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Showing posts from March, 2024

सनातन धर्म और हम

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नवरात्र चार होते हैं.... १ वासंती नवरात्र - चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से इसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना होती है। २. ग्रीष्म नवरात्र - इसे गुप्त नवरात्रि भी कहा जाता है। यह आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होता है और इसमें दस महाविद्या साधना किया जाता है। ३.शारदीय नवरात्र - यह आश्विन शुक्ल प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होता है और नौ दुर्गा का आराधना करते हैं। ४. शिशिर नवरात्र - यह भी गुप्त नवरात्रि पर्व है। यह माघ शुक्ल प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होता है और दस महाविद्या साधना किया जाता है। सनातनी पूर्वजों द्वारा देवी/देवों के अनेकानेक प्रतिमाएं भिन्न भिन्न भाव भंगिमाओं में देवालयों, मन्दिरों, धार्मिक स्थलों आदि पर बड़े ही मनमोहक रूप में गढ़े गए हैं। माँ भगवती महिषासुरमर्दिनी की इस अनुपम प्रतिमा को ही देखें.! (चित्र – साभार) माँ अम्बे की यह षोडशभुजी प्रतिमा "रानी की बाव" पाटन, गुजरात में स्थित है। रानी की बाव गुजरात में पवित्र सरस्वती नदी के तट पर ग्यारहवीं शताब्दी में निर्मित किया गया था जो एक राजा के स्मारक के रूप में बनाया गया था। बाव या बावड़ी आर्यावर्त भरतखण्ड भूमि का भूमिगत जल ...

सनातन धर्म और हम

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इस मन्दिर को देखकर अपने पूर्वजों के शिल्पकला और स्थापत्य कला के ज्ञान पर सिर गर्व से उठ जाता है। इसे बनाने में लगे समय परिश्रम की कल्पना से ही एक रोमांचक अनुभूति होती है। इस मन्दिर में एक ईंच भी स्थान ऐसा नहीं है जहाँ शिल्पकारी नहीं किया गया हो। श्री उमामहेश्वर, श्री हरि विष्णु, माँ भगवती, आदि आदि अनेकों देवी, देवों को कितने मनमोहन रूप में गढ़ा गया है। गज, अश्व, नर्तकों, पहियों के शृंखला को जिस एकरूपता और सम्पूर्णता से उकीर्ण किया गया है उसकी कोई तुलना नहीं है। बेल बूटे से जिस प्रकार इसके सौन्दर्य को बढ़ाया गया है उसकी व्याख्या भी संभव नहीं है। कितना महान सनातन धरोहर है ये...!!! क्या वास्तव में भारतवर्ष में एक ही आश्चर्य "तेजोमहालय" ही है.??? यह लक्ष्मी-नरसिंह मन्दिर हरणहल्ली, कर्नाटक में स्थित है। (चित्र – साभार) इसकी सुंदरता को ध्यान से देख इसका आनन्द लें.! अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय माँ महालक्ष्मी🙏🌺 जय श्री हरि नारायण 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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क्रूर, अत्याचारी विधर्मियों ने सनातनी मंदिरों भवनों को सदा ही विनष्ट विखंडित किया। शासन में अत्याचार से अधिकार किया। यहां तक कि इतिहास को बदलने का यथासंभव कुचेष्टा किया। पंरतु क्या संसार से सनातन धर्म के चिन्ह को कोई मिटा पाया.?? महान सनातन धर्म का अमिट छाप पग - पग पर मिलेगा। महान काकतीय वंश का राजधानी रहा है वारंगल। इसकी स्थापन ११६३ ई. में किया गया था। काकतीय वंश साम्राज्य के प्रथम नरेश रुद्रदेव प्रथम रहे हैं। इस साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली शासक गणपतिदेव रहे जिन्होंने ६३ वर्षों तक शासन किया। काकतीय वंश साम्राज्य के अंतिम नरेश प्रतापरुद्र रहे। काकतीय वंश के शासकों ने पाषाण वास्तुशिल्प और शिल्पकला मूर्तिकला को संरक्षण दे कर अनेक मंदिरों, तोरण द्वार, राजप्रासाद का निर्माण करवाए। परंतु रेगिस्तानी पशुओं को हीन भावना के कारण सनातन धर्म से जन्म प्रदत्त द्वेष/शत्रुता रहा। और १३०९ ई. में असभ्य विधर्मी अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने एक लाख की सेना ले इस साम्राज्य को तहस - नहस कर दिया। उस विधर्मी मलिक काफूर के सेना में जिस प्रकार हिनूओं के ही गद्दार था। आज उसी गद्दार के वंशज डीएनए जीवी...

सनातन धर्म और हम

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आज तक लोकतंत्र में सनातनी ने जिसका भी भरपूर समर्थन किया उससे भी क्यों छला जाता है.?? हमारे सनातनी स्वजनों के धन और दान से बने मन्दिर को "सिकुलर नौटंकी का अड्डा" बना दिया जाता है। जानबूझ कर बलपूर्वक सनातनी मन्दिरों में विधर्मियों को प्रवेश दिलाया जाता है। और सनातनी निरीह प्राणी के भांति मूक दर्शक बना रह जाता है। जो इसके समर्थन से ही सत्ता का आनन्द लेता है वह सत्ता जीवी भी इसे ही क्यों दुत्कार देता है.?? इस यक्ष प्रश्न का एक ही उत्तर है कि सनातनी आपने धर्म के प्रति धर्मनिष्ठ नहीं है। जो आपने पंथ, मज हब के प्रति कट्टर है उसके लिए सत्ता जीवी किसी भी प्रकार से चरण चाटुकार बनकर कार्य करने को लालायित रहता है। एक बार पीछे मुड़कर देखें कि हमने क्या - क्या छोड़ा....... १. चोटियाँ छोड़ी... २. टोपी, पगड़ी छोड़ी... ३.  तिलक, चंदन छोड़ा... ४. अचकन कुर्ता छोड़ा... धोती छोड़ी... ५. यज्ञोपवीत छोड़ा... ६. संध्या वंदन छोड़ा... ७. वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण पाठ, गीता पाठ छोड़ा... ८. स्त्रियों/कन्याओं ने साड़ी छोड़ी...बिछिया छोड़े.. चूड़ी छोड़ी... दुपट्टा , चुनरी छोड़ी... मांग, बिन्दी छोड़ी... जूड़...

सनातन धर्म और हम

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क्या यह कभी भी सम्भव है कि किसी सनातनी धार्मिक चिह्न का छाप या निर्माण किसी ^स्जिद में किया गया हो.?? ऐसा सम्भव ही नहीं हो सकता.!! तो फिर जा मा ^स्जिद अहमदाबाद के स्तम्भ में सनातनी धार्मिक प्रतीकों का निर्माण कैसे हुआ.?! (चित्र-साभार) वास्तव में यह ^स्जिद मूल रूप से मन्दिर ही था जिसे अत्याचारी रेगिस्तानी पशु ने हड़प लिया और ^स्जिद में परिवर्तित कर दिया। यह मन्दिर माँ भद्रकाली को समर्पित था। इस भद्रकाली मन्दिर का निर्माण कर्णावती के राजपूत राजाओं ने आठवीं सदी में करवाया था। अहमदाबाद का ऐतिहासिक मूल नाम कर्णावती ही रहा है। यह दृश्य व्यथित करता है.!! Zoom करके देखें.!! अतुलनीय सनातन धरोहर जो घरवापसी की प्रतीक्षा में है...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय माँ भवानी 🙏🌹 जय महाकाल 🙏🌹🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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हमारे पूर्वजों ने जितने भी सनातनी शिवालयों/मन्दिरों का निर्माण किया किया है सबके पीछे कोई न कोई अद्भुत कथा छिपी हुई है। ये कथा विश्वविख्यात वैभवशाली नेल्लीएप्पियर शिव मन्दिर के पीछे की है। श्री नेल्लीएप्पियर प्रभु के बारे में एक कथा प्रचलित है : एक निर्धन ब्राह्मण थे "वेद शर्मा"। वे शिव के परम भक्त थे। प्रतिदिन वे भिक्षाटन करते और भिक्षा में जो भी प्राप्त होता उसे अपने आराध्य देव परमपिता शिव को समर्पित कर देते थे। एक दिन जब वे भिक्षा में प्राप्त धान को सुखा रहे थे तो अनायास ही वर्षा आरम्भ हो गई। वेद शर्मा भयाक्रांत हो गए कि इस घनघोर वृष्टि में उसके धान बह जाएँगे तो भगवान को क्या अर्पित करेंगे.?? इसीलिए भयवश वे प्रभु से सहायता हेतु प्रार्थना करने लगे। भगवान महादेव उनके याचना से प्रसन्न होकर धान को छाया प्रदान कर सुरक्षित बचा लिए। इस प्रकार प्रभु भोलेनाथ के द्वारा धान की रक्षा के कारण इस स्थान को तिरुनेलवेली कहा जाता है। (Thiru - means beautiful + Nel - means Peddy + Velli - means Fence) और भक्तवत्सल भगवान शिव नेल्लीएप्पियर कहलाए। एक अन्य किंवदंती के अनुसार भगवान शिव अपने लिङ्ग...

सनातन धर्म और हम

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प्रभु भोलेनाथ के शिवालय में शिवलिङ्गम के सामने से भगवान शिव के गण नन्दी ही अनुपस्थित रहें ऐसा कोई कल्पना कर सकते हैं क्या.?? सामान्य रूप में ऐसा सम्भव नहीं है। किन्तु आर्यावर्त में एक ऐसा शिव मन्दिर है जहाँ नन्दी महाराज अनुपस्थित हैं। और इसके पीछे एक अद्भुत पौराणिक कथा है। दक्ष प्रजापति के पुत्री का विवाह भगवान शिव के साथ सम्पन्न हुआ था। परन्तु जब भगवान शिव दक्ष प्रजापति के चरण स्पर्श नहीं किए तो दक्ष प्रजापति इसे अपना अपमान समझ बैठे थे। जब दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया तो सभी देवताओं, ऋषियों आदि को आमंत्रित किया परन्तु भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण पत्र नहीं भेजा गया। माता सती पति की अनिच्छा के विरुद्ध भी जाकर नन्दी महाराज पर सवार होकर अपने पिता के घर यज्ञ स्थल पर चली गईं। किन्तु वहाँ अपने पिता दक्ष प्रजापति और कुछ कुपात्र लोगों द्वारा अपने पति महादेव के अपमान को सहन नहीं कर पाईं। यज्ञ स्थल पर ही देवी सती ने योगाग्नि में आत्मदाह कर लिया। इसकी सूचना मिलने पर भगवान शिव सती वियोग में कुपित और विह्वल हो गए। रुद्र अंश से वीरभद्र उत्पन्न हुए और यज्ञ विध्वंस कर दक्ष प्रजापति के सिर...

सनातन धर्म और हम

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श्री वेंकटेश्वर स्वामी मन्दिर - द्वारका तिरुमला - चिन्ना तिरुपति। श्री वेंकटेश्वर स्वामी मन्दिर, पश्चिमी गोदावरी जिला, आन्ध्र प्रदेश में शेषाचलम पहाड़ी पर स्थित हैं। भगवान श्री हरि नारायण विष्णु श्री वेंकटेश्वर स्वामी के रूप में यहाँ स्थित हैं। श्री वेंकटेश्वर स्वामी के स्वयम्भुव विग्रह को द्वारका नामक सन्त ने खोजा था इसलिए इन्हें द्वारका तिरुमला कहा जाता है। इन्हें चिन्ना तिरुपति भी कहा जाता है। प्रभु का विग्रह कमर से ऊपर दिखाई देते हैं, निचले भाग की कल्पना भूगर्भ में हैं, इनके पवित्र चरणों को पाताल लोक के चक्रवर्ती बलि के दैनिक पूजन के लिए समर्पित किया गया है। मुख्य विग्रह के पार्श्व में भगवान श्री वेंकटेश्वर का पूर्ण आकर के विग्रह हैं। इस पूर्ण आकर के विग्रह श्री रामानुजाचार्य जी के द्वारा स्थापित किये गए हैं। अर्थमण्डप में देवी पद्मावती और नांचारी कि मूर्तियाँ हैं। यह मन्दिर सनातन वास्तुकला की एक अनुपम कृति है। इसमें पञ्च-मंजिला मुख्य गोपुरम था तीन अन्य गोपुरम हैं। इसमें श्री अञ्जनेय, श्री कार्तिकेय, श्री गोविन्द कृष्ण आदि की मूर्तियाँ हैं। (सभी चित्र साभार) वैभवशाली सनातन धरोहर...!...

सनातन धर्म और हम

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माता पार्वती और परमपिता परमेश्वर शिव का अद्भुत अनुपम प्रतिमा। इसका संबंध अंधकासुर के उत्पत्ति से है। इसमें माता पार्वती ने परिहास में परमपिता परमेश्वर के आँखों को ढाँप रखी हैं। और ऐसा होते ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अन्धकार व्याप्त हो जाता है। तभी परमपिता परमेश्वर के स्वेद से अंधकासुर का जन्म होता है। सनातनी पूर्वजों ने सभी घटनाओं, सम्बन्धों, क्षणों को कितने अद्भुत और सौंदर्यपूर्ण रूपों में सृजन कर संग्रहित किया है। इस प्रतिमा के वस्त्र परिधान, आभूषण, मुकुट, माला नन्दी महाराज, पुष्प बेलों के निर्माण में किए गए सुक्ष्म प्रयोगों को zoom करके देखें। सनातनी शिल्पकार की उत्कृष्ठ प्रस्तुति और सर्वोच्च कला निपुणता पारंगतता उत्कृष्टता संपूर्णता दिखाई देगा। धन्य हैं शिल्पकार जिन्होंने ऐसी रचनाओं को गढ़ा है और धन्य है वे नरेश जिन्होंने उनके कला को संरक्षण और संवर्धन में सहयोग किए और उन्हें साधन उपलब्ध कराए। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय भवानी 🙏🌺 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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सतयुग के द्वितीय चरण में देवताओं और असुरों ने यह निर्णय लिया कि समुद्र मंथन किया जाए। समुद्र मंथन हेतु मन्दार पर्वत को मथानी तथा नागराज वासुकी को नेती (डोरी) के रूप में प्रयोग किया गया। सभी देव नागराज के पूंछ की ओर से और सभी असुर उनके सिर की ओर से पकड़ कर मंथन आरम्भ किया। परन्तु मंथन में अवरोध उत्पन्न हो गया क्योंकि मथानी मन्दार पर्वत आधार विहीन होने के कारण टिक नहीं पा रहा था। समस्या के समाधान हेतु श्री हरि विष्णु ने कूर्म अवतार लिए। कूर्म(कच्छप) पर मथानी मन्दार पर्वत टिकाया गया और समुद्र मंथन आरम्भ हुआ। सर्वप्रथम मंथन से हलाहल विष निकला। विष के प्रचण्ड प्रभाव से कोलाहल मच गया, सम्पूर्ण सृष्टि जलने लगी। विष को स्वीकार करने कोई भी आगे नहीं आ रहे थे। अन्ततः परमपिता देवाधिदेव महादेव ने उस हलाहल विष का पान कर सृष्टि की रक्षा किए। हलाहल विष को प्रभु ने अपने कण्ठ में ही रोक लिए। विष के प्रभाव से उनका कण्ठ नील वर्ण का हो गया और वे नीलकण्ठ कहलाये। परन्तु विष के ताप ने भगवान शङ्कर को विह्वल किया और उस ताप की शान्ति के लिए जगतमाता पार्वती आगे बढ़ कर अपने कर स्पर्श से परमपिता को शीतलता प्रदान किए...

सनातन धर्म और हम

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दक्षिण का कैलाश (वल्लीअंगिरी पर्वत) समुद्रतल से १००० मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि जो इन पर्वतों पर चढ़कर भगवान शिव के दर्शन करते हैं उन्हें कैलाश मानसरोवर से समान तृप्ति, सन्तुष्टि, आंनद और पुण्य प्राप्त होता है। पुराणों में वर्णन है कि पराशक्ति का अवतार देवी कन्याकुमारी के रूप में देवाधिदेव महादेव की अर्धांगिनी बनने के लिए हुआ। माँ भगवती ने यह प्रतिज्ञा लिया कि एक निश्चित समय में प्रभात होने से पूर्व ही भगवान महादेव से उनका विवाह हो यदि ऐसा नहीं होता तो वे अपने काया को समाप्त कर लेंगी। यही प्रतिज्ञा कर उन्होंने तपस्या आरम्भ किया। परमपिता देवाधिदेव महादेव उनके तपस्या से प्रसन्न हो उनसे विवाह हेतु कैलाश से दक्षिण दिशा में प्रस्थान किए।  परंतु बहुत सारे लोग इस विवाह के विरुद्ध थे और विवाह रोकने के लिए व्यवधान करने लगे। इसी षड्यंत्र में छल से उन्होंने बहुत से कर्पूर जला कर प्रभात होने का भ्रम उत्पन्न कर दिया। इस भ्रम में कि वह पवित्र मुहूर्त व्यतीत हो गया, भगवान महादेव अत्यंत व्यथित हो वापस लौटने लगे। लौटने के क्रम में भगवान महादेव वल्लीअंगिरी पर्वत पर विश्राम ...