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Showing posts from February, 2025

सनातन धर्म और हम

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जिन तथाकथित 'फेमिनिस्ट' & 'वोक्स' /लिब्रांड/वामी/कामी को लगता है कि.... वैदिक सनातन परंपरा में महिलाओं को अधिकार नहीं था। वे इन वास्तु शिल्पों में निर्मित भाव भंगिमाओं को देखें,  उनके ज्ञानचक्षु खुल जाएँगे कि... जितना सम्मान और अधिकार नारी को सनातन परंपरा में रहा... किसी और पन्थ-मजहब में नहीं दिया गया। क्योंकि सनातनी मन्दिरों में उत्कीर्ण ये मूर्तियाँ समसामयिक विषयों और समाजिक जीवन के प्रतिबिंब हैं। परंतु क्या कहें, बात वही है कि "अंधे आगे नाचते कला अकारथ जाय"... जिस प्रकार उल्टे घड़े पर जल डालने से ऊर्जा क्षरण के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त नहीं होता उसी प्रकार इन मूढ़मति को कितने ही प्रमाण दे दो ये सुधरने वाले नहीं.!! तो इन अधम को इसके हाल पर छोड़ देना ही श्रेयस्कर होगा.! सनातन धर्म सदा सर्वदा से ही जयतु है और जयतु ही रहेगा.! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय महाकाल 🙏🌺🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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एक अद्वितीय अद्भुत शिवलिङ्ग, शङ्कर मठ, थिरुवीडिमृदुर, तंजावुर, तमिलनाडु। ऐसी मान्यता है कि जब आदिशंकराचार्य ने अद्वैत के सत्य को प्रमाणित करना चाहा तब शिवलिंग में से एक हस्त अभय मुद्रा में प्रकट हो गए और  यह वचन कहे, - "सत्यम अद्वैतम"॥ यह वही प्राचीनतम शिवलिङ्ग है। शिवभक्तों की इस शिवलिङ्ग के साथ अनन्य आस्था भक्ति और श्रद्धा है।  शिवभक्त यहाँ दैनिक पूजन आराधना कर अपने परमानंद में होते हैं। महान सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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हमारे सनातनी पूर्वजों की सृजनशीलता किसी भी अन्य सभ्यता से अकल्पनीय एवं अतुलनीय ही रहा है। सनातनी हाथों ने जो कुछ भी रच डाला है वह आज भी कल्पनातीत ही है। यहाँ तक कि उस सृजन में प्रयोग किए गए तकनीकों से भी आज का आधुनिक विश्व और आधुनिक विज्ञान अनभिज्ञ ही है। उनके सृजन में उपयुक्त यंत्र और विधि आज तक भी रहस्य के गर्भ में छुपे हुए हैं। चलिए देखिए इन अद्भुत चित्रों को....... (चित्र साभार) जैसा कि वामियों, कांगियों, लहरू के चरण-चाटूकारों ने लुगदी उपन्यास (इतिहास) में लिख कर संसार को बताया था कि आर्यावर्त के निवासी सँपेरे, असभ्य जंगली थे.. तो "उनाकोटी" के रघुनंदन पहाड़ों पर (त्रिपुरा में) यह नयनाभिरामी, अद्वितीय, अद्भुत शिल्प किसने बनाया?? क्योंकि जिस काल में यह बनाया गया था उस समय ईसा-मूसा का जन्म भी नहीं हुआ था। उस काल में "उजला, हरा, पीला, नीला" गैंग का कोई अस्तित्व ही नहीं था। सभी पहाड़ आदि देव शिव, श्री गणेश, श्री विष्णु, माँ भवानी आदि आराध्य देव/देवी के मूर्तियों से भरे पड़े हैं। यह धर्मनगर का महत्वपूर्ण तीर्थ व पर्यटन स्थल है। वैसे "उनाकोटी" का अर्थ है (कोटि =...

सनातन धर्म और हम

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वामियों क्रिस्लामियों ने कैसे हमारे गौरवशाली प्रमाणिक इतिहास से ही हमें दूर कर दिया और इसके दूरगामी दुष्परिणाम  किस प्रकार आज हमारे सनातनी परंपरा संस्कृति को ही अजगर की भांति निगलता जा रहा है इसे देखते ही पीड़ा से मन विचलित हो उठता है। उन्होंने हमारे शिक्षा व्यवस्था पर अधिकार कर लिया और अपने कुटिलता से शिक्षार्थियों के मतिष्क में अपने कुटिल खल कामी विचारों का बीजारोपण करता गया। शनैः शनैः हमारी युवा पीढ़ी के विचारों को ही दूषित कर दिया। आईए एक उदाहरण देखते हैं..... उन्होंने कहा/पढ़ाया कि हमारे सभी ग्रन्थ मात्र पौराणिक कथाएं हैं। इतिहास से इसका कोई संबंध नहीं है। चलो माना कि यदि हमारा इतिहास केवल पौराणिक कथा है तो इन महान धरोहरों को कौन बना कर छोड़ दिए हैं.??? उस काल में तो..... ना लेजर कटर था... ना ही इलेक्ट्रोनिक ड्रिलर मशीन था.... ना ही ऑटोमेटिक रॉक कटर था.... ना कंप्यूटर सॉफ्टवेयर था... और  ना ही कंप्यूटर ग्राफिक डिजाइनर...! तो फिर इसकी परिकल्पना और निर्माण कार्य किन लोगों के द्वारा किए गए थे.?? हमारे पूर्वजों के शिल्प कला के निपुणता को देखिए, कितने कठिन परिश्रम से इस विग्रह...

सनातन धर्म और हम

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किसी राष्ट्र को अंदर से घुन खाए लकड़ी के जैसा निर्बल और नष्ट करना हो तो उसके इतिहास को मटियामेट कर दो। यही सबसे अधिक प्रभावी रणनीति होती है। आर्यावर्त भरतखण्ड के शौर्य पराक्रम भाव को समाप्त करने हेतु सिकुलर/लिब्रांड/वामी/कांगी गैंग ने यही किया। इस गैंग ने इतिहास में इतना मिलावट किया कि उसे गल्प-साहित्य या लुगदी-उपन्यास जैसा बनाकर रख छोड़ा। हमारा वैभवशाली इतिहास यह है कि..... चोलों ने २१०० वर्ष राज किया.! चालुक्यों ने ७०० वर्ष राज किया.! पांड्यों ने ८०० वर्ष राज किया.! सातवाहनों ने ५००वर्ष राज किया.! अहोम राजवंश ने ७०० वर्ष राज किया.! पल्लवों ने ६०० वर्ष राज किया.! चंदेलों ने ४०० वर्ष राज किया.! राष्ट्रकूटों ने ५०० वर्ष राज किया.! मौर्य वंश ने ५५० वर्ष राज किया.! गुप्त वंश ने ४०० वर्ष राज किया.! और विधर्मी मलेच्छ मुगलों ने मात्र २०० वर्ष राज किया.! (सम्पूर्ण देश पर एक साथ इन मलेच्छों का राज मात्र इतना ही रहा है) इसके अतिरिक्त शुंग राजवंश, नंद राजवंश, कुषाण आदि अनेक राजवंशों की बात छोड़ भी दें तो इस सत्य को कोई झुठला नहीं सकता है। पर विडम्बना है कि हमारे (कथित) इतिहास की पुस्तकों में वैभ...

सनातन धर्म और हम

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देवाधिदेव महादेव के अधिकांश शिवालयों में प्रभु को शिवलिङ्ग के रूप में ही पूजन किया जाता है। माँ पार्वती का या तो पृथक मन्दिर होता है या फिर उसी शिवालय में पृथक विग्रह रूप में पूजन किया जाता है। परंतु परमपिता महादेव का संभवतः यह एक मात्र शिवालय पूजन स्थल है जहाँ उन्हें संयुक्त - विग्रह "हर-गौरी" के रूप में पूजा जाता है। यह वेलपुर, निजामाबाद , तेलंगाना में है, जिसे यादव राजाओं ने तेरहवीं शताब्दी में बनवाया है इसे स्थानीय लोगों के द्वारा "अर्धनारी-नटेश्वर" कहा जाता है। इसमें श्री उमा-महेश्वर के संयुक्त विग्रह हैं। (चित्र - साभार) सनातनी शिल्पकार ने अपनी सम्पूर्ण कला निपुणता पारंगतता उत्कृष्टता को इसके निर्माण में उड़ेल दिया है। ध्यान से इनके मुखमंडल, अंगविन्यास, वस्त्र, आभूषण, आयुध, मुकुट, तोरण आदि को देखने पर कला उत्कृष्टता संपूर्णता को देखा जा सकता है। यह अतुलनीय शिल्प कला का एक आदर्श उदाहरण है। शिव भक्त के लिए यह अत्यंत लोकप्रिय पूजन और दर्शनीय स्थल है। अद्वितीय सनातन धरोहर...!! ॐ नमः परम् शिवाय 🚩 जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय माँ भगवती भवानी 🙏🌺 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा ...

सनातन धर्म और हम

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ये नर्तकियों की जीवन्त मूर्तियाँ श्री लिङ्गराज मन्दिर, भुवनेश्वर, ओडिशा में निर्मित हैं। (चित्र - साभार) श्री लिङ्गराज मन्दिर देवाधिदेव महादेव को समर्पित हैं। इस मन्दिर के विशालकाय शिवलिङ्गम अपने आप में सम्पूर्ण और अद्वितीय हैं। इस मन्दिर का निर्माण नौवीं सदी में हुआ है परंतु आज भी इसके अद्भुत निर्माण को देखें तो सम्मोहित हो जाएंगे। इन नर्तकियों की मूर्तियों के आभूषणों, जीवंत भाव-भंगिमाएँ उत्कृष्ट पाषाण शिल्पकला के अनूठे नमूने हैं। हमारे प्राचीन मन्दिर केवल आराधना/पूजन स्थल ही नहीं थे। ये मनुष्य के सर्वांगीण विकास के सर्वोच्च स्थल रहे थे। यहाँ वैदिक ज्ञान, व्याकरण, संस्कृत, तकनीकी, शिल्पकला, वास्तुकला, आयुर्वेद, शल्यक्रिया इत्यादि के पठन-पाठन, अनुसंधान के सर्वोच्च संस्थान थे। परंतु दुर्भाग्यवश विधर्मी आक्रांताओं/यवनों और आधुनिक सिकुलर सरकार वाली व्यवस्था ने मन्दिरों के सभी सनातन व्यवस्था को विनष्ट कर सनातन ज्ञान परम्पराओं को समाप्त कर दिया। स्वतंत्र भारत में भी सभी मन्दिरों पर अवैध अधिग्रहण कर इसे मृतप्राय कर दिया है। अब तो कोई पुष्यमित्र शुंग ही अवतार लेकर पुनः सनातन शिक्षण व्यवस्था क...

सनातन धर्म और हम

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वरदराज पेरुमल मन्दिर को जिस ओर से भी देखें एक अद्भुत रोमांच होता है। क्या हमारे पूर्वज किसी दिव्य शक्ति से परिपूर्ण थे जिससे उन्होंने एक ही पाषाण शिला से ऐसा नयनाभिरामी खम्भों को बनाए हैं?? याद रखें ग्रेनाइट सबसे कठोर पत्थर है। मुख्यतः इस लटकते हुए कड़ी की माला को बिना किसी जोड़ के कैसे निर्माण किये होंगे?? ऐसा कड़ी का माला सभी १०० खम्भों पर निर्मित है। (चित्र - साभार) अश्व एवं लघु मूर्तियों का समुच्चय तो अकल्पनीय ही प्रतीत होता है। जब इसे बनाना आज आधुनिक युग में असम्भव है तो १५वीं शताब्दी में इसका निर्माण किस तकनीक से हुआ होगा?? सोचिए और वैभवशाली अतीत के कल्पनाओं में खो जाइए। अद्भुत, अद्वितीय, कल्पनातीत सनातन धरोहर...!! वरदराज पेरुमल मन्दिर, काँचीपुरम, तमिलनाडु। जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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श्री पद्मनाभस्वामी मन्दिर, केरल, सम्पूर्ण विश्व में सबसे धनी सनातनी आध्यात्मिक स्थल, मन्दिर और साधना केन्द्र है। इसकी सम्पदा का अनुमानतः १.२ लाख करोड़ या १.२ ट्रिलियन (US$ 17 BILLION) लगाया गया है। प्रति वर्ष ग्रीष्म विषुव (summer equinox) में सूर्य की किरणें सीधी रेखा में गमन करते हुए मन्दिर के केंद्रीय "गोपुरम" से एक समान समय अंतराल के पश्चात निकलती हैं। इस केंद्रीय गोपुरम का निर्माण सहस्रों वर्ष पूर्व किया गया है जो १०० फीट (३० मीटर) का है। अब सोचिए वर्तमान आधुनिक काल में भी अधिकांश लोगों को विषुव (equinox) और अयनांत (solastice) का ज्ञान नहीं होता है तो उस काल में किस उत्कृष्ट ज्ञान और उपकरणों का उपयोग कर इस अद्वितीय मन्दिर को बनाया गया होगा.?? हमारे पूर्वजों ने पुरातन काल में ही पृथ्वी का आकार, पृथ्वी के अक्ष, पृथ्वी के घूर्णन गति, अक्ष के झुकाव (inclination of earth axis) और अंडाकार कक्षा (elliptical orbit) के रहस्यों को सुलझा लिए थे। उनके लिए अंतरिक्ष का कोई भी रहस्य अज्ञात नहीं था। इस प्रकार का कॉस्मिक संलयन (cosmic fusion) किसी भी स्थापत्य संरचना में सम्पूर्ण विश्व में...

सनातन धर्म और हम

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भक्त एवं कवि सूरदास जी दृष्टिहीन थे परन्तु श्री नटवरलाल बांकेबिहार जी की भक्ति में अपने प्रज्ञा-चक्षु से देखकर लीलामाधव के बालपन का जो वर्णन किए हैं वह अद्भुत है। जब कोई प्रभु के भावनामृत का पान कर लेते हैं तो ऐसा ही भक्ति में डूबे भक्तों के संग होता है। जब भक्त अपने आराध्य देव की भक्ति के उच्चतम स्तर पर पहुँचते हैं तो अपने भक्ति-भाव से उनके अनुपम रूप गढ़ते हैं। यह दुर्लभतम विग्रह श्री नरसिंह स्वामी जी का है जिसमें वे "बाल-रूप" में हैं। (चित्र-साभार) जिस प्रकार यशोदानन्दन को मक्खन अतिप्रिय है, इस विग्रह में भी बाल नरसिंह स्वामी के एक हाथ में मक्खन की कटोरी और दूसरे हाथ में मक्खन का गोला का दर्शाया गया है। ये मनमोहक विग्रह मृगावधे, तीर्थहल्ली तालुका, शिवमोगा जनपद, कर्नाटक में स्थापित हैं। भक्ति-भाव का एक अद्वितीय सनातन धरोहर...!! ॐ नमो नारायणाय 🚩 जय सनातन धर्म🙏🚩 जय नरसिंह स्वामी 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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विश्व की सबसे ऊंची पर्वत चोटी "गौरीशंकर" जिसे सागरमाथा भी कहा जाता है, इसी देश में है। विश्व प्रसिद्ध श्री पशुपतिनाथ मन्दिर इसी देश में है। विश्व की सबसे ऊंची झील इसी देश में है। तिलोचो झील को विश्व की सबसे ऊंची झील होने का गौरव प्राप्त है। इस तिलोचो झील के निकट परमपिता देवाधिदेव महादेव की  अनुपम प्रतिमा स्थापित है। तिलोचो झील, मनांग, नेपाल। (चित्र - साभार) कितनी अलौकिक सौंदर्य और शान्ति फैली हुई है। यह स्वर्गीय दृश्य ही किसी के मन को मोह लेने को पर्याप्त है। अलौकिक सनातन धरोहर...!! ॐ नमः परम् शिवाय 🚩 जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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कुछ दिनों से सारा देश श्रीराममय हो गया है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का यशोगान चहुँ ओर हो रहा है। आईए बात करते हैं श्री राम जी के वनवास काल समाप्ति के उपरांत अयोध्या लौटने की। यह कूप कोई सामान्य कूआँ नहीं है। यह कूप अपने में त्रेतायुग और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी, माता वैदेही जानकी के स्मृति चिन्हों को समेटे हुए हैं। यह अपने आप में आश्चर्यजनक विशिष्टता का संगम धारण किए हुए है। समुद्र के अन्दर स्थित होने पर भी इस कूप में का जल मीठा है (sweet water)। (समुद्र के लवणीय (खारे) पानी में मध्य मृदु जल मिलना असम्भव है।) यह त्रयंबकेश्वर (द्वादश ज्योतिर्लिंग वाला नहीं) प्रभु शिव मन्दिर संस्थानम में स्थित है। यह विल्लुण्डी तीर्थम कहलाता है। Villoondi Theertham, Thangachimadam, Tamilnadu. (चित्र - साभार) ऐसी मान्यता है कि रावण से सीता जी को मुक्त कराकर श्री राम जी यहीं इस देवाधिदेव महादेव के शिवलिङ्गम का पूजन किए थे। पूजन सम्पूर्ण होने के उपरांत जनकसुता सीता जी को प्यास लगने पर श्री राम ने अपने तूणीर से वाण ले समुद्र भेदन कर मृदु जल निकाले थे। इसी जल से भगवती वैदेही अपनी प्यास बुझाई थी...

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हमारे अराध्य देव सदा हमें यही शिक्षा दिए हैं कि प्रेम अपने स्वधर्मी समुदाय से करना है और दुष्ट दलन भी अहिंसा का ही पर्याय है। एक ओर जहाँ हमारे देव देवी की सौम्य मूर्तियाँ हैं तो वहीं दूसरी ओर उनके आयुधों में सुसज्जित विग्रह हैं। एक ओर जहाँ वे प्रेम (प्यार इससे भिन्न होता है) की शिक्षा देते हैं तो वहीं दूसरी ओर सबल संग्रामी होने की शिक्षा देते हैं। नन्दी महाराज सदैव ही देवाधिदेव महादेव के समक्ष सौम्य मुद्रा में ही चिर प्रतिक्षा में बैठे होते हैं। परंतु एक यह एक दुर्लभतम विग्रह है जो संग्रामी मुद्रा में हैं। इस विग्रह में नन्दी महाराज षष्ठभुजी हैं। नन्दी महाराज के षष्ठ भुजाओं में भिन्न भिन्न आयुध सुसज्जित हैं। यहां नन्दी महाराज एक रक्षक के रूप में हैं। यह अद्भुत नन्दी विग्रह देगाँव में शिवालय में स्थापित हैं। सतारा से दक्षिण - पूर्व में पाटेश्वर है। पाटेश्वर के निकट ही देगाँव में पहाड़ी के किनारे यह महादेव मन्दिर स्थित है।(चित्र - साभार) देगाँव, सतारा जनपद, महाराष्ट्र। ॐ तत्पुरुषाय विद्महे नन्दिकेश्वराय धीमहि तन्नो वृषभः प्रचोदयात्।। अद्वतीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय नन्दी म...

सनातन धर्म और हम

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मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी और जनकसुता वैदेही माँ सीता के इस प्रतिमाओं को देखें... कितने अद्वितीय शिल्पकारी से इनके विग्रह, आभूषणों के सूक्ष्म से सूक्ष्म अवयवों को उकीर्ण किया गया है। क्या कोई शिल्पकार मात्र पारिश्रमिक की अभिलाषा में ऐसा निर्माण कार्य करेंगे। नहीं, ऐसे निर्माण कार्य के लिए आराध्य देव के लिए आस्था और समर्थन अत्यावश्यक तत्व हैं। धन्य हैं सनातनी पूर्वज जिन्होंने इन्हें निर्मित किये। यह अद्भुत मूर्तियाँ श्री रामास्वामी मन्दिर, तमिलनाडु में हैं। (चित्र - साभार) वैभवपूर्ण सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 माँ जानकी मैथिली सीता की जय 🙏🌺 प्रभु राजा रामचन्द्र जी की जय 🙏🚩 जय महाकाल 🙏🌺🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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सनातन वास्तुशिल्प कितना अकल्पनीय रहा है उसका एक दुर्लभ उदाहरण देखिए...!! इस मन्दिर में कोई एक "फीट" स्थान ढूँढिये जहाँ कोई कलाकृति नहीं बनी हो.... नहीं ढूंढ पाए...न..!! अब इसके निर्माण में लगे श्रम, समय और समर्पण की कल्पना कीजिए और रोमांच में खो जाइए.!! ये हैं "सास बहू मन्दिर", ग्वालियर, मध्यप्रदेश। (इसका वास्तविक नाम सहस्रबाहू होगा जो कालांतर में कदाचित सास बहू हो गया होगा।) अतुलनीय सनातन धरोहर...!! ॐ नमो नरायणाय 🚩 जय सनातन धर्म🙏🚩 जय श्रीमन्नारायण🙏🌺 जय महाकाल 🙏🌺🚩 #प्रेमझा

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वैदिक काल में हमारे सनातनी मनीषियों, ऋषियों को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, सौर-मंडल, पृथ्वी के घुर्णन गति, ग्रहों के परिभ्रमण पथ और समय का कितना विस्तृत ज्ञान था, इसका एक आदर्श उदाहरण देखिए..!! श्री विद्याशंकर मन्दिर, श्रीरंगम, चिकमंगलूर जनपद, कर्णाटक। (चित्र - साभार) इस मन्दिर के भीतर बारह स्तम्भ हैं। ये बारह स्तम्भ वर्ष के बारह हिन्दू माह का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रातः सूर्योदय के समय जो भी हिन्दू माह होता है उसी स्तम्भ पर सूर्य की पहली किरण पड़ती है।  यह निर्माण सहस्रों वर्ष पूर्व ही हमारे सनातनी पूर्वजों के हाथों हुआ है। क्या कोई वामी/कांगी समकालीन विश्व के किसी अन्य देशों में कोई ऐसा दुर्लभ निर्माण दिखा सकता है.?? परन्तु आर्यावर्त और सनातनी लोगों का दुर्भाग्य देखिए कि हमें एफिल टॉवर, मोनालिसा, पीसा का मीनार तो पढ़ाया जाता, बस ऐसे गौरवशाली शिल्पकला के विषय में आज भी हमें पढाया नहीं जाता है। धन्य धन्य हैं हमारे सनातनी पूर्वज जिन्होंने ऐसे अद्भुत मन्दिरों को बनाए.!! अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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आधुनिक विज्ञान की पुस्तकों में लिखा है कि... सौर परिवार खोज और अन्वेषण क्लॉडियस टॉलमी ने किया और बताया कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है और सभी ग्रह पिण्ड इसकी परिक्रमा करते हैं। परन्तु निकोलस कॉपरनिकस ने १५३० ई. में इस परिकल्पना को पुनर्परिभाषित कर बताया कि सूर्य ब्रह्माण्ड के केन्द्र में है और सभी ग्रह पिण्ड इसकी परिक्रमा करते हैं। पुनः इसने १५१६ ई. में सौर प्रणाली को बताया। १६०९ में केपलर ने ग्रहों के गति का नियम दिया जो आधुनिक विज्ञान का खोज माना जाता है। अब इससे सहस्रों वर्ष पूर्व आर्यावर्त भरतखण्ड की बात करते हैं.!!! छान्दोग्योपनिषद को देखते हैं...!! (इसकी रचना को आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है जबकि वास्तविकता में यह पन्द्रह सहस्र वर्ष पूर्व होना चाहिए.!) इसमें स्पष्ट रूप से वर्णित है कि..... अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवीदेता नास्त्मेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः। न वै तत्र न निम्लोच नोदियाय कदाचन देवास्तेनाहंसत्येन् मा विरधिषि ब्रह्मणेति। सूर्य का न तो उदय होता है न ही अस्त होता है। यह तो केंद्र है...छान्दोग्योपनिषद.(३.११.१,२).!! अर्थात् जब समस्त विश्व ने पढ़ना भी आरम्भ...

सनातन धर्म और हम

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आज यदि कोई पादुका (जूते-चप्पल) क्रय करने की सोचता है तो सर्व प्रथम उनको RED TAPE, RED CHIEF, WOODLANDS, LIBERTY इत्यादि कम्पनियों का ही विचार आता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इन कम्पनियों के उत्पाद नवोन्मेष में उत्कृष्टता लिए होते हैं। परन्तु, क्या हम कभी एक क्षण को यह सोचते हैं कि जिन्हें वे नवोन्मेषी कहते हैं और जिनके लिए वे "पेटेंट" ले लेते हैं उनमें से बहुतेरे उत्पाद "सनातनी कृति चौर्य" के द्वारा बनाए गए होते हैं। संलग्न चित्रों को ध्यान से देखें....!! (चित्र-साभार) ये मूर्तियाँ सहस्रों वर्ष पूर्व ही सनातनी मन्दिरों में बनाए गए हैं। और यदि ये पादुका मूर्तियों में निर्मित हैं तो उस काल के समाज में भी इसका उपयोग तो अवश्य ही रहा होगा। इन मूर्तियों के पादुकाओं में जो "DESIGN" हैं उसी की अनुकृति आज की आधुनिक कम्पनियाँ अपने उत्पाद के रूप में विपणन करते हैं और हमलोग उसी उत्पाद को "latest trend" मान कर प्रफुल्लित होकर क्रय करते हैं। जबकि इस जैसे उत्पाद सहस्रों वर्ष पूर्व ही सनातनी चर्मकारों ने निर्मित कर दिया था। अब यह कैसे मान लूँ कि "लुटेरे म...

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वामियों और मैकाले वायरस से संक्रमित कथित शिक्षाविदों की निर्लज्जतापूर्वक की गई धृष्ठता देखिए.... जिनके देश में प्रथम विद्यालय ही १८११ ई. में प्रारम्भ हुआ हो उसे औद्योगिक क्रांति का श्रेय दिया जाता है। और हमारे गौरवपूर्ण सनातन संस्कृति का यह आदर्श उदाहरण देखिए.... जब आधा विश्व वर्णमाला ही सीख रहा था उस समय से बहुत-बहुत पहले, सहस्रों वर्ष पूर्व ही हमारे सनातनी शिल्पकारों ने पहियों पर चलने वाले मन्दिरों और भवनों का सफलतापूर्वक निर्माण सम्पन्न कर चुके थे। अद्भुत कलाकृतियों से युक्त इस श्री वल्लुवर कोट्टम मन्दिर, चेन्नई, तमिलनाडु  को देखें.!! (चित्र-साभार) यह मन्दिर उस काल में बना है जब विश्व के अधिकांश लोगों को वास्तुशिल्प का "ककहरा" भी ज्ञात नहीं था। वामियों द्वारा लिखित कथित असत्य इतिहास को पढ़कर जिस हीनभावना और अपराधबोध से ग्रसित हो गए हैं, उसे त्यागने का यही उपयुक्त समय है। अपने सनातन संस्कृति परम्परा पर गर्व करें और पुनः वही कीर्ति पताका लहराने के लिए प्रयत्नशील होइए। गौरवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा