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Showing posts from August, 2024

सनातन धर्म और हम

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हमारे सनातनी पूर्वजों द्वारा निर्मित पाषण कलाकृतियों को भरपूर निहार कर अपनी आँखों को बन्द करें, और यह कल्पना करें कि इस निर्माण कार्य के समय उस स्थल पर आप उपस्थित रहे हैं। अब इस सम्पूर्ण निर्माण कार्य का अवलोकन अपनी कल्पना में करें.!! क्यों... अचंभित रह गए न...!! एक बार पूरी गम्भीरता से सनातनी पूर्वजों के कार्य निपुणता, एकाग्रता और उनके समर्पण, त्याग और बलिदान को स्मरण करें। आपको सनातन संस्कृति की महानता के समक्ष सम्पूर्ण विश्व के प्रसाधन तुच्छ प्रतीत होंगे। इन्हें सहेजना संवरण करना सनातनियों का परम् कर्तव्य था। किन्तु "लहरू-गैंग" ने मुर्दा आततायी मुगलों के कब्रों के रखरखाव के लिए जितना धन नष्ट किया उसका दशांश भी इन धरोहरों पर करता तो सम्पूर्ण विश्व में सनातन संस्कृति का डंका बजता। परन्तु यह सनातन धर्म के मन्दिर रहे हैं इसलिए "(लहरू-गैंग) ने अपने विद्वेष के लिए 'सिकुलरिज्म' का षड्यंत्र रचा और इसे अन्धकार में धकेल दिया। होयसल नरेश वीर बल्लाल द्वितीय के काल ११९६ ई. में  अमृतेश्वर दण्डनायक के द्वारा इस अतुलनीय मन्दिर का निर्माण किया गया। श्री अमृतेश्वर मन्दिर चिकमंग...

सनातन धर्म और हम

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मानव जीवन के लिए सूर्यदेव का स्थान अतुलनीय है। सूर्यदेव की ऊर्जा से ही यह सम्पूर्ण सृष्टि पोषण प्राप्त करता है। सूर्यदेव से ऊर्जा का स्थानांतरण सागर में, सागर से मेघों में, मेघों से वृष्टि में, वृष्टि से धरा में, धरा से पेड़ पौधों में, पेड़ पौधों से फल व अन्न में यही ऊर्जा संचित होती है। फल व अन्न से सभी जीव-जंतुओं में यही ऊर्जा पोषण करने का कार्य करता है। इसीलिए सूर्यदेव की आराधना प्राचीन काल से सनातन धर्म की परम्परा रही है। सूर्यदेव की आराधना के लिए सनातनियों ने वैभवशाली भव्य मन्दिरों का निर्माण किए। उदाहरण स्वरूप कश्मीर का मार्तण्ड मन्दिर, कोणार्क, ओडिशा का सूर्य मन्दिर, देव, औरंगाबाद, बिहार का सूर्य मन्दिर, ग्वालियर, मध्यप्रदेश का सूर्य मन्दिर, इत्यादि। इनमें से कई मन्दिर विधर्मी म्लेच्छ रेगिस्तानी पशुओं के द्वारा ध्वस्त व विखंडित होने के कारण भग्नावशेष के रूप में ही हैं। इन्हीं सूर्यदेवता का एक अद्भुत सौंदर्यपूर्ण मन्दिर श्री सूर्य मन्दिर झालरापाटन, राजस्थान है। नौवीं शताब्दी में, भुमिज शैली में निर्मित यह सूर्यमन्दिर सनातन वस्तुशिल्प व स्थापत्य कला का अद्वितीय आदर्श प्रतिकृति है।(च...

सनातन धर्म और हम

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परमपिता महादेव के डमरू से ही नाद की उत्पत्ति हुई। नाद से ही ध्वनि का निर्माण हुआ। नाद ही सम्पूर्ण सृष्टि का मूल है। नाद के प्रभाव से किसी भी पदार्थ में औषधीय गुण उत्पन्न हो जाता है। पखावज सनातन संस्कृति का आदि वाद्ययंत्र रहा है। कालान्तर में पखावज को दो भागों में विभक्त कर तबला-डुग्गी चर्म वाद्ययंत्र का निर्माण हुआ। आज भी पखावज एवं तबला शास्त्रीय संगीत का मुख्य अवयव हैं। उत्तर भारत में शास्त्रीय संगीत में तबला का प्रयोग और कर्नाटक शास्त्रीय संगीत में पखावज का प्रयोग अधिक देखा जाता है। पखावज के दाहिने 'स्याही' लगा होता है परन्तु बाएँ में नहीं। पखावज, तबला, मृदंग आदि चर्म वाद्ययंत्रों में जो काला कठोर अवयव लगा होता है उसके लिए "स्याही" शब्द प्रयुक्त होता है। बाईं ओर वादक गेहूं के आटे को गिला करके लगा कर पखावज बजाते हैं। हथेलियों के थाप से वह आटा सूखकर झड़ता है। यह सत्य है कि ज्ञानीजन कहते थे कि उस झड़े आटे को किसी भोजन में मिलाकर ग्रहण करने से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है। जैसे - तपेदिक, दमा इत्यादि। अब विचार करें कि सनातनी पूर्वजों की दिव्य दृष्टि और ज्ञान कितना उच्चत...

सनातन धर्म और हम

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देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर, असुर, मानव सबों ने देवाधिदेव महादेव के शरणागत हो भक्ति भाव से इन्हें प्रसन्न कर अपने अभीष्ट को प्राप्त किया है। भगवान शिव की जिसने भी भक्ति की उन्हें वरदान देने में प्रभु ने कभी कमी नहीं किए, चाहे वर मांगने वाले की मंशा सृजन हो या विनाश कोई अंतर नहीं किए। तभी तो इन्हें औघड़दानी कहा जाता है। ये सदैव अपने भक्तों को पाप, शाप, व संताप से मुक्ति दिलाए हैं। इसलिए इनके भक्तों ने इनके विग्रह को अपने सुविधा अनुसार सभी स्थानों पर स्थापित किए हुए हैं। परमपिता परमेश्वर भगवान शिव का दुर्लभतम विग्रह और शिवलिङ्गम सुदूर सघन वन के मध्य स्थापित है। यह अनुपम विग्रह कलहट्टी झरना (निकट), कलाठिगिरी, चिकमंगलूर जनपद, कर्नाटक में स्थापित है।(चित्र-साभार) भगवान शिव के विग्रह के शिल्पकला की निपुणता और प्रवीणता आश्चर्यचकित करते हैं। नागनाथ, रुद्राक्ष, भगवान की जटा, उंगलियों आदि को कितने उत्कृष्टता और स्पष्टता से निर्मित किया गया है। यहाँ का दृश्य कितना दिव्य और दुर्लभ है। इस शान्त निरवता में भी एक अलौकिक ऊर्जा का प्रवाह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। अतुलनीय सनातन धरोहर....!! ...

सनातन धर्म और हम

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परमपिता भोलेनाथ के भक्ति की अगन जब जल उठती है फिर औघड़दानी के भक्त आनन्द में उन्मत्त हो अपने आराध्य देव का पूजन अर्चन करने हेतु कहीं भी बैठ सकते हैं। वो थल हो या जल.!! मैदान हो या मरुस्थल.!! कन्दरा हो या पर्वत.!! कोई अन्तर नहीं पड़ता.!! बस एक महादेव की राग.!!! यह परमपिता देवाधिदेव महादेव का अद्वितीय, अतुलनीय स्वयम्भू शिवलिङ्गमसघन वन में स्थापित है.!! श्री सुंदर महालिङ्गम, सथूरागिरी पहाड़ी, मदुरई के निकट, तमिलनाडु। (चित्र - साभार) भगवान शिव अपने दिव्य प्रकाश से सघन वन को भी आलोकित कर रहे हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को सम्मोहित कर मन्त्रमुग्ध कर दे रहे हैं। शिव भक्त यहाँ भी अपने प्रभु से मिलने, उनका पूजन करने, इनका आशीर्वाद प्राप्त करने बढ़े ही भक्ति भाव से आते हैं। अनुपम सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा