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Showing posts from August, 2023

सनातन धर्म

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शाखाओं के कटने से जड़ नहीं समाप्त होते हैं। और सनातन धर्म के जड़ तो सम्पूर्ण जगत में विस्तारित हैं। इन्हें मिटाने के सभी प्रयास असफल ही होंगे और एक दिन पुनः यह विश्व के समक्ष प्रस्तुत हो जाएँगे। वर्ष १९८५ में आकस्मात एक उत्खनन में सनातन धर्म के कुछ चिह्न मिलने पर वहाँ पर विस्तृत खुदाई किया गया। इस उत्खनन में उन्हें चौथी - नवीं शताब्दी के मध्य का सनातन संस्कृति के अस्तित्व के साक्ष्य प्राप्त हुए। यहाँ शैव परम्परा के प्राचीन प्रमाण प्राप्त हुए। यहाँ दक्षिण पूर्व एशिया के विशालतम पाषाण शिवलिङ्ग प्राप्त हुए हैं। (चित्र-साभार) यह २.२६ मीटर का शिवलिङ्ग वियतनाम के हो-ची-मिन्ह नगर से १५० कि.मी. दूर "कैट ट्येन" पुरातात्विक स्थल पर खुदाई में मिला है। ज्ञात हो कि वियतनाम भी प्राचीन काल में शैव परम्परा में सनातन धर्म का ही देश रहा है। सनातन धर्म के सत्य को कहाँ तक छुपाओगे, जहाँ भी हाथ लगाओगे सनातन धर्म के साक्ष्य ही पाओगे। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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वामी, कामी और लहरू गैंग के निकृष्ट दोपाया पशुओं ने आर्यावर्त को सँपेरों, असभ्य जंगलियों का देश प्रमाणित करने का हर सम्भव प्रयास किया। परन्तु सत्य तो धरती-आकाश को भी चीर कर प्रकट होने का सामर्थ्य रखता है। उन्हें बता दें कि जब उनके बौद्धिक वृद्ध प्रपितामह वर्णमाला के अक्षर सिख रहे थे..  उस समय हमारे वैदिक सनातन धर्म के पूर्वजों ने अकल्पनीय पाषाण शिल्प कला के साक्षात प्रमाण निर्माण कर हम सनातनी वंशजों के लिए विरासत में छोड़ गए हैं। जिन पर हमें अभिमान, घमंड, गर्व है। ये निकृष्ट पशु कहते हैं कि नारी का सनातन संस्कृति में सम्मान नहीं था। अरे मूढ़.!! नारी सम्मान के इस प्रत्यक्ष प्रमाण को देख।  इस मन्दिर के पाषाण शिल्प में नारी केश-विन्यास के ६० रूपों को पत्थरों पर उकीर्ण किया गया है। सभी मूर्तियाँ जीवन्त प्रतीत होते हैं।  और कोई भी एक मूर्ति दूसरे से नहीं मिलती हैं।  और हाँ, यह निर्माण आज का नहीं सहस्रों वर्ष पूर्व का ही है। यह प्रमाणित करता है कि जिसे आधुनिकता में "FASHION" कहते हैं वह उत्कृष्ट रूप में प्राचीन काल में ही नारी सौंदर्य का सनातन संस्कृति का एक अवयव रहा है। ये स...

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हमारे सनातनी पूर्वजों के लिए धर्म ही सर्वोपरि रहा है इसलिए उन्होंने सबसे अधिक अपने आराध्य देव के मन्दिरों के निर्माण में अपने कला के उत्कृष्टता का प्रदर्शन किए हैं। पन्द्रहवीं शताब्दी में बने हुए इन प्राचीन मन्दिरों को देखने पर दृष्टि हटाने की इच्छा नहीं होती है। (चित्र-साभार) ये विजयनगर, गुजरात, जिसे पोलो फारेस्ट भी कहते हैं में स्थित हैं। इनके वास्तुशिल्प और स्थापत्यकला अतुलनीय हैं। कितना आश्चर्यजनक है कि यह निर्माण सनातनी हाथों से हुआ है। इनके सम्पूर्णता और एकरूपता का कोई अन्य अनुकृति समकालीन विश्व में कहीं भी ढूँढना असम्भव है। यदि कोई वामी/कामी/कांगी/librand कहीं विश्व में इसकी अनुकृति ढूंढ पाए तो अवश्य ही बताना। अकल्पनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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ऐसा अकल्पनीय शिल्पकला कि दर्शक अचंभित हो जाएँ। मानव की कल्पना को सनातनी पूर्वजों ने इस उत्कृष्टता से परिपूर्ण किया है जो आज का मानव ऐसा निर्माण करने का सोच भी नहीं सकता है। यह अब ज्ञात नहीं है, ऐसी शिल्पकला व वास्तुकला की कौन सी तकनीक हमारे पूर्वजों के पास थी जिसे हम आज इतना उन्नत होकर भी समझ नहीं पाए हैं। इसकी तुलना व प्रतिकृति निर्माण करना तो विश्व में किसी से भी सम्भव नहीं था। किन्तु लहरू-गैंग तथा वामपंथियों का षड्यंत्र इस महान विरासत पर भारी पड़ा और विश्व क्या स्वयं आर्यावर्त के सभी लोग भी इसके बारे में कम ही जानते हैं। चेन्नाकेशव मन्दिर, सोमनाथपुरा, कर्नाटक। (चित्र - साभार) वैभवपूर्ण सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय श्री लक्ष्मीनारायण🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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वही अनादि हैं, वही अनन्त हैं। वही कण कण में व्याप्त हैं। समस्त ब्रह्माण्ड उन्हीं से है और उन्हीं में समाहित है। ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य   पूर्णमादाय   पूर्णमेवावशिष्यते॥ देवाधिदेव महादेव का दुर्लभतम अद्वितीय अघोरमूर्ति शिव विग्रह। श्रीकण्ठेश्वर मन्दिर, नंजनगुड़, कर्नाटक। इस अद्भुत विग्रह में भगवान शिव के ३० हाथों में विभिन्न अस्त्र शस्त्र आयुध सुसज्जित हैं। जब नकारात्मक शक्तियों का अत्यधिक उत्थान हो जाता है तो भगवान शिव अपने संहारक रूप में उन दुष्ट शक्तियों का संहार कर ब्रह्माण्ड में संतुलन स्थापित करते हैं। सम्पूर्ण विग्रह अकल्पनीय शिल्पकला का आदर्श प्रतिकृति हैं। वस्त्र, आभूषण, साज सज्जा जिस उत्कृष्ट रूप में निर्मित है यह शिल्पकार के कर्मठता, निपुणता, प्रवीणता का द्योतक है। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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माँ रक्तबीजनाशिनी, माँ महाकाली के विग्रह अनेक रूपों में प्राप्य हैं। माँ दक्षिणकाली, माँ भद्रकाली, माँ श्मशानकाली आदि..। माँ की यह प्रतिमा दुर्लभ विशिष्टता लिए हुए हैं। इस प्रतिमा में माँ दशमुखी हैं तथा इनके भुजाएँ व पाद दस-दस ही हैं जो इन्हें विलक्षण बनाते हैं। यह प्रतिमा भगवान शिव मन्दिर, तोखा, काठमांडू, नेपाल में स्थापित हैं। माँ के सभी हाथों में आयुद्ध सुसज्जित हैं। माँ मुण्डमाला से शोभायमान हैं। माँ के नेत्रों से करुणा का प्रवाह हो रहा है। दुर्लभतम सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय माँ महाकाली🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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बस्तर और दंतेवाड़ा की चर्चा प्रायः समाचारों में रहता है। किन्तु ये समाचार अधिकांशतः विचलित करने वाले ही होते हैं। वैसे बस्तर दंतेवाड़ा का एक सौन्दर्यपूर्ण इतिहास रहा है। नाग शासन काल यहाँ का महत्वपूर्ण कालखण्ड रहा है। इसी नाग शासन में राजमहिषी गङ्गमहादेवी ने यहाँ भव्य शिवालय युग्म बनवाया था। यह मन्दिर निर्माण १२१० ई. में हुआ था। राजमहिषी ने इस दो शिवालयों में एक अपने नाम गङ्गमहादेवी के नाम पर श्री गङ्गाधरेश्वर महादेव मन्दिर व दूसरा अपने पति महाराज सोमेश्वर देव के नाम पर श्री सोमेश्वर महादेव मन्दिर का निर्माण करवाया। यह यहाँ शिलालेख में भी अंकित है। इस शिवालय युग्म को "बत्तीसा मन्दिर" के नाम से जाना जाता है क्योंकि जिस प्रकार सिंहासन बत्तीसी में बत्तीस पुतलियाँ उत्कीर्ण थीं उसी प्रकार इस मन्दिर का मण्डप बत्तीस स्तम्भों पर आधारित है। यह शिवालय युग्म बारसूर, दंतेवाड़ा जनपद, छत्तीसगढ़ में स्थित है। यह शिवालय दो गर्भगृह से युक्त हैं तथा दोनों गर्भगृह में त्रिरथ शैली में निर्मित शिवलिङ्ग स्थापित हैं। इस शिवालय के शिवलिङ्गों को इसकी विशिष्टता अन्य शिवलिङ्ग की तुलना में दुर्लभ बनाती है। ...

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अतीत जब वर्तमान के लिए स्थान रिक्त करता है तो इस अपेक्षा के साथ काल में विलीन होने जाता है कि जो वर्तमान उससे सत्ता प्राप्ति कर रहा है वह उससे अधिक उन्नत, विकसित, परिष्कृत और उत्कृष्ट सृजनात्मकता अपने आने वाले पीढ़ियों को हस्तांतरित करेगा। इस वस्तुशिल्पों को zoom करके देखें.!! (सभी चित्र-साभार) ये निर्माण हमारे अतीत के सनातनी पूर्वजों ने अपने कला के प्रति अखण्ड समर्पण से निर्मित कर वर्तमान के सनातनी संततियों के लिए छोड़ गए हैं। ये द्रविड़ शैली का निर्माण चौदहवीं शताब्दी का है। श्री सोमेश्वर महादेव मन्दिर, कर्नाटक। वर्तमान में..... क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था ने हमें इतना शिक्षित किया कि हम इसकी अनुकृति भी बना सकें.??? क्या हम अपने अतीत के पूर्वजों से उन्नत, विकसित, परिष्कृत, उत्कृष्ट और संस्कार से परिपूर्ण समाज का निर्माण कर पाए.??? अवश्य चिंतन करें.!! कि कथित "स्वाधीनता" के उपरांत जिन लोगों के हाथों में राष्ट्र निर्माण के बागडोर को सौंपा उन्होंने हमें किस राह पर चलाया.??? हमने क्या प्राप्त किया.??? जिस लोकतंत्र का झुनझुना थाम कर राजनैतिक मानवभक्ति में मनोरोगी बन हीनू रास टर्र का...

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नदी का जल सतत प्रवाहित होने के कारण सदा शुद्ध रूप में रहता है जबकि तलैया का जल बंधा हुआ होता है और उसके सड़न उत्पन्न होने लगता है। यही वह विशिष्टता है जो सनातन धर्म को अन्य मज.हबो. से अलग करता है और उच्चतम स्तर पर स्थापित करता है। सनातन धर्म सतत विकासवान रहा है। इसलिए इसमें त्रुटि की संभावना क्षीण है। ये अपने अंदर सदैव विकास के लिए तत्पर रहते हैं। सनातनी अपने आराध्य देव की आराधना विभिन्न रूपों में विग्रहों/प्रतिमाओं/मूर्तियों को बनाकर करते हैं। ये एक दुर्लभ पञ्च-शिवलिङ्ग हैं जो हम्पी, कर्नाटक में प्राप्त हुआ है। विजयनगर साम्राज्य का समृद्धशाली नगर हम्पी जो समकालीन विश्व में सर्वोच्च स्थान रखते हैं। हम्पी जो विधर्मियों के नष्ट भ्रष्ट करने पर भी अतुलनीय हैं। यह सनातनियों के उत्कृष्ट शिल्पकला की आदर्श प्रतिमूर्ति है। इस पञ्च-शिवलिङ्ग में रुद्रावतार आञ्जनेय महावीर जी को भगवान शिव का पूजन अर्चन करते हुए अनुपम रूप में दर्शाया गया है। (चित्र-साभार) अद्वितीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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"खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी" सनातनी शौर्य और वीरता के प्रतीक..... मणिकर्णिका 'मनु' (झाँसी की रानी) जिस मन्दिर में प्रतिदिन नियमित अपने आराध्य देव भगवान शिव का पूजन, अर्चना व दर्शन करती थी। यह दर्शनीय शिव मन्दिर झाँसी किला, झाँसी, उत्तरप्रदेश में स्थित है। (चित्र - साभार) इस मन्दिर में ग्रेनाइट का दिव्य शिवलिङ्गम स्थापित है। यह मन्दिर १८वीं शताब्दी में नारू शङ्कर के द्वारा बनवाया गया था। यह शिव मन्दिर बुंदेला और मराठा के मिश्रित वास्तुकला में निर्मित एक अद्वितीय मन्दिर है। प्राचीन होने पर भी इस मन्दिर की भव्यता भक्तों को आकर्षित करता है। आज भी यह प्राचीन मन्दिर शिव भक्तों में लोकप्रिय है। वैभवशाली ऐतिहासिक सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग, किन्नर, असुर, मानव सबों ने देवाधिदेव महादेव के शरणागत हो भक्ति भाव से इन्हें प्रसन्न कर अपने अभीष्ट को प्राप्त किया है। भगवान शिव की जिसने भी भक्ति की उन्हें वरदान देने में प्रभु ने कभी कमी नहीं किए, चाहे वर मांगने वाले की मंशा सृजन हो या विनाश कोई अंतर नहीं किए। तभी तो इन्हें औघड़दानी कहा जाता है। ये सदैव अपने भक्तों को पाप, शाप, व संताप से मुक्ति दिलाए हैं। इसलिए इनके भक्तों ने इनके विग्रह को अपने सुविधा अनुसार सभी स्थानों पर स्थापित किए हुए हैं। परमपिता परमेश्वर भगवान शिव का दुर्लभतम विग्रह और शिवलिङ्गम सुदूर सघन वन के मध्य स्थापित है। यह अनुपम विग्रह कलहट्टी झरना (निकट), कलाठिगिरी, चिकमंगलूर जनपद, कर्नाटक में स्थापित है।(चित्र-साभार) भगवान शिव के विग्रह के शिल्पकला की निपुणता और प्रवीणता आश्चर्यचकित करते हैं। नागनाथ, रुद्राक्ष, भगवान की जटा, उंगलियों आदि को कितने उत्कृष्टता और स्पष्टता से निर्मित किया गया है। यहाँ का दृश्य कितना दिव्य और दुर्लभ है। इस शान्त निरवता में भी एक अलौकिक ऊर्जा का प्रवाह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। अतुलनीय सनातन धरोहर....!! ...

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बाल्यकाल में वामपंथियों और कांगियों के सनातन धर्म के प्रति द्वेष और घृणा का कुछ पता नहीं चला। हमने वही पढ़ा जो इन घृणित जीवों ने षड्यंत्र रच के "लुगदी उपन्यास" में लिखा और इसे ही भारत का प्राचीन इतिहास कहा। इन लोगों ने आर्यावर्त गौरवशाली इतिहास को छुपा कर इसे 'जंगली और संपेरों' का देश लिखा। संलग्न चित्र श्री चेन्नाकेशवा मन्दिर, कर्नाटक में बने लड़ियों का है।(चित्र-साभार) यदि आर्यावर्त के लोग  "तथाकथित आदिमयुग" के मानव थे तो उन्होंने यह अकल्पनीय, अविश्वसनीय निर्माण कैसे किए.?? यह ध्यान रखें कि सम्पूर्ण निर्माण एक ही ग्रेनाइट के पाषण शिला पर किया गया है। ध्यान रखें, ग्रेनाइट प्रस्तर का कठोरतम चट्टान है। MOH'S scale पर इसकी कठोरता ८ है जबकि सबके कठोर हीरे की १० है। इतनी कठोरता होने पर भी ये सभी कलाकृतियां बिना किसी विद्युत चालित यंत्रों द्वारा मात्र मानव हाथों से किस प्रकार बनाया गया होगा यह आश्चर्य चकित करता है। क्या समकालीन विश्व के किसी भी अन्य देशों में ऐसा निर्माण ये वामपंथी दिखा सकते हैं.?? क्या इसे सनातनी शिल्पकारों के "चमत्कार" के अतिरिक्त क...

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परमपिता भोलेनाथ के भक्ति की अगन जब जल उठती है फिर औघड़दानी के भक्त आनन्द में उन्मत्त हो अपने आराध्य देव का पूजन अर्चन करने हेतु कहीं भी बैठ सकते हैं। वो थल हो या जल.!! मैदान हो या मरुस्थल.!! कन्दरा हो या पर्वत.!! कोई अन्तर नहीं पड़ता.!! बस एक महादेव की राग.!!! यह परमपिता देवाधिदेव महादेव का अद्वितीय, अतुलनीय स्वयम्भू शिवलिङ्गमसघन वन में स्थापित है.!! श्री सुंदर महालिङ्गम, सथूरागिरी पहाड़ी, मदुरई के निकट, तमिलनाडु। (चित्र - साभार) भगवान शिव अपने दिव्य प्रकाश से सघन वन को भी आलोकित कर रहे हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य भक्तों को सम्मोहित कर मन्त्रमुग्ध कर दे रहे हैं। शिव भक्त यहाँ भी अपने प्रभु से मिलने, उनका पूजन करने, इनका आशीर्वाद प्राप्त करने बढ़े ही भक्ति भाव से आते हैं। अनुपम सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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किसी भी वास्तुशिल्प के निर्माण का प्रथम चरण उसकी परिकल्पना ही होती है। आधुनिक आर्किटेक्ट उसे ही आधुनिक तकनीक का उपयोग कर ग्राफिक्स का रूप देते हैं। जिसे मूर्तिकार/कलाकार/श्रमिक अपने हाथों/यंत्रों/प्रयासों से मूर्त रूप प्रदान करते हैं। संलग्न छवियों को ज़ूम करके देखें.!! (चित्र - साभार) अब विचार करें कि जिन सनातनी वास्तुकारों ने इसकी परिकल्पना की होगी उनकी कल्पनाशीलता किस उच्चतम स्तर की होगी.!! इस परिकल्पना को साकार करने हेतु जो आवश्यक गणना/माप/साधन उपलब्ध करवाने का जो कार्य होगा वह कितना दुरूह होगा.!! परन्तु बिना किसी आधुनिक तकनीक और आधुनिक यंत्रों के हमारे सनातनी पूर्वजों ने यह कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किया और इसे छोड़ गए विश्व समक्ष अपने उत्कृष्ट कल्पनाशीलता और कार्य सम्पादन के प्रमाण के रूप में.!! कोई माने या नहीं माने किन्तु उन्होंने जो भी निर्माण किया वह अतुलनीय है, अद्वितीय है। धन्य है वे सनातनी शिल्पकार जिनकी रचना सहस्रों वर्षों के पश्चात आज भी गर्व से खड़ा है। यह कला आज इसलिए विलुप्त हो गया है क्योंकि हमारे गुरुकुल परम्परा को ध्वस्त समाप्त कर दिया गया। मन्दिर एंडोमेंट एक्ट को निरस...