Posts

सनातन धर्म

Image
आज हरिशयन एकादशी व्रत है। आज से श्री हरि नारायण विष्णु सृष्टि संचालन के कार्य को भगवान शिव परिवार को सौंप क्षीर सागर में निद्रालीन हो जाएंगे। चतुर्मास आरम्भ हो रहा है, देवोत्थान एकादशी तक प्रभु महादेव परिवार ही सभी संचालन करेंगे। इस बार अधिकमास भी देवाधिदेव महादेव का पवित्र श्रावण मास ही है। शिव भक्ति में आईए एक अद्वितीय, अद्भुत शिवलिङ्गम के दर्शन लाभ प्राप्त करें। (इन्हें ज़ूम कर के देखें) यह पञ्चमुख दर्शन स्थल, अरुणाचलम तिरुवन्नामलाई, तमिलनाडु में स्थापित हैं। (चित्र - साभार) इस दुर्लभतम शिवलिङ्गम का जल-लहरी (अरघा) ऐसा है जैसे कोई पद्मासन लगाकर बैठा हो। ये पद्मासन वाले पांव किसी देवी के हैं (पुरुष के नहीं हैं)। सनातनी शिल्पकार ने आराध्य देव के प्रेरणा से इसे इस प्रकार निर्मित किया है जैसे कोई देवी (जया) अपने भीतर शिव को प्राप्त कर पद्मासन लगाकर साधना में लीन हो। दोनों पांवों का निर्माण अत्यंत ही कलात्मक और सौंद्रयपूर्ण ढंग से किया गया है। इस अद्वितीय शिवलिङ्गम का दिव्य ऊर्जा समस्त जगत को आनंदित कर रहे हैं। अनमोल सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

Image
विश्व के WONDERS (वण्डर्स, आश्चर्य, अजूबों) की खोज कर सूची बनाने वाले को एक बार तो सम्पूर्ण आर्यावर्त का भ्रमण कर मन्दिरों, धार्मिक स्थलों, पुरातन स्मारकों, राजप्रासादों का उचित अवलोकन एवं मूल्यांकन कर सूची बद्ध करना चाहिए था।  परन्तु  वामजीवियों के निकृष्ट, घृणित सोच व छल कपट एवं षड्यंत्र के कारण यह हो न सका.!! अन्यथा WONDERS (वण्डर्स, आश्चर्य, अजूबे) की सबसे बड़ी संख्या आर्यावर्त से ही मिलता। ये हैं श्री वृहदेश्वर मन्दिर। देवाधिदेव महादेव को समर्पित है यह विराट मन्दिर। श्री वृहदेश्वर मन्दिर तंजावूर, तमिलनाडु में स्थित हैं। इस मन्दिर के निर्माण में चट्टानों को जोड़ने हेतु किसी भी प्रकार के गारे/सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया है। वास्तव में यह मन्दिर "interloking system" से बने मन्दिर का उत्कृष्ट कृति है। १,३०,००० टन भार के पाषाण शिलाओं का उपयोग इसे बनाने में किया गया है। भारत के छः बड़े भूकम्प को झेलने के बाद भी यह ज्यों का त्यों अपने स्थान पर सगर्व खड़ा है। १५०० वर्षों के झंझावातों को सहने के पश्चात भी यह अकल्पनीय वास्तुशिल्प अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ खड़ा है। इस मन्दिर के विमान ...

सनातन धर्म

Image
श्री त्र्यंबकेश्‍वर मन्दिर.!!! नासिक, महाराष्ट्र। त्र्यंबकेश्‍वर ज्योर्तिलिंग मन्दिर महाराष्ट्र-प्रांत के नासिक जनपद में त्र्यंबक गाँव में हैं। यहाँ के निकटवर्ती ब्रह्म गिरि नामक पर्वत से गोदावरी नदी का उद्गम है। गौतम ऋषि तथा गोदावरी के प्रार्थनानुसार भगवान शिव इस स्थान में वास करने की कृपा की और त्र्यंबकेश्‍वर नाम से विख्यात हुए। मन्दिर के अंदर एक छोटे से कुण्ड में तीन छोटे-छोटे लिङ्ग हैं। ये त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और शिव- इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं। गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्र्यंबकेश्‍वर मन्दिर कृष्णवर्णा पाषाणों से निर्मित है। (चित्र - साभार) मन्दिर का स्‍थापत्‍य अद्भुत है। इस मन्दिर के पंचक्रोशी में कालसर्प शांति, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबलि की पूजा संपन्‍न होती है। इन क्रियाओं को भक्‍तजन विभिन्न मनोकामना पूर्ति हेतु करवाते हैं। इस प्राचीन मन्दिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था। इस मन्दिर का जीर्णोद्धार १७५५ में आरम्भ हुआ था और इकत्तीस वर्ष के लंबे अवधि के पश्चात १७८६ में सम्पूर्ण हुआ। कहा जाता है कि इस भव्य मन्दिर के निर्...

सनातन धर्म

Image
सत्य सदैव ही कल्पना से भी विचित्र होता है..!!! अद्वितीय, अतुलनीय, अकल्पनीय..!!!! १५०० वर्ष पूर्व, ३०० वर्षों तक, २० पीढ़ियों ने पहाड़ को उपर से नीचे की ओर बढ़ते हुए क्रम में पत्थरों को काट - काट कर बनाया है यह "श्री कैलाश मन्दिर".! सामान्यतः किसी भी मन्दिर, भवन आदि का निर्माण आधार से शिखर की ओर बढ़ते हुए क्रम में किया जाता है। परंतु इस मन्दिर की ठीक इसके विपरित शिखर से आधार की ओर बढ़ते हुए क्रम में किया गया है। श्री कैलाश मन्दिर, वेरुल लेणी, सम्भाजी नगर, महाराष्ट्र। (चित्र - साभार) विश्व के किसी भी स्मारक से लाखों गुणा सुन्दर और आकर्षक है यह मन्दिर समुच्चय। सनातनी पूर्वजों के पाषाण शिल्प कला का अद्भुत उदाहरण है। संपूर्ण सनातन पौराणिक कथाओं के शिल्प निर्मित हैं इस मन्दिर में। इस मन्दिर में श्री हरि नारायण विष्णु अवतार, भगवान देवाधिदेव महादेव से लेकर रामायण, महाभारत आदि को भी मूर्तियों के रूप में दर्शाए गए हैं। यह सम्पूर्ण निर्माण जब आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं था तब का निर्माण है, वो भी १५०० वर्ष पहले का। बिना किसी विद्युत चालित यंत्रों के और बिना कंप्यूटर ग्राफिक्स की सहायता के, ज...

सनातन धर्म

Image
हमारे सनातनी पूर्वजों ने कितने श्रमसाध्य शिल्पकारी को इतने कुशलता और निपुणता पूर्वक अपने इतिहास को पाषाण पर मूर्तियों/चित्रों के रूप में लिख दिया है जो यह किसी अन्य किताबी मज.हब में देखने को नहीं मिलता है। इस पाषाण कृतियों को देखकर वामियों/भीमटों का यह दुष्प्रचार कि ब्राह्मणों ने अन्य जातियों को धर्मग्रंथों को पढ़ने से वंचित रखा था, भी खंडित हो जाता है। इस मूर्ति को ज़ूम कर ध्यानपूर्वक देखें.!! (चित्र-साभार) इसमें रामायण (अरण्यकाण्ड) के एक कथा का सम्पूर्ण चित्रण किया गया है। अब विचार करें कि यदि ब्राह्मणों ने अन्य जातियों को धर्मग्रंथ नहीं पढ़ने दिया तो इस सनातनी शिल्पकार ने इतने विस्तार पूर्वक वर्णन सहित इस प्रतिमा का निर्माण किस प्रकार किया.?? क्योंकि प्रत्येक छोटी छोटी बातों को इतने सटीकता से ग्रँथ को पढ़े बिना निर्माण करना असंभव है। इस चित्र में कबन्ध (अर्थात धड़ नेतृत्वहीन) दानव के प्रभु श्री राम के हाथों मुक्ति की कथा को चित्रित किया गया है। कबन्ध दानव वास्तव में एक गन्धर्व था। उसका नाम विश्ववासु था। यह श्री नामक अप्सरा का पुत्र था। विश्ववासु ने अपने तपश्चर्या द्वारा सृष्टिकर्ता ब्रह्...

सनातन धर्म

Image
श्री कोपिणेश्वर मन्दिर में स्थापित वृहत शिवलिङ्गम है। इनका वास्त्विक नाम कौपीन पर आधारित कौपिनेश्वर रहा होगा जो कालांतर में कोपिणेश्वर हो गया है। इस शिवलिङ्गम की ऊंचाई ५' फीट और परिधि भी ५' फीट हैं। श्री कोपिणेश्वर मन्दिर भगवान शिव को समर्पित हैं। श्री कोपिणेश्वर शिवलिङ्गम महाराष्ट्र के ही नहीं आर्यावर्त  सबसे वृहद शिवलिङ्ग में से एक हैं। श्री कोपिणेश्वर महादेव ठाणे के संरक्षक देव हैं। मन्दिर का निर्माण शिलाहारा वंश के शासकों द्वारा करवाया गया था। मन्दिर में टूट फूट होने पर इसका जीर्णोद्धार एवं पुनर्निर्माण १७६० ई. में करवाया गया। आवश्यकता होने पर मन्दिर के गर्भगृह के समक्ष वृहत कक्ष को संग्रहित धन एवं दान एकत्र कर १८७९ में बनवाया गया। इस मन्दिर का सबसे तात्कालिक जीर्णोद्धार १९९६ ई. में किया गया है। मन्दिर में दो प्रवेश द्वार हैं - १. मसुंडा झील के सामने, २. जंभली नाका मंडी के अंदर। मन्दिर के प्रवेश द्वार पर नन्दी महाराज स्थपित हैं। मन्दिर परिसर में श्री ब्रह्मदेव, श्रीराम, श्री उत्तरेश्वर (काशी विश्वलिङ्गेश्वर), श्री दत्तात्रेय, माँ काली, माँ शीतला(थटकाई), श्री आञ्जनेय, गरूड़ ...

सनातन धर्म

Image
अद्वितीय, अकल्पनीय, अद्भुत शिल्प जिसे हमारे सनातनी पूर्वजों ने अपने हाथों से निर्मित किया है। जैसा कि वामपंथी इतिहासकार ने ताजमहल, क़ुतुबमीनार को मुगलों का बनाया हुआ बताता रहा है, क्या  ऐसा एक भी उदाहरण इस प्रतिमा के जैसा समकालीन मुगलों के देशों में बना हुआ दिखा सकता है?? इस दिव्य शिल्पकला को वामपंथियों, गुलाबों के वंशजों ने इतिहास से ही मिटा दिया है। यह मुग्ध करने वाली वाद्ययंत्र सह देवी की मूर्ति श्री चेन्नाकेशवा मन्दिर, बेलूर, कर्नाटक में है। (चित्र - साभार) इसके जैसा आभूषणों, नैन - मुखाकृति, और भाव-भंगिमाओं का जीवंत प्रदर्शन अन्य किसी मूर्ति में दृष्टिगोचर नहीं होता। इसके नयनों, भाल, चिबुक, बिरौनियों, ओष्ठों, नासिका के गढ़न, स्कंधों के ढलान, कमर की कमनीयता, उंगलियों के घुमाव को ध्यान से देखें तो आप शिल्पकार के कला निपुणता और दक्षता से चमत्कृत हो जाएंगे। इस वाद्ययंत्र के तार तक को पाषाण से ही निर्मित किया गया था, जो अब खंडित हो गया है। और यह ध्यान रखें कि कि यह संपूर्ण निर्माण जोड़ रहित अखण्ड पाषाण शिला से ही किया गया है तो कितनी सावधानी बरतनी पड़ती होगी.?? कितनी कुशलता पूर्वक एक...