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Showing posts from May, 2023

सनातन धर्म

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श्री कोपिणेश्वर मन्दिर में स्थापित वृहत शिवलिङ्गम है। इनका वास्त्विक नाम कौपीन पर आधारित कौपिनेश्वर रहा होगा जो कालांतर में कोपिणेश्वर हो गया है। इस शिवलिङ्गम की ऊंचाई ५' फीट और परिधि भी ५' फीट हैं। श्री कोपिणेश्वर मन्दिर भगवान शिव को समर्पित हैं। श्री कोपिणेश्वर शिवलिङ्गम महाराष्ट्र के ही नहीं आर्यावर्त  सबसे वृहद शिवलिङ्ग में से एक हैं। श्री कोपिणेश्वर महादेव ठाणे के संरक्षक देव हैं। मन्दिर का निर्माण शिलाहारा वंश के शासकों द्वारा करवाया गया था। मन्दिर में टूट फूट होने पर इसका जीर्णोद्धार एवं पुनर्निर्माण १७६० ई. में करवाया गया। आवश्यकता होने पर मन्दिर के गर्भगृह के समक्ष वृहत कक्ष को संग्रहित धन एवं दान एकत्र कर १८७९ में बनवाया गया। इस मन्दिर का सबसे तात्कालिक जीर्णोद्धार १९९६ ई. में किया गया है। मन्दिर में दो प्रवेश द्वार हैं - १. मसुंडा झील के सामने, २. जंभली नाका मंडी के अंदर। मन्दिर के प्रवेश द्वार पर नन्दी महाराज स्थपित हैं। मन्दिर परिसर में श्री ब्रह्मदेव, श्रीराम, श्री उत्तरेश्वर (काशी विश्वलिङ्गेश्वर), श्री दत्तात्रेय, माँ काली, माँ शीतला(थटकाई), श्री आञ्जनेय, गरूड़ ...

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अद्वितीय, अकल्पनीय, अद्भुत शिल्प जिसे हमारे सनातनी पूर्वजों ने अपने हाथों से निर्मित किया है। जैसा कि वामपंथी इतिहासकार ने ताजमहल, क़ुतुबमीनार को मुगलों का बनाया हुआ बताता रहा है, क्या  ऐसा एक भी उदाहरण इस प्रतिमा के जैसा समकालीन मुगलों के देशों में बना हुआ दिखा सकता है?? इस दिव्य शिल्पकला को वामपंथियों, गुलाबों के वंशजों ने इतिहास से ही मिटा दिया है। यह मुग्ध करने वाली वाद्ययंत्र सह देवी की मूर्ति श्री चेन्नाकेशवा मन्दिर, बेलूर, कर्नाटक में है। (चित्र - साभार) इसके जैसा आभूषणों, नैन - मुखाकृति, और भाव-भंगिमाओं का जीवंत प्रदर्शन अन्य किसी मूर्ति में दृष्टिगोचर नहीं होता। इसके नयनों, भाल, चिबुक, बिरौनियों, ओष्ठों, नासिका के गढ़न, स्कंधों के ढलान, कमर की कमनीयता, उंगलियों के घुमाव को ध्यान से देखें तो आप शिल्पकार के कला निपुणता और दक्षता से चमत्कृत हो जाएंगे। इस वाद्ययंत्र के तार तक को पाषाण से ही निर्मित किया गया था, जो अब खंडित हो गया है। और यह ध्यान रखें कि कि यह संपूर्ण निर्माण जोड़ रहित अखण्ड पाषाण शिला से ही किया गया है तो कितनी सावधानी बरतनी पड़ती होगी.?? कितनी कुशलता पूर्वक एक...

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बर्बर, असभ्य, रेगिस्तानी पशुओं ने अपने जन्म प्रदत्त द्वेष और सनातन धर्म के प्रति घृणा, शत्रुता और हीन-भावना में किस प्रकार हमारे सनातन विरासत को नष्ट-भ्रष्ट किया उसका ज्वलंत उदाहरण यह मन्दिर है। विश्व के अलौकिक, अद्वितीय मन्दिरों में से एक श्री सहस्रबाहु मन्दिर, उदयपुर, राजस्थान में है। सहस्रबाहु अर्थात जिनके एक सहस्र बाहु हों, ये भगवान श्री हरि विष्णु ही का पर्याय है। ध्यान करें पुरुष सूक्तम -  ॐ सहस्रशिर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्... श्री सहस्रबाहु मन्दिर नागदा गाँव में स्थित, उदयपुर से २३ कि. मी. दूरी पर है। इस मन्दिर के समस्त दीवार श्री रामायण कथाओं से अलंकृत हैं। रामायण की सम्पूर्ण गाथा मूर्तियों में गढ़ कर इस मन्दिर को विभूषित किया गया है। इस मन्दिर का कोई भी एक फीट स्थान मूर्तियों, कलाकृतियों से रहित नहीं ढूंढ पाएँगे। दुर्भाग्यवश, इस मन्दिर को विधर्मियों, आक्रांताओं ने क्षतिग्रस्त कर दिया है। आज जो कुछ हमें दृश्यमान है वह जीर्ण शीर्ण अवस्था में ही है। कल्पना करें कि जब जीर्ण - शीर्ण अवस्था में यह मन्दिर इतना आकर्षक है तो अपने सम्पूर्णता में यह कितना भव्य और वैभवपूर्ण रहा ...

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आर्यावर्त के इन्द्रप्रस्थ का "विष्णु-स्तम्भ" तो सदैव से ही चर्चा में रहा है। म्लेच्छों के अवैध अतिक्रमण के पश्चात इसे दिल्ली का कुतुबमीनार कहा जाने लगा। विचार करने की बात है कि जब गुलाम वंशीय कुतुबुद्दीन मात्र चार वर्ष ही राज कर पाया तो उसने इस अद्भुत कृति का कैसे निर्माण करवा दिया.?? अवश्य सोचना.....! परन्तु यहाँ एक अन्य "विष्णु-स्तम्भ" की बात करते हैं.... इस विष्णु-स्तम्भ को "कीर्ति-स्तम्भ" के नाम से भी ख्याति प्राप्त है। राजपुताना शासकों में राणा कुम्भ सबसे पराक्रमी और शौर्यशाली राणा रहे हैं। राणा कुम्भा ने महमूद खिलजी को धरती पर नाक रगड़वा कर १४४८ में पराजित कर दिए थे। महमूद खिलजी पर अपने विजय को राणा कुम्भा ने भगवान श्री नारायण हरि विष्णु को समर्पित कर इस विजय के स्मृति में दिव्य "कीर्ति-स्तम्भ" का निर्माण करवाये थे। यह कीर्ति-स्तम्भ (विष्णु-स्तम्भ) चितौड़गढ़, राजस्थान में स्थित है। इस कीर्ति-स्तम्भ के ९ तल हैं। इसकी ऊँचाई १२२' फीट और चौड़ाई ३३' फीट है। इस विष्णु-स्तम्भ में सौन्दर्यपूर्ण और कलात्मक रूप से सनातनी देव/देवियों की मूर्तियों ...

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हमारे पूर्वजों ने जितने भी सनातनी शिवालयों/मन्दिरों का निर्माण किया किया है सबके पीछे कोई न कोई अद्भुत कथा छिपी हुई है। ये कथा विश्वविख्यात वैभवशाली नेल्लीएप्पर शिव मन्दिर के पीछे की है। श्री नेल्लीएप्पर प्रभु के बारे में एक कथा प्रचलित है : एक निर्धन ब्राह्मण थे "वेद शर्मा"। वे शिव के परम भक्त थे। प्रतिदिन वे भिक्षाटन करते और भिक्षा में जो भी प्राप्त होता उसे अपने आराध्य देव परमपिता शिव को समर्पित कर देते थे। एक दिन जब वे भिक्षा में प्राप्त धान को सुखा रहे थे तो अनायास ही वर्षा आरम्भ हो गई। वेद शर्मा भयाक्रांत हो गए कि इस घनघोर वृष्टि में उसके धान बह जाएँगे तो भगवान को क्या अर्पित करेंगे.?? इसीलिए भयवश वे प्रभु से सहायता हेतु प्रार्थना करने लगे। भगवान महादेव उनके याचना से प्रसन्न होकर धान को छाया प्रदान कर सुरक्षित बचा लिए। इस प्रकार प्रभु भोलेनाथ के द्वारा धान की रक्षा के कारण इस स्थान को तिरुनेलवेली कहा जाता है। (Thiru - means beautiful + Nel - means Peddy + Velli - means Fence) और भक्तवत्सल भगवान शिव नेल्लीएप्पर कहलाए। एक अन्य किंवदंती के अनुसार भगवान शिव अपने लिङ्गम रूप ...

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कैसे निभाऊँ "भाईचारा" और कैसे मान लूं "गंगा - जमनी - तहजीब" जैसा भी कुछ होता है....!! कैसे भूल जाऊँ अपने आराध्य देव के साथ हुए अत्याचार और अपमान को.??? यह अकाट्य सत्य है कि साँप के गर्भ से संपोला ही जन्म लेता है, केंचुआ नहीं। उसके द्वारा दिए गए यातनाओं की वेदना और टीस आज भी चुभ रही है। यह जीर्ण शीर्ण भग्नावशेष अतीत में कश्मीर में रहे सनातन के समृद्ध जड़ों का जीवंत साक्ष्य है। यह भग्नावशेष रेगिस्तानी पशुओं द्वारा किए गए अत्याचार/विध्वंस/क्रूरता का रक्त रंजित प्रमाण है। यह भग्नावशेष महान सनातनी सम्राट लालित्य मुक्तपिड के द्वारा बनवाया गया प्राचीन वैभवशाली शिव मन्दिर का है।(चित्र-साभार) यह जीर्ण शीर्ण शिवालय श्री वागनाथ शिव मन्दिर, गांदरबल, कश्मीर है। यह भग्नावशेष अतीत के नेत्रों से पीड़ा से निकले अश्रु-बूँद हैं जो चक्षुओं ठहर गए हैं, जम गए हैं। यह भग्नावशेष समस्त संसार को यह बताने के लिए है कि जिसे तुम "भाई" मनवाने के लिए विवश कर रहे हो वह वास्तव में मुखौटों में छुपा वही अत्याचारी है जो अपने राक्षस प्रवृत्ति को मुखौटे से छुपा कर धोखा दे रहा है। इसे देखकर सभी स...

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आर्यावर्त के सनातनी शिल्पकारों ने जब भी किसी पत्थर को हृदय से स्पर्श किया तो उस पत्थर से सौंदर्य और भक्ति की पवित्र धारा प्रवाहित हो चली। भगवान मल्लिकार्जुन प्रभु शिव के ही एक रूप हैं। गोवा में भगवान मल्लिकार्जुन का एक प्राचीन मन्दिर स्थापित है। यह प्राचीन मन्दिर अठारहवीं सदी का निर्माण माना जाता है। इस मन्दिर में भगवान मल्लिकार्जुन के अतिरिक्त साठ अन्य देवी - देवों की प्रतिमाएँ विद्यमान हैं। श्री मल्लिकार्जुन मन्दिर पलोलेम, गोवा में स्थित हैं। यह मल्लिकार्जुन मन्दिर स्थानीय लोगों में बहुत लोकप्रिय है और बड़ी संख्या में भक्त इसके दर्शन करने आते हैं। इसी प्राचीन मल्लिकार्जुन मन्दिर के एक झरोखे का यह दृश्य है। (चित्र-साभार) सनातनी शिल्पकारों ने कितने अनूठे रूप में पार्वतीनन्दन भगवान स्कन्द कार्तिकेय को यहाँ पर गढ़े हैं। भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर विराजमान हैं। भगवान कार्तिकेय दशभुजी रूप में हैं। भगवान कार्तिकेय के हाथों में अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। भगवान कार्तिकेय और उनके वाहन मोर को इतने अलंकृत रूप में गढ़ा गया है जो शिल्पकारों के कल्पनाशीलता और शिल्प-निपुणता के द्योतक हैं। ध्यान ...

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प्रभु भोलेनाथ के शिवालय में शिवलिङ्गम के सामने से भगवान शिव के गण नन्दी ही अनुपस्थित रहें ऐसा कोई कल्पना कर सकते हैं क्या.?? सामान्य रूप में ऐसा सम्भव नहीं है। किन्तु आर्यावर्त में एक ऐसा शिव मन्दिर है जहाँ नन्दी महाराज अनुपस्थित हैं। और इसके पीछे एक अद्भुत पौराणिक कथा है। दक्ष प्रजापति के पुत्री का विवाह भगवान शिव के संग सम्पन्न हुआ था। परन्तु जब भगवान शिव दक्ष प्रजापति के चरण स्पर्श नहीं किए तो दक्ष प्रजापति इसे अपना अपमान समझ बैठे थे। जब दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया तो सभी देवताओं, ऋषियों आदि को आमंत्रित किया परन्तु भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण पत्र नहीं भेजा गया। माता सती पति की अनिच्छा की अवहेलना कर भी नन्दी महाराज पर सवार होकर अपने पिता के घर यज्ञ स्थल पर गईं। किन्तु वहाँ अपने पिता दक्ष प्रजापति और कुछ कुपात्र लोगों द्वारा अपने पति देवाधिदेव महादेव के अपमान को सहन नहीं कर पाईं। यज्ञ स्थल पर ही देवी सती ने योगाग्नि में आत्मदाह कर लिया। इसकी सूचना मिलने पर भगवान शिव सती वियोग में कुपित और विह्वल हो गए। रुद्र अंश से वीरभद्र उत्पन्न हुए और यज्ञ विध्वंस कर दक्ष प्रजापति के...

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हमारे सनातन धर्म के पवित्रता, प्राचीनता और महत्ता की तुलना क्या कभी भी कोई 'किताबी पंथ' कर पाएगा। असम्भव है..!! सनातन धर्म के प्राचीनता का एक आदर्श उदाहरण देखें.!! बान्धवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान, मध्यप्रदेश के सघन वन के मध्य श्रीमन्नारायण अत्यंत ही शान्त भाव में निद्रालीन हैं। ये सहस्रों वर्ष पूर्व निर्मित श्री हरि विष्णु के बारह मीटर लम्बी अद्वितीय प्रतिमा हैं। ये अद्भुत प्रतिमा एक ही पाषाण शिला से निर्मित हैं। ये विग्रह किन सनातनी पूर्वजों के द्वारा निर्मित है, यह अज्ञात है। भगवान श्री हरि विष्णु  के मस्तक पूर्वाभिमुख तथा पाद पश्चिमाभिमुख हैं। श्री हरि विष्णु के पाद से एक स्वच्छ निर्मल जलधारा निकलती है जो बांधवगढ़ की जीवनरेखा है। इस जलधारा का नाम "चरणगङ्गा" है। श्री नारायण के चरण कमल के स्पर्श से 'चरणगङ्गा' का जल भी पवित्र हो "चरणामृत" तुल्य हो जाता है। मनमोहक, नयनाभिरामी, दर्शनीय, वातावरण मानव जीव जंतुओं को सम्मोहित कर देते हैं। अपने ओर आकर्षित करते हैं। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय श्रीमन्नारायण🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा ...

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आप आज तकनीकी रूप से कितने ही आधूनिक हो जाएँ परंतु प्राचीन सनातनी वास्तु शिल्प शैली के कौशल से जब आपकी तुलना होगी तो आप सदैव कमतर ही पाए जाएँगे। जिस मन्दिर के अद्वितीय सौंदर्य को षड्यंत्र के द्वारा वामपंथियों और गुलाबो गैंग ने समान्य लोगों के बीच  विख्यात नहीं होने दिया। वे अपने कुटिल नीति से सनातनी धरोहरों के सौन्दर्य और ख्याति को कुछ समय के लिए छुपा सकते थे, धूमिल कर सकते थे, पर समाप्त नहीं कर सकते थे। और षड्यंत्रों के घटाटोप अंधकार को चीर कर देदीप्यमान सूर्य के सदृश्य यह सौंदर्यपूर्ण सनातन धरोहर चमक रहा है। यह मन्दिर अपने अलौकिक सौंदर्य के पश्चात भी अधिकांश लोगों को अल्प ज्ञात है क्योंकि वामपंथी लुगदी उपन्यासकार (कथित इतिहासकार) ने इसके महान इतिहास को छुपा दिया। ये हैं चांग बटेश्वर मन्दिर, पुणे, महाराष्ट्र। चांग बटेश्वर मन्दिर पुरन्दर किला (नारायणपुर) के निकट स्थित है। (चित्र - साभार) यह मन्दिर hemadpanti वास्तुशिल्प का अनुपम नमूना है। चांग बटेश्वर मन्दिर देवाधिदेव महादेव को समर्पित हैं। यह मन्दिर १३ वीं शताब्दी में निर्मित है और दर्शनार्थियों को अपने अनुपम सौंदर्य के कारण मन्त्र...

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आर्यावर्त का राजसत्ता जब तक सनातन धर्म द्वारा निर्देशित किया जाता रहा तब तक सदा समृद्धि सम्पदा से देश परिपूर्ण रहा। विधर्मी म्लेच्छों ततपश्चात फिरंगी लुटेरों ने यहाँ के जनसमान्य के विचारों को दूषित कर धर्म विमुख कर दिया। परिणामस्वरूप समृद्धि शनैः - शनैः अवसान की ओर अग्रसर होता गया। आज तो राजसत्ता "सिकुलर गिरोह" के चंगुल में कराह रहा है और राजकीय क्रियाकलापों में "कट - पेस्ट shame-वि.धान" का ही बोलबाला है। गहरे तल पर चिंतन करने पर पाएँगे की उत्तरी क्षेत्र की अपेक्षा दक्षिणी क्षेत्र में मन्दिरों, धर्म स्थलों और धार्मिक अनुष्ठानों का संरक्षण पर्याप्त मात्रा में है। इसका कारण है कि असभ्य लुटेरों रेगिस्तानी पशुओं का विध्वंसक शक्ति उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में क्षीण हो गया था। शैव परम्परा उत्तर में कश्मीर और दक्षिणी क्षेत्रों में चोल साम्राज्य में महत्वपूर्ण भूमिका में रहा है। चोल साम्राज्य के राजराजा, राजेन्द्र प्रथम आदि ने भगवान शिव के मन्दिरों, मण्डपों आदि के निर्माण तथा वास्तु एवं शिल्पकला के संरक्षण में महती भूमिका निभाई है। विजयनगर साम्राज्य विश्व में अपनी समृद्धि के...

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आर्यावर्त के अधिकांश लोग इसके बारे में जानते भी नहीं होंगे क्योंकि यह कोई मकबरा नहीं, म.स्जिद नहीं या मुगलों का हड़पा/कब्जाया कोई महल या राजप्रासाद नहीं है। क्योंकि वामजीवियों (कथित इतिहासकार) और कांगियों ने तो इतिहास के पाठ्य पुस्तकों में केवल मकबरों, म.स्जिदों, चर्चों को ही महिमामण्डित करने का षड़यंत्र किया है। यह है श्री तिरुचेंदुर मुरुगन मन्दिर परीसर, तिरुचेंदुर, तमिलनाडु। (चित्र - साभार) भारतवर्ष के सबसे वृहत मन्दिर समुच्चयों में यह चतुर्थ स्थान रखता है। यह मन्दिर देवसेना के अधिपति, पर्वतीनन्दन, भगवान श्री सुब्रह्मण्यम कार्तिकेय स्वामी जी को समर्पित है। यह अपने सौंदर्य और वैभव के लिये प्रसिद्ध है। इसका अस्तित्व वैदिक काल से ही है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। यह मन्दिर कुछ एक उन वैभवपूर्ण मन्दिरों में से है जो मुगलों-जेहादियों के खूनी पंजों से तो बच गया पर धूर्त वामपंथी इतिहासकारों और गुलाबो मंडली के खूनी खेल से न बच सका और  इन महान धरोहरों को पाठ्य पुस्तकों से दूर रखा और हम अनभिज्ञ बने रहे। इसके वैभवशाली निर्माण को देखकर सनातनी पूर्वजों के प्रति मस्तक श्रद्धा से ...

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सनातनियों को कथित वामी लुगदी उपन्यासकार (मूढ़ इतिहासकार) ने कितना झूठ बोल और लिख कर भ्रमित एवं हीन भावना से ग्रसित किया है, एक उदाहरण प्रस्तुत है। ऑस्ट्रेलिया के पहला आधिकारिक खोज का श्रेय विलेम जैंसजून को ई. सन १६०६ में दिया जाता है। पहला फिरंगी जिसने आर्यावर्त के पवित्र भूमि पर अपना अपवित्र पांव रखा था वह पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा माना जाता है जो ८ जुलाई १४९७ में भारत की खोज में निकला था और वह २० मई १४९८ को केरल के कोझिकोड जनपद के कालीकट (काप्पड़ गाँव) पहुँचा था। अफ्रीका का खोज यूरोपीय नाविकों ने उन्नीसवीं सदी में किया था। अर्थात इन लुगदी उपन्यासकार इतिहासकारों के शब्दों में १४९८ व १६०६ तक आर्यावर्त भरतखण्ड का ऑस्ट्रेलिया/अफ्रीका से संपर्क का कोई दूर दूर तक संबंध नहीं था। अब इस चर्चा को यहीं रोककर संलग्न चित्र को ध्यान से देखें.!! (चित्र - साभार) क्या इस प्रस्तर मूर्ति में आपको "जिराफ" गढ़ा हुआ दिखाई देता है.?? ध्यान रखें जिराफ अफ्रीका/ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है और इसे किसी पाषाण शिला पर गढ़ने हेतु उस शिल्पकार को जिराफ को देखना और जानना अवश्य ही अनिवार्य है। अब इस मू...

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सनातनी पूर्वजों ने अपने सांस्कृतिक/सामाजिक जीवन के सभी घटनाओं को पाषाण शिला पर ही गढ़ कर इतिहास लेखन किया जो आज सम्पूर्ण आर्यावर्त में अनमोल बिखरे मोती के समान हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि उन इतिहास को हम कितना डिकोड कर पाते हैं, कितना पढ़ पाते हैं। यह जीवंत मूर्ति गुल्लिका अज्जी की है। यह गोमतेश्वर मन्दिर, श्रवणबेलगोला, कर्नाटक में स्थापित है। (चित्र - साभार) जैन अनुयाइयों के लिए गोमतेश्वर एक महत्त्वपूर्ण धर्मिक स्थल है। श्री बाहुबली को गोमतेश्वर भी कहा जाता है। श्री बाहुबली का निर्माण ९८१ ई. में गंगा मंत्री और सेनापति चामुंडराय ने करवाया था। श्री बाहुबली की ऊंचाई ५७' फीट है। गुल्लिका अज्जी की कथा कुछ इस प्रकार है। किंवदंती है कि श्री गोमतेश्वर का सेनापति चामुंडराय निर्माण कार्य संपन्न होने के पश्चात उनका अभिषेक करने का विचार किया। श्री गोमतेश्वर अभिषेक हेतु उसने पाँच पवित्र द्रव दुग्ध, कोमल नारियल जल, मधु, शर्करा, एवं पवित्र सरिता जल को सैकड़ों पात्रों के इकट्ठा किया। जब उसने अभिषेक आरम्भ किया तो आश्चर्यजनक रूप से द्रव पदार्थ मस्तक के नाभी तक ही आता था। नाभी से नीचे द्रव पद...

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बस अनुमान लगाएँ कि कितना क्रूर, निर्दयी, असभ्य, अत्याचारी, विकृत मानसिकता का और दुराचारी होगा वह आततायी, विधर्मी, म्लेच्छ आक्रांता जिसने भगवान शिव के इस मनमोहक, जीवंत मृत्युञ्जय रूप को विखंडित किया होगा.! कितना विष और द्वेष भरा हुआ होगा उस विधर्मी के मस्तिष्क में.! क्या विधाता उस दूषित रक्त के दुष्ट को कभी क्षमा करेंगे.?? क्या आप कभी भी किसी सत्ताजीवी राजनेताओं या सिकुलर गिरोह के कहने पर उसे क्षमा कर पाएँगे.?? क्या इस वीभत्स दृश्य को देखकर भी "भाई-चारे" की पीपनी बजा पाएँगे.?? स्यात नहीं ही....!! आज खण्डित होने पर भी इस विग्रह की कांति अचंभित करता है, सम्मोहित करता है.!!! अद्वितीय, अकल्पनीय श्री मृत्युञ्जय विग्रह, पाल साम्राज्य कालीन, बंगाल। (चित्र - साभार) अद्भुत सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा