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सनातन धर्म और हम

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विश्व के स्यात एकमात्र अद्वितीय "जीवित" शिवलिङ्गम जिनके आकर में प्रतिवर्ष १" ईंच की वृद्धि होती है, ऐसी मान्यता है। यह माप प्रति वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को मुख्य पुजारी जी के द्वारा किया जाता है। वर्तमान में इस विशाल शिवलिङ्गम की ऊँचाई ९' फुट है। यह शिवलिङ्गम मतङ्गेश्वर मन्दिर, खजुराहो, मध्यप्रदेश में हैं। ऐसी मान्यता है कि परमपिता परमेश्वर महादेव के अनुग्रह से "मार्कण्ड" मणि युधिष्ठिर को प्राप्त हुआ था। यह मार्कण्ड मणि युधिष्ठिर से मतङ्ग ऋषि को तथा उनसे हर्षवर्धन को प्राप्त हुआ। हर्षवर्धन ने इसे भूमि के अन्दर गाड़ दिया। परंतु इनका उचित देखभाल नहीं होने के कारण इनके आकर में वृद्धि होने लगा। ऐसा कहा जाता है कि यह शिवलिङ्गम कलियुग के द्योतक हैं। इनके शिखर स्वर्गलोक व आधार पाताललोक की ओर अग्रसर हैं। जिस दिन इनके आधार पाताललोक को स्पर्श करेंगे कलियुग का अंत हो जाएगा। ऐसा माना जाता है कि आज भी मार्कण्ड मणि इसके नीचे ही दबा हुआ है। मतङ्ग ऋषि के नाम पर ही इनका नाम मतङ्गेश्वर पड़ा है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर आदिदेव महादेव और माँ पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था। इ...

सनातन धर्म और हम

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सनातन वास्तुशिल्प कितना अद्भुत, अकल्पनीय और रहस्यमय रहा है इसका प्रमाण तो यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याप्त है। श्री नेल्लीअप्पयर मन्दिर, तिरुनेलवेली, तमिलनाडु के ४८ विलक्षण खम्भों में से प्रत्येक को एक अखण्ड पाषाण शिला से निर्मित किया गया है। (चित्र-साभार) सनातनी शिल्पकला कितना वैज्ञानिक था इसका जीवंत साक्ष्य यह खम्भे हैं। इन खम्बों निर्माण इस प्रकार किया गया है कि इनसे शास्त्रीय संगीत के सभी सात सुरों :- षड़ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद, का शुद्ध ध्वनि उत्पन्न होता है। ध्यान रखें, यह निर्माण १३०० वर्ष पूर्व किया गया है। गर्व करें कि वैदिक काल में जो भी हमारे सनातनी पूर्वजों ने बनाकर हमें सौंप गए हैं उनकी प्रतिकृति भी आज वर्तमान समय में आधुनिक विज्ञान से नहीं बनाया जा सकता है। अकल्पनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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दक्षिण का कैलाश (वल्लीअंगिरी पर्वत) समुद्रतल से १००० मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि जो इन पर्वतों पर चढ़कर भगवान शिव के दर्शन करते हैं उन्हें कैलाश मानसरोवर से समान तृप्ति, सन्तुष्टि, आंनद और पुण्य प्राप्त होता है। पुराणों में वर्णन है कि पराशक्ति का अवतार देवी कन्याकुमारी के रूप में देवाधिदेव महादेव की अर्धांगिनी बनने के लिए हुआ। माँ भगवती ने यह प्रतिज्ञा लिया कि एक निश्चित समय में प्रभात होने से पूर्व ही भगवान महादेव से उनका विवाह हो यदि ऐसा नहीं होता तो वे अपने काया को समाप्त कर लेंगी। यही प्रतिज्ञा कर उन्होंने तपस्या आरम्भ किया। परमपिता देवाधिदेव महादेव उनके तपस्या से प्रसन्न हो उनसे विवाह हेतु कैलाश से दक्षिण दिशा में प्रस्थान किए।  परंतु बहुत सारे लोग इस विवाह के विरुद्ध थे और विवाह रोकने के लिए व्यवधान करने लगे। इसी षड्यंत्र में छल से उन्होंने बहुत से कर्पूर जला कर प्रभात होने का भ्रम उत्पन्न कर दिया। इस भ्रम में कि वह पवित्र मुहूर्त व्यतीत हो गया, भगवान महादेव अत्यंत व्यथित हो वापस लौटने लगे। लौटने के क्रम में भगवान महादेव वल्लीअंगिरी पर्वत पर विश्राम ...

सनातन धर्म और हम

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किसी राष्ट्र को अंदर से घुन खाए लकड़ी के जैसा निर्बल और नष्ट करना हो तो उसके इतिहास को मटियामेट कर दो। यही सबसे अधिक प्रभावी रणनीति होती है। आर्यावर्त भरतखण्ड के शौर्य पराक्रम भाव को समाप्त करने हेतु सिकुलर/लिब्रांड/वामी/कांगी गैंग ने यही किया। इस गैंग ने इतिहास में इतना मिलावट किया कि उसे गल्प-साहित्य या लुगदी-उपन्यास जैसा बनाकर रख छोड़ा। हमारा वैभवशाली इतिहास यह है कि..... चोलों ने २१०० वर्ष राज किया.! चालुक्यों ने ७०० वर्ष राज किया.! पांड्यों ने ८०० वर्ष राज किया.! सातवाहनों ने ५००वर्ष राज किया.! अहोम राजवंश ने ७०० वर्ष राज किया.! पल्लवों ने ६०० वर्ष राज किया.! चंदेलों ने ४०० वर्ष राज किया.! राष्ट्रकूटों ने ५०० वर्ष राज किया.! मौर्य वंश ने ५५० वर्ष राज किया.! गुप्त वंश ने ४०० वर्ष राज किया.! और विधर्मी मलेच्छ मुगलों ने मात्र २०० वर्ष राज किया.! (सम्पूर्ण देश पर एक साथ इन मलेच्छों का राज मात्र इतना ही रहा है) इसके अतिरिक्त शुंग राजवंश, नंद राजवंश, कुषाण आदि अनेक राजवंशों की बात छोड़ भी दें तो इस सत्य को कोई झुठला नहीं सकता है। पर विडम्बना है कि हमारे (कथित) इतिहास की पुस्तकों में वैभ...

सनातन धर्म और हम

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जब तक राजतंत्र "सनातन धर्म" के अनुशासन, संरक्षण, निर्देशन में संचालित होता रहा तो उस साम्राज्य का यश चहुँ ओर विख्यात रहा था। उसी श्रेणी में महान विजयनगर साम्राज्य भी रहा है। आज भी विजयनगर साम्राज्य के भग्नावशेष हम्पी में अपने गौरवशाली इतिहास की महागाथा विश्व को सुना रहे हैं। यह दुर्लभतम "पञ्चमुख" शिवलिङ्गम हम्पी, कर्नाटक से प्राप्त है। (चित्र-साभार) इस अप्रतिम शिवलिङ्गम में रूद्रावतार आञ्जनेय महावीर जी उकीर्ण हैं। अपने यौवनावस्था में यह साम्राज्य कितना वैभवपूर्ण रहा होगा यह सोचकर ही रोमांच होता है। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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श्री पद्मनाभस्वामी मन्दिर, केरल, सम्पूर्ण विश्व में सबसे धनी सनातनी आध्यात्मिक स्थल, मन्दिर और साधना केन्द्र है। इसकी सम्पदा का अनुमानतः १.२ लाख करोड़ या १.२ ट्रिलियन (US$ 17 BILLION) लगाया गया है। प्रति वर्ष ग्रीष्म विषुव (summer equinox) में सूर्य की किरणें सीधी रेखा में गमन करते हुए मन्दिर के केंद्रीय "गोपुरम" से एक समान समय अंतराल के पश्चात निकलती हैं। इस केंद्रीय गोपुरम का निर्माण सहस्रों वर्ष पूर्व किया गया है जो १०० फीट (३० मीटर) का है। अब सोचिए वर्तमान आधुनिक काल में भी अधिकांश लोगों को विषुव (equinox) और अयनांत (solastice) का ज्ञान नहीं होता है तो उस काल में किस उत्कृष्ट ज्ञान और उपकरणों का उपयोग कर इस अद्वितीय मन्दिर को बनाया गया होगा.?? हमारे पूर्वजों ने पुरातन काल में ही पृथ्वी का आकार, पृथ्वी के अक्ष, पृथ्वी के घूर्णन गति, अक्ष के झुकाव (inclination of earth axis) और अंडाकार कक्षा (elliptical orbit) के रहस्यों को सुलझा लिए थे। उनके लिए अंतरिक्ष का कोई भी रहस्य अज्ञात नहीं था। इस प्रकार का कॉस्मिक संलयन (cosmic fusion) किसी भी स्थापत्य संरचना में सम्पूर्ण विश्व में...

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आपने अखण्ड पाषाण शिला से निर्मित प्रतिमाएँ, मूर्तियाँ, क्रीड़ा सामग्री इत्यादि बहुतायत में देखे होंगे। किन्तु क्या पत्थर के एक ही चट्टान से निर्मित सम्पूर्ण जोड़-रहित अखण्ड मन्दिर देखा है.??  अब तो सोचने को विवश हो जाएँगे.!! परन्तु सनातनी शिल्पकार पूर्वजों ने इस असम्भव को भी सम्भव कर दिखाया और वो भी आज से सहस्रों वर्ष पूर्व ही। श्री पाएर (पाएच) शिव मन्दिर वह अकल्पनीय दुर्लभ मन्दिर है जो अखण्ड पाषाण शिला से निर्मित है। (चित्र-साभार) श्री पाएर शिव मन्दिर, पुलवामा, कश्मीर में है। इस मन्दिर में कहीं भी जोड़ नहीं है। मन्दिर में अनुपम शिवलिङ्गम स्थापित हैं। मन्दिर में सुन्दर आकृतियों, अलंकरणों को उकीर्ण किया गया है। देवशिल्पी विश्वकर्मा के आशीर्वाद से ही सनातनी वास्तुशिल्पकारों द्वारा इस मन्दिर का निर्माण सम्भव हुआ होगा। इस मन्दिर को लगभग १५०० वर्ष प्राचीन माना जाता है। कभी इस मन्दिर में भी रुद्राष्टकम का पाठ किया जाता था। कभी यहाँ भी शिव-भक्त आस्था से अविभूत हो रूद्राभिषेक करते थे। परंतु रेगिस्तानी पशुओं के वर्णसंकरों ने सनातन के प्रति अपने जन्मप्रद्त्त द्वेष और शत्रुता में इतना अत्याचार उ...