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Showing posts from February, 2026

सनातन धर्म और हम

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किसी राष्ट्र को अंदर से घुन खाए लकड़ी के जैसा निर्बल और नष्ट करना हो तो उसके इतिहास को मटियामेट कर दो। यही सबसे अधिक प्रभावी रणनीति होती है। आर्यावर्त भरतखण्ड के शौर्य पराक्रम भाव को समाप्त करने हेतु सिकुलर/लिब्रांड/वामी/कांगी गैंग ने यही किया। इस गैंग ने इतिहास में इतना मिलावट किया कि उसे गल्प-साहित्य या लुगदी-उपन्यास जैसा बनाकर रख छोड़ा। हमारा वैभवशाली इतिहास यह है कि..... चोलों ने २१०० वर्ष राज किया.! चालुक्यों ने ७०० वर्ष राज किया.! पांड्यों ने ८०० वर्ष राज किया.! सातवाहनों ने ५००वर्ष राज किया.! अहोम राजवंश ने ७०० वर्ष राज किया.! पल्लवों ने ६०० वर्ष राज किया.! चंदेलों ने ४०० वर्ष राज किया.! राष्ट्रकूटों ने ५०० वर्ष राज किया.! मौर्य वंश ने ५५० वर्ष राज किया.! गुप्त वंश ने ४०० वर्ष राज किया.! और विधर्मी मलेच्छ मुगलों ने मात्र २०० वर्ष राज किया.! (सम्पूर्ण देश पर एक साथ इन मलेच्छों का राज मात्र इतना ही रहा है) इसके अतिरिक्त शुंग राजवंश, नंद राजवंश, कुषाण आदि अनेक राजवंशों की बात छोड़ भी दें तो इस सत्य को कोई झुठला नहीं सकता है। पर विडम्बना है कि हमारे (कथित) इतिहास की पुस्तकों में वैभ...

सनातन धर्म और हम

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जब तक राजतंत्र "सनातन धर्म" के अनुशासन, संरक्षण, निर्देशन में संचालित होता रहा तो उस साम्राज्य का यश चहुँ ओर विख्यात रहा था। उसी श्रेणी में महान विजयनगर साम्राज्य भी रहा है। आज भी विजयनगर साम्राज्य के भग्नावशेष हम्पी में अपने गौरवशाली इतिहास की महागाथा विश्व को सुना रहे हैं। यह दुर्लभतम "पञ्चमुख" शिवलिङ्गम हम्पी, कर्नाटक से प्राप्त है। (चित्र-साभार) इस अप्रतिम शिवलिङ्गम में रूद्रावतार आञ्जनेय महावीर जी उकीर्ण हैं। अपने यौवनावस्था में यह साम्राज्य कितना वैभवपूर्ण रहा होगा यह सोचकर ही रोमांच होता है। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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श्री पद्मनाभस्वामी मन्दिर, केरल, सम्पूर्ण विश्व में सबसे धनी सनातनी आध्यात्मिक स्थल, मन्दिर और साधना केन्द्र है। इसकी सम्पदा का अनुमानतः १.२ लाख करोड़ या १.२ ट्रिलियन (US$ 17 BILLION) लगाया गया है। प्रति वर्ष ग्रीष्म विषुव (summer equinox) में सूर्य की किरणें सीधी रेखा में गमन करते हुए मन्दिर के केंद्रीय "गोपुरम" से एक समान समय अंतराल के पश्चात निकलती हैं। इस केंद्रीय गोपुरम का निर्माण सहस्रों वर्ष पूर्व किया गया है जो १०० फीट (३० मीटर) का है। अब सोचिए वर्तमान आधुनिक काल में भी अधिकांश लोगों को विषुव (equinox) और अयनांत (solastice) का ज्ञान नहीं होता है तो उस काल में किस उत्कृष्ट ज्ञान और उपकरणों का उपयोग कर इस अद्वितीय मन्दिर को बनाया गया होगा.?? हमारे पूर्वजों ने पुरातन काल में ही पृथ्वी का आकार, पृथ्वी के अक्ष, पृथ्वी के घूर्णन गति, अक्ष के झुकाव (inclination of earth axis) और अंडाकार कक्षा (elliptical orbit) के रहस्यों को सुलझा लिए थे। उनके लिए अंतरिक्ष का कोई भी रहस्य अज्ञात नहीं था। इस प्रकार का कॉस्मिक संलयन (cosmic fusion) किसी भी स्थापत्य संरचना में सम्पूर्ण विश्व में...

सनातन धर्म और हम

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आपने अखण्ड पाषाण शिला से निर्मित प्रतिमाएँ, मूर्तियाँ, क्रीड़ा सामग्री इत्यादि बहुतायत में देखे होंगे। किन्तु क्या पत्थर के एक ही चट्टान से निर्मित सम्पूर्ण जोड़-रहित अखण्ड मन्दिर देखा है.??  अब तो सोचने को विवश हो जाएँगे.!! परन्तु सनातनी शिल्पकार पूर्वजों ने इस असम्भव को भी सम्भव कर दिखाया और वो भी आज से सहस्रों वर्ष पूर्व ही। श्री पाएर (पाएच) शिव मन्दिर वह अकल्पनीय दुर्लभ मन्दिर है जो अखण्ड पाषाण शिला से निर्मित है। (चित्र-साभार) श्री पाएर शिव मन्दिर, पुलवामा, कश्मीर में है। इस मन्दिर में कहीं भी जोड़ नहीं है। मन्दिर में अनुपम शिवलिङ्गम स्थापित हैं। मन्दिर में सुन्दर आकृतियों, अलंकरणों को उकीर्ण किया गया है। देवशिल्पी विश्वकर्मा के आशीर्वाद से ही सनातनी वास्तुशिल्पकारों द्वारा इस मन्दिर का निर्माण सम्भव हुआ होगा। इस मन्दिर को लगभग १५०० वर्ष प्राचीन माना जाता है। कभी इस मन्दिर में भी रुद्राष्टकम का पाठ किया जाता था। कभी यहाँ भी शिव-भक्त आस्था से अविभूत हो रूद्राभिषेक करते थे। परंतु रेगिस्तानी पशुओं के वर्णसंकरों ने सनातन के प्रति अपने जन्मप्रद्त्त द्वेष और शत्रुता में इतना अत्याचार उ...

सनातन धर्म और हम

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श्री राम इस देश के जन - जन के आदर्श रहे हैं। श्री राम इस देश के कण - कण में रचे - बसे हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का यशोगान चहुँ ओर होता रहा है। आईए बात करते हैं श्री राम जी के वनवास अवधि समाप्ति के उपरांत अयोध्या लौटने की। संलग्न चित्र.... यह कूप कोई सामान्य कूआँ नहीं है। यह कूप अपने में त्रेतायुग और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी, माता वैदेही जानकी के स्मृति चिन्हों को समेटे हुए हैं। यह अपने आप में आश्चर्यजनक विशिष्टता का संगम धारण किए हुए है। समुद्र के अन्दर स्थित होने पर भी इस कूप में का जल मीठा है (sweet water)। (समुद्र के लवणीय (खारे) पानी में मध्य मृदु जल मिलना असम्भव है।) यह त्रयंबकेश्वर (द्वादश ज्योतिर्लिंग वाला नहीं) प्रभु शिव मन्दिर संस्थानम में स्थित है। यह विल्लुण्डी तीर्थम कहलाता है। Villoondi Theertham, Thangachimadam, Tamilnadu. (चित्र - साभार) ऐसी मान्यता है कि रावण से सीता जी को मुक्त कराकर श्री राम जी यहीं इस देवाधिदेव महादेव के शिवलिङ्गम का पूजन किए थे। पूजन सम्पूर्ण होने के उपरांत जनकसुता सीता जी को प्यास लगने पर श्री राम ने अपने तूणीर से वाण ले समुद्र भ...

सनातन धर्म और हम

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हमारे अराध्य देव सदा हमें यही शिक्षा दिए हैं कि प्रेम अपने स्वधर्मी समुदाय से करना है और दुष्ट दलन भी अहिंसा का ही पर्याय है। एक ओर जहाँ हमारे देव देवी की सौम्य मूर्तियाँ हैं तो वहीं दूसरी ओर उनके आयुधों में सुसज्जित विग्रह हैं। एक ओर जहाँ वे प्रेम (प्यार इससे भिन्न होता है) की शिक्षा देते हैं तो वहीं दूसरी ओर सबल संग्रामी होने की शिक्षा देते हैं। नन्दी महाराज सदैव ही देवाधिदेव महादेव के समक्ष सौम्य मुद्रा में ही चिर प्रतिक्षा में बैठे होते हैं। परंतु एक यह एक दुर्लभतम विग्रह है जो संग्रामी मुद्रा में हैं। इस विग्रह में नन्दी महाराज षष्ठभुजी हैं। नन्दी महाराज के षष्ठ भुजाओं में भिन्न भिन्न आयुध सुसज्जित हैं। यहाँ नन्दी महाराज एक रक्षक/योद्धा के रूप में हैं। यह अद्भुत नन्दी विग्रह देगाँव में शिवालय में स्थापित हैं। सतारा से दक्षिण - पूर्व में पाटेश्वर है। पाटेश्वर के निकट ही देगाँव में पहाड़ी के किनारे यह महादेव मन्दिर स्थित है।(चित्र - साभार) देगाँव, सतारा जनपद, महाराष्ट्र। ॐ तत्पुरुषाय विद्महे नन्दिकेश्वराय धीमहि तन्नो वृषभः प्रचोदयात्।। कभी जीवन की आपाधापी से समय बचे तो इस जैसे स्थल ...

सनातन धर्म और हम

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वैदिक काल में हमारे सनातनी मनीषियों, ऋषियों को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, सौर-मंडल, पृथ्वी के घुर्णन गति, ग्रहों के परिभ्रमण पथ और समय का कितना विस्तृत ज्ञान था, इसका एक आदर्श उदाहरण देखिए..!! श्री विद्याशंकर मन्दिर, श्रीरंगम, चिकमंगलूर जनपद, कर्णाटक। (चित्र - साभार) इस मन्दिर के भीतर बारह स्तम्भ हैं। सूर्य की बारह राशियाँ होती हैं। ये बारह स्तम्भ वर्ष के बारह हिन्दू माह का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रातः सूर्योदय के समय जो भी हिन्दू माह होता है उसी स्तम्भ पर सूर्य की पहली किरण पड़ती है।  यह निर्माण सहस्रों वर्ष पूर्व ही हमारे सनातनी पूर्वजों के हाथों हुआ है। क्या कोई वामी/कांगी समकालीन विश्व के किसी अन्य देशों में कोई ऐसा दुर्लभ निर्माण दिखा सकता है.?? परन्तु आर्यावर्त और सनातनी लोगों का दुर्भाग्य देखिए कि हमें एफिल टॉवर, मोनालिसा, पीसा का मीनार तो पढ़ाया जाता, बस ऐसे गौरवशाली शिल्पकला के विषय में आज भी हमें पढ़ाया नहीं जाता है। धन्य धन्य हैं हमारे सनातनी पूर्वज जिन्होंने ऐसे अद्भुत मन्दिरों को बनाए.!! अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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आधुनिक विज्ञान की पुस्तकों में लिखा है कि... सौर परिवार खोज और अन्वेषण क्लॉडियस टॉलमी ने किया और बताया कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है और सभी ग्रह पिण्ड इसकी परिक्रमा करते हैं। परन्तु निकोलस कॉपरनिकस ने १५३० ई. में इस परिकल्पना को पुनर्परिभाषित कर बताया कि सूर्य ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है और सभी ग्रह पिण्ड इसकी परिक्रमा करते हैं। पुनः इसने १५१६ ई. में सौर प्रणाली को बताया। १६०९ में केपलर ने ग्रहों के गति का नियम दिया जो आधुनिक विज्ञान का खोज माना जाता है। अब इससे सहस्रों वर्ष पूर्व आर्यावर्त भरतखण्ड की बात करते हैं.!!! छान्दोग्योपनिषद को देखते हैं...!! (इसकी रचना को आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है जबकि वास्तविकता में यह पन्द्रह सहस्र वर्ष पूर्व होना चाहिए.!) इसमें स्पष्ट रूप से वर्णित है कि..... अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवीदेता नास्त्मेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः। न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन देवास्तेनाहंसत्येन् मा विरधिषि ब्रह्मणेति। सूर्य का न तो उदय होता है न ही अस्त होता है। यह तो केंद्र है...छान्दोग्योपनिषद.(३.११.१,२).!! अर्थात् जब समस्त विश्व ने पढ़ना भी आरम्भ...

सनातन धर्म और हम

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आज यदि कोई पादुका (जूते-चप्पल) क्रय करने की सोचता है तो सर्व प्रथम उनको RED TAPE, RED CHIEF, WOODLANDS, LIBERTY इत्यादि कम्पनियों का ही विचार आता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इन कम्पनियों के उत्पाद नवोन्मेष में उत्कृष्टता लिए होते हैं। परन्तु, क्या हम कभी एक क्षण को यह सोचते हैं कि जिन्हें वे नवोन्मेषी कहते हैं और जिनके लिए वे "पेटेंट" ले लेते हैं उनमें से बहुतेरे उत्पाद "सनातनी कृति चौर्य" के द्वारा बनाए गए होते हैं। संलग्न चित्रों को ध्यान से देखें....!! (चित्र-साभार) ये मूर्तियाँ सहस्रों वर्ष पूर्व ही सनातनी मन्दिरों में बनाए गए हैं। और यदि ये पादुका मूर्तियों में निर्मित हैं तो उस काल के समाज में भी इसका उपयोग तो अवश्य ही रहा होगा। इन मूर्तियों के पादुकाओं में जो "DESIGN" हैं उसी की अनुकृति आज की आधुनिक कम्पनियाँ अपने उत्पाद के रूप में विपणन करते हैं और हमलोग उसी उत्पाद को "latest trend" मान कर प्रफुल्लित होकर क्रय करते हैं। जबकि इस जैसे उत्पाद सहस्रों वर्ष पूर्व ही सनातनी चर्मकारों ने निर्मित कर दिया था। अब यह कैसे मान लूँ कि "लुटेरे म...

सनातन धर्म और हम

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वामियों और मैकाले वायरस से संक्रमित कथित शिक्षाविदों की निर्लज्जतापूर्वक की गई धृष्ठता देखिए.... जिनके देश में प्रथम विद्यालय ही १८११ ई. में प्रारम्भ हुआ हो उसे औद्योगिक क्रांति का श्रेय दिया जाता है। और हमारे गौरवपूर्ण सनातन संस्कृति का यह आदर्श उदाहरण देखिए.... जब आधा विश्व वर्णमाला ही सीख रहा था उस समय से बहुत-बहुत पहले, सहस्रों वर्ष पूर्व ही हमारे सनातनी शिल्पकारों ने पहियों पर चलने वाले मन्दिरों और भवनों का सफलतापूर्वक निर्माण सम्पन्न कर चुके थे। अद्भुत कलाकृतियों से युक्त इस श्री वल्लुवर कोट्टम मन्दिर, चेन्नई, तमिलनाडु  को देखें.!! (चित्र-साभार) यह मन्दिर उस काल में बना है जब विश्व के अधिकांश लोगों को वास्तुशिल्प का "ककहरा" भी ज्ञात नहीं था। वामियों द्वारा लिखित कथित असत्य इतिहास को पढ़कर जिस हीनभावना और अपराधबोध से ग्रसित हो गए हैं, उसे त्यागने का यही उपयुक्त समय है। अपने सनातन संस्कृति परम्परा पर गर्व करें और पुनः वही कीर्ति पताका लहराने के लिए प्रयत्नशील होइए। गौरवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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हमारे धर्म-शास्त्र, पुराण, रामायण, महाभारत कोई काल्पनिक कथाओं के संग्रह नहीं हैं।  ये हमारे गौरवशाली सनातन इतिहास के प्रामाणिक ग्रन्थ हैं। चित्र में दिख रही पत्तियाँ "पाण्डव की बाती" के नाम से जाना जाता है। इसका नाम "CALICARPA TOMENTOSA" है। (चित्र-साभार) मान्यता है कि जब पाण्डव कौरवों के द्वारा "द्यूत-क्रीड़ा" में छल से पराजित कर दिए गए और अपने पण के अनुसार बारह वर्षों का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास पूरा करने के लिए वन क्षेत्रों में रहते थे तो उन्होंने इस पत्तों को ही प्रकाश के लिए जलाकर उपयोग किया करते थे। इन पत्तियों की विशिष्टता है कि इसके नोक पर थोड़ा तेल लगा कर इसे जलाने पर यह दीपक की बाती के सदृश्य ही जलता रहता है। ऐसा कहा जाता है कि आदिकाल में पाण्डवों ने इसे वन में प्रकाश के लिए उपयोग किया था इसीलिए इसे "पाण्डवों की बाती" के नाम से ही जानते हैं। सनातन संस्कृति के प्रमाण तो सर्वत्र व्याप्त है, बस देखने के लिए सनातन की दृष्टि चाहिए। जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा