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Showing posts from January, 2025

सनातन धर्म और हम

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प्राचीन सनातनी शिल्प शैली क्या थी इसे वामियाें के लुगदी उपन्यास (कथित इतिहास) को पढ़ कर नहीं जान सकते हैं। क्योंकि उनके उपन्यास में शिल्प कला में प्रयुक्त यंत्र "छेनी हथौड़ी" तक जाकर ही रुक गया है। इस मूर्ति के मुखमंडल, वस्त्र, आभूषणों, अलंकरणों के बनावट को ध्यान से देखिए...!! क्या इसकी कोई तुलना हो सकता है.?? अब उस विशिष्टता की ओर ध्यान दें जो वामियों के कपोल कल्पित कथा की प्रामाणिकता को तार तार कर देगा। इस मूर्ति के मस्तक में एक कान से दूसरे कान तक एक सूक्ष्म छेद बना हुआ है। अब इस पर चिंतन करें कि माना बाह्य अलंकरण को "छेनी हथौड़ी" से बना दिया होगा परंतु इस सूक्ष्म छेद को कैसे बनाया गया होगा??? यह भी ध्यान रखें कि ग्रेनाइट की कठोरता Moh's scale पर ८ है जो इसे डायमंड के पश्चात सबसे कठोर पाषाण बनाता है। और उस काल में इलेक्ट्रिकल ड्रिल मशीन नहीं होता था। तो यह सूक्ष्म छेद किस विधि, तकनीक से बनाया गया होगा.?? यह मन्दिर नौवीं शताब्दी का निर्माण है जिसमें संगीत स्तम्भ बने हुए हैं जो थाप देने पर सभी सातों स्वरों की ध्वनि सुनाते हैं। आप इस मूर्ति के निर्माण में प्रयुक...

सनातन धर्म और हम

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जब कोई शिल्पकार अनगढ़ पत्थर को काट कूट कर अपने कल्पना को मूर्त रूप देता है और "मूर्ति" का निर्माण होता है। परंतु जब कोई भक्त अपने आराध्य देव की भक्ति में उच्चतम स्तर पर होता है तो देव प्रेरणा से "विग्रह" का निर्माण स्वत: हो जाता है। भक्त को कुछ कल्पना करने की आवश्यकता ही नहीं होता है। और इस प्रकार जो भी निर्मित होता है वह अद्भुत, दुर्लभतम, अतुलनीय और अकल्पनीय ही होता है। मूर्ति तो निर्जिव होती है किन्तु विग्रह सजीव होते हैं क्योंकि वे प्राणप्रतिष्ठित होते हैं। इस अद्भुत शिवलिङ्ग को ही देखें...!! यह अप्रतिम शिवलिङ्ग उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जनपद में अवस्थित है। भवानीगांव में फुलमती भवानी के सरोवर पर यह अद्भुत शिवलिङ्ग विराजमान हैं। (चित्र - साभार) इस शिवलिङ्ग में कितनी विलक्षणता एक साथ समाहित हैं। इस अनुपम शिवलिङ्ग में देवी की मुखाकृति, नाग,  जल- लहरी (अरघा) सभी अपने आप में अनूठा है। इन्हें जिन सनातनी शिव भक्त ने बनाया होगा उनके अहोभाव के स्तर को सोचकर ही रोमांच होता है। इस शिवलिङ्ग के लिए तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही शिवालय हो गया है। यहां शिव भक्त अपने भाव को अर्पण करन...

सनातन धर्म और हम

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शिल्प कला में निपुणता, पारंगतता, उत्कृष्टता, संपूर्णता क्या होती है यह इस नृत्य-मुकुट में परिलक्षित हो रहा है। बिना अखण्ड समर्पण और एकाग्रता और भक्ति भाव के यह निर्माण असंभव सा प्रतीत होता है। मुखाकृति के ऊपर व नीचे बने नाग-बंध पर ध्यान दें.... कितना अद्भुत दृश्य निखर उठा है.!! नृत्य मुकुट का एक एक ईंच सनातन शिल्पकार के शिल्प विधा को धन्य धन्य कह रहा है। नृत्य-मुकुट (केरल) ....!!! वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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ये अनुपम, अद्भुत शिवलिङ्गम हैं जो अपने आप में विशिष्टता लिए हुए हैं। इस शिवलिङ्गम पर एक हँस और एक वाराह उकीर्ण हैं। शिखर पर नागछत्र बने हुए हैं। इस अनुपम शिवलिङ्गम को लिङ्गोद्भव के रूप में जाना जाता है। यह शिवलिङ्गम पुराण में एक प्रचलित मनोहर कथा पर निर्मित हैं। एक बार श्री विष्णु और श्री ब्रह्मदेव में "श्रेष्ठता" को लेकर विवाद हो गया। बात बढ़ता गया और.. उसी समय एक दिव्य ज्योतिर्मय स्तम्भ प्रकट हुआ जिससे सतत अग्नि उत्पन्न हो रहा था। उन दोनों देव को यह आकाशवाणी से आदेश प्राप्ति हुई कि जो भी इस दिव्य ज्योति स्तम्भ के "आदि" वा "अंत" को ज्ञात कर लेंगे वे ही सर्वश्रेष्ठ घोषित होंगे। श्री ब्रह्मदेव हँस के रूप में आकाश की ओर और श्री विष्णु वाराह के रूप में पाताल की ओर प्रस्थान किये। लेकिन दोनों ही इस दिव्य ज्योति स्तम्भ के आदि-अंत को नहीं पता कर पाए। और अन्ततः दोनों ही हारकर देवाधिदेव महादेव के समक्ष नतमस्तक हो गए। देवाधिदेव महादेव के द्वारा दोनों को ही अपने-अपने कार्य क्षेत्र में समान रूप से श्रेष्ठ घोषित किया गया। यह लिङ्गोद्भव शिव विग्रह त्रिशुण्ड गणपति मन्दिर...

सनातन धर्म और हम

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एक अतुलनीय, अद्वितीय, सौन्दर्यपूर्ण चौमुख शिवलिङ्गम.!! मेवाड़ महाराजाओं द्वारा निर्मित २५० स्मृति-स्थलों में से एक में स्थापित यह चौमुख शिवलिङ्गम मन्त्रमुग्ध करने वाले हैं। यह सम्मोहित करनेवाले स्मृति-स्थल ३५० वर्ष पूर्व उदयपुर में १९ महाराजाओं के स्मृति में बनवाया गया था। यह दर्शनीय चौमुख शिवलिङ्गम आहड़ (महासतियाँ), उदयपुर, राजस्थान में स्थापित हैं। सौंदर्यपूर्ण सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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इतिहास को कागज पर लिखने की कला तो आधुनिक युग में विकसित किया गया है। परंतु हमारे सनातनी पूर्वजों ने तो सम्पूर्ण इतिहास को प्राचीन काल में ही पाषाण शिला पर गढ़ कर हमारे लिए रख छोड़े है। अब यह भिन्न बात है कि इस इतिहास की लिपि और भाषा को पढ़ना अतिआधुनिकता में अंधे होकर रहने वाले मनुष्यों को आता भी है या नहीं। महाभारत युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था और इस इतिहास को पाषाण शिला पर चित्रों की लिपि में लिखवाने का श्रेय जाता है होयसल नरेश विष्णुवर्धन को। नरेश विष्णुवर्धन ने होयसलेश्वर मंदिर के भीत पर इस इतिहास लेखन का आरंभ ११२१ ई में करवाया और यह कार्य सम्पन्न हुआ ११६० में। इस कार्य संपादन में सनातनी शिल्पकारों के अथक परिश्रम, प्रयास, निपुणता और समर्पण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस मन्दिर के भीत पर सम्पूर्ण चक्रव्यूह, वाणवर्षा, गज युद्ध, रथ युद्ध आदि को जीवन्त रूप में चित्रित किया गया है। (सभी चित्र - साभार) होयसल साम्राज्य का ध्वज १५० वर्षों तक लहराता रहा था। परंतु इस अद्वितीय सनातनी धरोहर पर रेगिस्तानी पशु की कुदृष्टि पड़ गई। और विधर्मी म्लेच्छ मलिक कफूर के जंगली झुंड ने चौदहवीं शताब्दी के पू...

सनातन धर्म और हम

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ऐसा हो सकता है... और ऐसा हुआ भी है कि... तलवार के बल पर "तिलक" को 'दाढ़ी' में परिवर्तित कर दिया गया.!! परन्तु वे अपने असंख्य प्रयासों के पश्चात भी सत्य सनातन धर्म के प्रमाणों को मिटा नहीं सके। आज भी यह धरा यत्र यत्र सर्वत्र सनातन संस्कृति के प्रमाणों को जगत के समक्ष प्रस्तुत करती रहती है। भगवान श्री नरसिंह देव की यह अनुपम प्रतिमा अफगानिस्तान से प्राप्त की हुई है। भगवान श्री नरसिंह स्वामी की यह प्रतिमा डेढ़ सहस्र वर्ष से अधिक प्राचीन है। ऐसा प्रतीत होता है कि श्री नरसिंह स्वामी सनातन धर्म के समस्त शत्रुओं के दलन के उपरांत अपने खड्ग के मूठ पर अपनी चिबुक टिका कर भविष्य की लीला हेतु विचार करने में लीन हैं। जिस सनातनी शिल्पकार ने इस प्रतिमा को गढ़ा है उसके मानसिक स्तर का सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि वे किस उच्च स्तरीय कल्पनाशीलता के कलाकार रहे होंगे.!! धन्य हैं वे सभी सनातनी शिल्पकार जिन्होंने अपने भविष्य की पीढ़ियों के लिए यह शिल्प निधि सृजन कर छोड़ गए.!! गौरवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय श्रीमन्नारायण🙏🌺 जय महाकाल 🙏🌺🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

कब तक वामियों, कांगियों के कपोल कल्पित कहानियों पर विश्वास करते रहेंगे कि आर्यावर्त में मात्र "ताजमहल" ही 'world wonder' है। एक बार दृष्टि सनातन संस्कृति के अतुलनीय वास्तुशिल्प कृतियों "मन्दिरों" पर डालें। चहुँ ओर wonders ही wonders दिखाई देंगे। ये श्री मुरुदेश्वर मन्दिर, कर्नाटक हैं। (चित्र - साभार) क्या इनकी तुलना विश्व के किसी भी wonders से किया जा सकता है.?? इस मन्दिर के वास्तुशिल्प निर्माण में जो उत्कृष्टता प्रदान किया गया है वह स्वतः ही शिल्पकार के हाथों की निपुणता को परिलक्षित करता है। विभिन्न तलों में एकरूपता और लय-संयोजन का कोई तुलना नहीं हो सकता है। यह सनातनी पूर्वजों के हाथों से निर्मित गौरवशाली सम्पदा है जिस पर सभी सनातनियों को गर्व है। गौरवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा