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Showing posts from January, 2026

सनातन धर्म और हम

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"चमत्कार" तो हर पल हर युग में हर ओर घटित होता रहा है। बस उसे देखने की दृष्टी होना चाहिए। अब इसे देखें....... सनातन वास्तु शिल्प कला को किसी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता है...!! सम्पूर्ण विश्व में इसके अनेकानेक उदाहरण हैं। लाखामण्डल मन्दिर में एक ऐसा अतिदुर्लभ शिवलिङ्ग है जिसपर जलाभिषेक करने के उपरांत आप अपना प्रतिबिम्ब शिवलिङ्ग में स्पष्ट देख सकते हैं। वैसे तो भगवान श‌िव के मन्दिर सम्पूर्ण विश्व में कई स्थलों पर निर्मित हैं। किन्तु आर्यावर्त में एक ऐसा स्थल है जहाँ करोड़ों वर्ष प्राचीन अद्वितीय शिवलिङ्ग हैं। मान्यता है क‌ि इस शिवलिङ्ग में सम्पूर्ण "ब्रह्माण्ड" दृश्यमान होते हैं। किसी पाषाण से दर्पण सदृश निर्माण का यह सम्भवतः सम्पूर्ण विश्व में एकमात्र आदर्श उदाहरण है। उत्तराखण्ड के देहरादून स्थित लाखामण्डल मन्दिर में स्थापित इस शिवलिङ्ग का जब भक्त जलाभिषेक करते हैं तो उन्हें सृष्टि का पूर्ण स्वरूप दिखता है। (क्या यह आपके चमत्कार नहीं लगता है.??) यहाँ के लोगों का मानना है कि इस शिवलिङ्ग पर अपनी छवि देखने मात्र से सारे पाप कट जाते हैं। (चित्र - साभार) प्रकृति के उपवन म...

सनातन धर्म और हम

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प्राचीन सनातनी शिल्प शैली क्या थी इसे वामियाें के लुगदी उपन्यास (कथित इतिहास) को पढ़ कर नहीं जान सकते हैं। क्योंकि उनके उपन्यास में शिल्प कला में प्रयुक्त यंत्र "छेनी हथौड़ी" तक जाकर ही रुक गया है। इस मूर्ति के मुखमंडल, वस्त्र, आभूषणों, अलंकरणों के बनावट को ध्यान से देखिए...!! क्या इसकी कोई तुलना हो सकता है.?? अब उस विशिष्टता की ओर ध्यान दें जो वामियों के कपोल कल्पित कथा की प्रामाणिकता को तार तार कर देगा। इस मूर्ति के मस्तक में एक कान से दूसरे कान तक (आर - पार) एक सूक्ष्म छिद्र बना हुआ है। अब इस पर चिंतन करें कि माना बाह्य अलंकरण को "छेनी हथौड़ी" से बना दिया होगा परंतु इस सूक्ष्म छिद्र को कैसे बनाया गया होगा??? यह भी ध्यान रखें कि ग्रेनाइट की कठोरता Moh's scale पर ८ है जो इसे डायमंड के पश्चात सबसे कठोर पाषाण बनाता है। और ध्यान रखें उस काल में इलेक्ट्रिकल ड्रिल मशीन नहीं होता था। तो यह सूक्ष्म छिद्र किस विधि/तकनीक से बनाया गया होगा.?? यह मन्दिर नौवीं शताब्दी का निर्माण है जिसमें संगीत स्तम्भ बने हुए हैं जो थाप देने पर सभी सातों स्वरों की ध्वनि सुनाते हैं। आप इस म...

सनातन धर्म और हम

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आर्यावर्त में अखण्ड पाषाण शिला से निर्मित यह सम्भवतः सबसे विराट 'ऐश्वर्य गणपति" का विग्रह हैं। किन्तु अतिप्राचीन होने के उपरांत भी यह आज भी एक मन्दिर की प्रतीक्षा में हैं। (चित्र-साभार) यह सहस्रों वर्षों से खुले आकाश के नीचे प्रकृति के झंझावातों को सह रहे हैं। स्थानीय निवासियों की मानें तो कभी चुनाव के समय cm ने मन्दिर निर्माण का आश्वासन दिया था। परन्तु कहावत है न कि 'रात गई बात गई" और काम निकलने के पश्चात कौन किसी को जानता है। यह ऐश्वर्य गणपति जी हैदराबाद से लगभग ११० कि.मी. की दूरी पर एक अल्प ज्ञात गाँव एवञ्च (अवंच) में स्थापित हैं। ऎसी मान्यता है कि इनका निर्माण चालुक्यों ने ग्यारहवीं शताब्दी में करवाया था। यह ऐश्वर्य गणपति की प्रतिमा पच्चीस फीट ऊँची है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के सबसे विशाल ऐश्वर्य गणपति जी के बारे में अधिकांश सनातनी लोगों को ज्ञात नहीं है। दुर्लभ सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय विघ्नहर्ता विनायक गणपति जी 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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ये अनुपम, अद्भुत शिवलिङ्गम हैं जो अपने आप में विशिष्टता लिए हुए हैं। इस शिवलिङ्गम पर एक हँस और एक वाराह उकीर्ण हैं। शिखर पर नागछत्र बने हुए हैं। इस अनुपम शिवलिङ्गम को लिङ्गोद्भव के रूप में जाना जाता है। यह शिवलिङ्गम पुराण में एक प्रचलित मनोहर कथा पर निर्मित हैं। एक बार श्री विष्णु और श्री ब्रह्मदेव में "श्रेष्ठता" को लेकर विवाद हो गया। बात बढ़ता गया और.. उसी समय एक दिव्य ज्योतिर्मय स्तम्भ प्रकट हुआ जिससे सतत अग्नि उत्पन्न हो रहा था। उन दोनों देव को यह आकाशवाणी से आदेश प्राप्ति हुई कि जो भी इस दिव्य ज्योति स्तम्भ के "आदि" वा "अंत" को ज्ञात कर लेंगे वे ही सर्वश्रेष्ठ घोषित होंगे। श्री ब्रह्मदेव हँस के रूप में आकाश की ओर और श्री विष्णु वाराह के रूप में पाताल की ओर प्रस्थान किये। लेकिन दोनों ही इस दिव्य ज्योति स्तम्भ के आदि-अंत को नहीं पता कर पाए। और अन्ततः दोनों ही हारकर देवाधिदेव महादेव के समक्ष नतमस्तक हो गए। देवाधिदेव महादेव के द्वारा दोनों को ही अपने-अपने कार्य क्षेत्र में समान रूप से श्रेष्ठ घोषित किया गया। यह लिङ्गोद्भव शिव विग्रह त्रिशुण्ड गणपति मन्दिर...

सनातन धर्म और हम

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भारतवर्ष में हर ओर "आश्चर्य" (WONDER) ही बिखरे, फैले हुए हैं। केवल आकलन को सामर्थ्यवान दृष्टि होनी चाहिए। ऐसा ही एक अविश्वसनीय, अद्भुत WONDER है "रानी जी की बाबड़ी" या वाव.... रानी जी की बावड़ी, पाटन, गुजरात। लगता है इस दुनिया के सात अजूबों का नाम रखने वालों ने कभी हमारी रानीजी की बावड़ी की यात्रा नहीं की। सोचिए कि जिन्होंने इस निर्माण का परिकल्पना किया होगा उनका बौद्धिक स्तर कितना उच्च रहा होगा। पानी की शुद्धता को उजागर करने वाले एक उल्टे मंदिर के रूप में डिजाइन किया गया कदम अपने आप में अद्वितीय है। मूर्तिकला पैनलों के साथ सीढ़ियों के ७ स्तरों में विभाजित है। यह ६४ × २० × २७ घन मीटर के  माप में है। रानीजी की बावड़ी गुजरात के पाटन में स्थित एक कुआं है, जो सरस्वती नदी के तट पर स्थित है।  इसके निर्माण का श्रेय सौराष्ट्र के खेंगारा की बेटी "उदयमती" को दिया जाता है, जो ग्यारहवीं शताब्दी के चौलुक्य वंश की रानी और भीम प्रथम की पत्नी हैं। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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इस सृष्टि की रचना में "योग/युग्म/संगम" का विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण भूमिका है। संगम के बिना तो सृष्टि की कल्पना भी नहीं किया जा सकता है। नया जीवन "शुक्राणु एवं अंडाणु" के संगम से ही जन्म लेता है। अब इस सब की जानकारी के लिए X-Ray, Ultrasonogram, आदि आधुनिक विधि उपलब्ध है। परंतु कल्पना करें दो सहस्राब्दी पूर्व के सनातनी पूर्वजों को इसकी सटीक सूचना किस प्रौद्योगिकी/ तकनीक ने दिया होगा.?? कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है न.?? गर्व करें कि उन सनातनी पूर्वजों ने अपने तपश्चर्य से अंतर्चक्षु को इतना जागृत कर लिया था कि उन्हें किसी भी घटना को सहजता से देखने की दृष्टि प्राप्त हो गया था। वे इस दिव्य दृष्टि से भविष्य में भी झाँक सकते थे। इसी बात का प्रत्यक्ष प्रमाण आप श्री वाडाकुनाथ स्वामी मन्दिर की भीत पर ऊकीर्ण पाषाण भित्ति चित्रों में देख सकते हैं। श्री वाडाकुनाथ स्वामी मन्दिर, त्रिश्शुर, केरल। इस भित्ति चित्रों में शुक्राणु, अंडाणु, निषेचन, अंबिलिकल कार्ड, भ्रूण विकास की सभी अवस्थाओं को जीवंत रूप में चित्रित किया गया है।(सभी चित्र -साभार) अपने मस्तिष्क पर जोर दे कर विचार करें कि य...

सनातन धर्म और हम

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इतिहास को कागज पर लिखने की कला तो आधुनिक युग में विकसित किया गया है। परंतु हमारे सनातनी पूर्वजों ने तो सम्पूर्ण इतिहास को प्राचीन काल में ही पाषाण शिला पर गढ़ कर हमारे लिए रख छोड़े हैं। अब यह भिन्न बात है कि इस इतिहास की लिपि और भाषा को पढ़ना अतिआधुनिकता में अंधे होकर रहने वाले मनुष्यों को आता भी है या नहीं। महाभारत युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था और इस इतिहास को पाषाण शिला पर चित्रों की लिपि में लिखवाने का श्रेय जाता है होयसल नरेश विष्णुवर्धन को। नरेश विष्णुवर्धन ने होयसलेश्वर मन्दिर के भीत पर इस इतिहास लेखन का आरम्भ ११२१ ई. में करवाया और यह कार्य सम्पन्न हुआ ११६० ई. में। इस कार्य संपादन में सनातनी शिल्पकारों के अथक परिश्रम, कर्मठता, निपुणता और समर्पण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस मन्दिर के भीत पर सम्पूर्ण चक्रव्यूह, वाणवर्षा, गज युद्ध, रथ युद्ध आदि को जीवन्त रूप में चित्रित किया गया है। (सभी चित्र - साभार) होयसल साम्राज्य का ध्वज १५० वर्षों तक लहराता रहा था। परंतु इस अद्वितीय सनातनी धरोहर पर रेगिस्तानी पशु की कुदृष्टि पड़ गई। और विधर्मी म्लेच्छ मलिक कफूर के जंगली झुंड ने चौदहवीं शताब्...

सनातन धर्म और हम

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परमपिता परमेश्वर भगवान शिव व जगतमाता माँ शक्ति का अनुपम अर्धनारीश्वर प्रतिमा। बारहवीं शताब्दी में कोलुथुंग चोल प्रथम द्वारा निर्मित चोल वास्तुशिल्प का अनुपम अप्रतिम उदाहरण है यह भगवान अर्धनारीश्वर की प्रतिमा। श्री अमृतकदेश्वर मन्दिर, मेलकदाम्बुर ग्राम, कड्डलोर जनपद, तमिलनाडु। (चित्र - साभार) इस मन्दिर का १५०० वर्षों से भी अधिक प्राचीन सनातन परंपरा का इतिहास है। सनातनी शिल्पकार ने अपने कला निपुणता पारंगतता का सम्पूर्ण उपयोग किया है इस प्रतिमा के मुकुट, आभूषण, चंद्रहार, यज्ञोपवीत, कमरबंद, कंगन आदि के सृजन में.! मुखमंडल एवं अंगविन्यास, हाथों की भाव भंगिमा, नन्दी महाराज के मुख, ग्रीवा आदि में इस कला की उत्कृष्टता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। धन्य हैं सनातनी शिल्पकार.!! वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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वो कैसी चमत्कारी विद्या रही होंगी जो पाषण को भी मोम के सदृश्य कोमल बनाकर उसपर कला का सृजन किया जाता था.???? इस शिल्प विद्या में पारंगत होने हेतु कितना परिश्रम, एकाग्रता और समय दिए गए होंगे.???? किनका प्रेरणा रहा होगा जिनसे प्रेरित होकर उन्होंने ऐसा अप्रतिम सृजन किए होंगे.???? क्या सनातनी पूर्वजों के इन विरासतों को हम उचित सम्मान दे पाए हैं.??? श्री सुब्रमण्यम स्वामी अपने वाहन मयूर संग नाग-बन्ध पर विराजमान, निर्मित हैं। (चित्र - साभार) श्री रामतीर्थ मन्दिर, गोकर्ण, उत्तर कानारा, कर्नाटक। प्रभु मुरुगन के मुखमण्डल से लेकर उनके वस्त्र-आभूषणों तक, मोर से लेकर नाग-द्वय तक के निर्माण में जो निपुणता दृश्यमान होता है यह पाषाण शिल्प कला का सर्वोच्च शिखर ही है। यह सम्पूर्ण निर्माण एक अखण्ड पाषण शिला पर किया गया है। इन्हें देखकर अपने सनातनी पूर्वजों पर गौरवान्वित हैं। गौरवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय श्री षण्मुख स्कन्द 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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आदि शिव हैं.!! अनन्त शिव हैं.!! सत्य शिव हैं.!! ॐ कार शिव हैं.!! शिव ही ब्रह्म हैं.!! शिव ही शक्ति हैं.!! विश्व के कोने कोने में शिव व्याप्त हैं.!! ये सौन्दर्यपूर्ण शिवालय आर्यावर्त से सुदूरवर्ती देश काम्पाला, युगाण्डा, अफ्रीका में स्थित हैं। (चित्र-साभार) यह शिव मन्दिर अपने में दुर्लभतम विशिष्टता समेटे हुए हैं। यह सम्पूर्ण शिव मन्दिर विस्मयकारी रूप से मात्र "पाषाण" से निर्मित है। इस अद्भुत मन्दिर के निर्माण में एक कण भी लौह तत्व का उपयोग नहीं किया गया है। विराटता के संदर्भ में यह शिव मन्दिर ज्योतिर्लिङ्ग श्री सोमनाथ मन्दिर के पश्चात आर्यावर्त से बाहर द्वितीय विराट शिवालय हैं। इस शिव मन्दिर का निर्माण युगाण्डा में बसे "गुजराती" लोगों के सौजन्य से सम्पन्न हुआ है। अद्वितीय विश्व सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 ॐ नमः परम् शिवाय 🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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गन्धार नरेश, द्यूत व्यसनी, कुटिल शकुनि का मन्दिर और वह भी आर्यावर्त में....!! आश्चर्य हो रहा है न....!! किन्तु इसी प्रकार की असामान्य विचारों के कारण ही इस देश को विविध विचारों और मान्यताओं वाला देश कहा जाता है। (एकता की बात नहीं कर रहा) यह मन्दिर इस बात का प्रमाण है कि इस देश के जहाँ अच्छाई का पूजन किया जाता है वहीं दूसरी ओर छल-कपट वाले को भी पूज्यनीय माना जाता है। मान्यता है कि द्वापरयुग में शकुनि ने यहीं एक ग्रेनाइट चट्टान पर बैठकर भगवान महादेव को प्रसन्न करने हेतु तपस्या किया था। कहा जाता है कि इसी ग्रेनाइट चट्टान से शकुनि की प्रतिमा को बनाया गया है। (सभी चित्र-साभार) मायामकोट्टु मालांचारुवु मालानाड़ा मन्दिर द्युत विशेषज्ञ शकुनि को समर्पित है। यह मन्दिर पवित्रेश्वरम में कोट्टाराक्का के निकट, कोल्लम जनपद, केरल में स्थित है। केरल वह राज्य जहाँ एक ओर भगवान श्री लक्ष्मीनारायण का विश्व विख्यात श्री पद्मनाभस्वामी मन्दिर, तथा अखण्ड ब्रह्मचारी भगवान अयप्पा स्वामी का श्री सबरीमाला मन्दिर है तो दूसरी ओर कपटी शकुनि का मन्दिर भी यहीं है। एक समुदाय जो अपने को कौरवों के वंशज मानता है, इस स्मारक म...

सनातन धर्म और हम

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आर्यावर्त भरतखण्ड सदा ही से विलक्षणताओं विभिन्नताओं से भरा हुआ अनूठा स्थान रहा है। सदियों संघर्ष के पश्चात मर्यादा पुरुषोत्तम राजा रामचंद्र जी के पावन जन्मस्थल पर भव्य मन्दिर का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। प्रभु मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम सनातन धर्मी जनों के लिए आराध्य देव हैं और उनके अनेक मन्दिर भारतवर्ष में हैं। श्री राम द्वारा दशानन रावण के वध की स्मृति में दशहरा पर्व में रावण दहन का आयोजन किया जाता है। किन्तु क्या आप जानते हैं कि रावण का एक भव्य मन्दिर भी है जहाँ लोग रावण दहन पर शोक मनाते हैं और सूतक रखकर स्नान करने के उपरांत नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं। रावण का यह भव्य मन्दिर राव जोधा की नगरी जोधपुर में स्थित है। (चित्र-साभार) यह मन्दिर किला रोड स्थित अमरनाथ महादेव मन्दिर के प्रांगण में है, जोधपुर, राजस्थान। ऐसी मान्यता है कि दशानन की पत्नी मंदोदरी यहीं के मंडोर की थी जिसका पाणिग्रहण दशानन रावण से हुआ था। जोधपुर में श्रीमाली गोधा दवे समुदाय रावण को अपना पूर्वज मानते हैं और रावण के दहन पर शोक मनाते हैं। इसकी आराध्य देवी खरानना देवी हैं। यह रावण की भी आराध्य देवी रही हैं और इनके आ...