य देखें) यह सनातनी शिल्पकार पूर्वजों के कर कमलों द्वारा मध्यकाल दसवीं शताब्दी में निर्मित माना जाता है। (चित्र-साभार) यह कभी देवाधिदेव महादेव का भव्य मन्दिर हुआ करता था। किन्तु अब मन्दिर के कोई चिह्न विद्यमान नहीं हैं। अपने सनातनी पूर्वजों के वास्तुशिल्प को देखकर एक बात स्पष्ट है कि जहाँ विश्व के वास्तुशिल्प की कल्पना का अन्त होता है वहीं से हमारे सनातनी वास्तुशिल्प का सृजन आरम्भ होते हैं। अठारहवीं शताब्दी में धौलपुर के शासक ने भग्न मन्दिर के पत्थरों को अपने भवन निर्माण के लिए उपयोग कर लिए। अब इस अद्वितीय मन्दिर के मात्र प्रवेश मण्डपम ही बच रहे हैं। ये गढ़ी पदावली, मोरेना, मध्यप्रदेश में स्थित हैं। इसके आधार से छत तक सम्पूर्ण भीत मूर्तियों, कलाकृतियों, बेल-बूटों की संरचनाओं से भरे पड़े हैं। इनमें त्रिदेव, सृष्टिकर्ता श्री ब्रह्मदेव, पालनकर्ता श्रीमन्नारायण, सृष्टि के संचालके व संहारक देवाधिदेव महादेव अप्रतिम रूप से निर्मित हैं। इनमें जो महा...

सनातन धर्म और हम

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सम्पूर्ण विश्व में भाँति-भाँति के रँग-रूप, आकर-प्रकार के शिवलिङ्ग प्राप्य हैं। किन्तु, यह दुर्लभतम शिवलिङ्ग अपने आप में अनूठा और अप्रतिम हैं। (चित्र-साभार) इस अद्भुत शिवलिङ्ग में नन्दी महाराज व कूर्म (कच्छप/कछुआ) संयुक्त रूप में निर्मित हैं। यह अतिप्राचीन भगवान देवाधिदेव महादेव को समर्पित श्री गङ्गेश्वर महादेव मन्दिर में स्थापित हैं। श्री गङ्गेश्वर महादेव मन्दिर,  गङ्गवा ग्राम, दांता तालुका, बनासकांठा जनपद गुजरात में स्थित हैं। शिवलिङ्ग में स्पष्ट रूप में नन्दी महाराज व कूर्म दृश्यमान हैं। मन्दिर भग्न स्थिति में ही है। मन्दिर के शिखर भी खण्डित हैं। मात्र गर्भगृह सुरक्षित है जहाँ यह अनुपम शिवलिङ्ग स्थापित हैं। इस मन्दिर की भव्यता का गर्भगृह को देखकर कोई भी अनुमान लगा सकता है कि अपने गौरवपूर्ण अतीत में यह मन्दिर कितना भव्य रहा होगा.!! इस मन्दिर के गर्भगृह के एक भीत पर श्रीमन्नारायण के दशावतार उकीर्ण हैं। इनमें मत्स्यावतार, कूर्मावतार, वाराहावतार, नरसिंहावतार, वामनावतार, श्री परशुराम अवतार, श्री राम अवतार, श्री बलभद्र अवतार तथा श्री कृष्ण अवतार हैं। आश्चर्यजनक रूप से इनमें श्री कल्कि ...