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Showing posts from March, 2025

सनातन धर्म और हम

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ये वादक संग वाद्ययंत्रों की प्रस्तर प्रतिमाएँ श्री भोग नन्दीश्वर मन्दिर में निर्मित हैं। ये प्रतिमाएँ अपने सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों के सम्प्रेषण में समर्थ हैं। यह शिल्पकार के उत्कृष्ट कला प्रवीणता को दर्शाता है। श्री भोग नंदीश्वर मन्दिर देवाधिदेव महेश्वर व माता पार्वती को समर्पित हैं। इस मन्दिर की मुख्य विशेषता वृहताकार नंदी की प्रतिमा है जो एक ही ग्रेनाइट शिला से निर्मित है। भक्ति और शिल्पकला का अद्भुत संगम हैं ये मूर्तियाँ। (चित्र - साभार) प्राचीन काल में सनातनी राजाओं ने अपने आराध्य देव/देवी के अतुलनीय देवालयों का निर्माण किया और इनके शिल्पकारों/वास्तुकारों के संरक्षण में सदैव सहायक की भूमिका निभाई। श्री भोग नंदीश्वर मन्दिर नंदी पहाड़ियों में स्थित हैं। नंदी पहाड़ियाँ, नंदी ग्राम, कर्नाटक। वैभवपूर्ण कलात्मक सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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यदि भारतवर्ष के विशालतम किला की चर्चा करें तो यह उनमें से एक महत्वपूर्ण किला है। स्यात यह एकमात्र किला है जिसको विधर्मी आक्रांताओं ने कभी भी क्षति पहुँचाने का दुस्साहस नहीं कर पाया। ये है राजपूताना गौरव "मेहरानगढ़ किला" जोधपुर, राजस्थान। यह महान राव जोधा राठौड़ के द्वारा १४५९ ई. में बनवाया गया था। इसके दीवारों की ऊँचाई १२०' फीट और मोटाई ७०' फीट है। इसे देखकर कभी रुडयार्ड किपलिंग इसे "THE WORK OF GIANTS" कहा था। (चित्र - साभार) मेहरानगढ़ का शाब्दिक अर्थ भी "सूर्य का किला" होता है। राठौड़ वंशजों के आराध्य "सूर्य देव" रहे हैं इसलिए इन्हें "सूर्यवंश" भी कहा जाता है। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय आदित्य सूर्यदेव 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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जिसे देखते ही दर्शक के पाँव ठहर जाए... जिसे देखते ही दर्शक के विचारों का प्रवाह रुक जाए... जिसे देखते ही दर्शक के नेत्र ठहर जाए... जिसे देखते ही दर्शक अचंभित हो जाए... जिसे देखते ही दर्शक का रोम रोम रोमांच से भर जाए... ऐसा सनातनी शिल्पकरों के ही कृति के साथ हो सकता है.!!! कितना जीवंत कलाकृति है ये.!!! जिन्होंने इसे निर्मित किए होंगे उनके हाथों के उत्कृष्ट शिल्पकला के विलक्षण योग्यता की कल्पना करें.!!! आप सोचकर ही पुलकित रोमांच का अनुभव करेंगे.!!! यह कलाकृति नर्मदा नदी के किनारे श्री महेश्वर शिव मन्दिर में निर्मित है। (चित्र - साभार) इस मूर्ति की कामनीयता, एक - एक कटाव एवं लोच, केश विन्यास, वस्त्र परिधान, आभूषणों का सौन्दर्य, अंग - अवयवों का संतुलन, भाव - भंगिमाओं का अद्भुत संप्रेषण, क्या किसी भी दर्शक को मंत्रमुग्ध करने में कोई कमी है.?? जिन्होंने इसकी परिकल्पना किए होंगे उनके कल्पनाशीलता का अनुमान लगाया जा सकता है क्या.?? सनातनी पूर्वजों के कला समर्पण के समक्ष कोई भी नत हो जाएगा। धन्य हैं सनातनी पूर्वज जिनके हाथों इसका निर्माण हुआ.!!! वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महा...

सनातन धर्म और हम

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एक अतुलनीय, अद्वितीय, सौन्दर्यपूर्ण चौमुख शिवलिङ्गम.!!!! मेवाड़ के महाराजाओं द्वारा निर्मित २५० स्मृति-स्थलों में से एक में स्थापित यह चौमुख शिवलिङ्गम मन्त्रमुग्ध करने वाले हैं। यहाँ ही छटा अद्भुत एवं निराली है। यह सम्मोहित करनेवाले स्मृति-स्थल ३५० वर्ष पूर्व उदयपुर में १९ महाराजाओं की स्मृति में बनवाया गया था। यह दर्शनीय चौमुख शिवलिङ्गम आहड़ (महासतियाँ), उदयपुर, राजस्थान में स्थापित हैं। इसके एक - एक ईंच में सनातनी शिल्पकारों के कला निपुणता,  दक्षता, प्रवीणता झलकता है। दर्शकों के मुँह से स्वत: ही धन्य धन्य धन्य निकल आया है। सौंदर्यपूर्ण सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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यह सर्वज्ञात कथा है कि दक्ष प्रजापति यज्ञ का आयोजन करते हैं और द्वेष से देवाधिदेव महादेव को निमंत्रण नहीं देते हैं। माता सती भगवान शिव के विचारों के विरुद्ध जाकर नन्दी महाराज पर सवार होकर यज्ञ स्थल पर आती हैं। वहाँ अपने पति का अपमान होता देख वे यज्ञकुण्ड में कूद कर प्राण त्याग देती हैं। रूद्र के अंश देव वीरभद्र यज्ञ विध्वंस कर दक्ष प्रजापति के सिर को काट लेते हैं। परम् पिता भोलेनाथ सती के वियोग में विह्वल हो उनके निष्प्राण देह को लेकर रूद्र ताण्डव करने लगे। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड त्राहिमाम करने लगा। सृष्टि के रक्षार्थ श्री हरि नारायण ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के निष्प्राण देह को काट कर खण्ड खण्ड कर दिया। जहाँ जहाँ देवी सती के खण्डित अङ्ग गिरे वहाँ पर शक्तिपीठ हैं। (कुल ५१ इक्यावन हैं)। ऐसी मान्यता है कि चंडिका स्थान पर माता सती का बायाँ नेत्र यहाँ गिरा था। एक अन्य कथा है कि अंगराज कर्ण अपने दान के लिए विख्यात रहे। वे मुद्गलपुरी वर्तमान समय में मुंगेर, बिहार में अपनी राजधानी बनाए थे। उनके राजमहल को कर्णचौरा के नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में उसी स्थान पर स्वामी सत्यानंद द्वारा ...

सनातन धर्म और हम

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यह श्री (नृत्य) गणपति जी की प्रतिमा अपने सौंदर्य से दर्शनार्थियों को आनन्दित करते हैं। जिन सनातनी शिल्पकारों ने इनका सृजन किया है उनके एकाग्रता की कल्पना करें..!! एक असन्तुलित आघात प्रतिमा के सम्पूर्ण सौंदर्य को नष्ट कर सकता था। परन्तु सनातनी पूर्वजों ने अपने कला निपुण हाथों से इस अद्वितीय प्रतिमा का सृजन कर विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर छोड़ गए हैं कि वे इन्हें देखें और सनातनी पाषाण शिल्पकला के सम्मान में नत हो जाएँ। (चित्र-साभार) यह अद्भुत विनायक गणेश जी की प्रतिमा बारहवीं शताब्दी का बना हुआ है। आज एक सहस्र वर्ष बीत जाने के पश्चात भी इनके सौंदर्य में कोई कमी नहीं है। ये प्रतिमा आज के आधुनिक शिल्पकार को चुनौती दे रहे हैं कि इनकी एक प्रतिलिपि तो बनाकर दिखाओ.!! यह दुर्लभतम प्रतिमा हलेबीदु, कर्नाटक में स्थापित है। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय विघ्नहर्ता विनायक जी🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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जिस भगवती माँ के अनुग्रह आशीर्वाद से "कलिया" का "कालिदास" में रूपांतरण हो गया.!!!! वही कालिदास संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान और कवि, साहित्यकार व नाटककार हुए। माँ भगवती, उच्चैठ, मधुबनी जनपद, बिहार। माँ भगवती का सिद्ध जागृत स्थल। भक्तों के मनोकामना पूर्ति के लिए सुविख्यात हैं। नवरात्र में देवी माँ दिव्य रूप धारण कर लेती हैं। दर्शनार्थी भक्तों की भीड़ पूजन और दर्शन प्राप्त करने हेतु लगी रहती है। अद्भुत दर्शनीय स्थल है। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय माँ महाकाली 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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भौतिकी के सभी नियमों को धता बताते हुए यह विशालकाय पाषाण गोला एक छोटे आधार पर टिका हुआ है। इसे "KRISHNA'S BUTTER BALL" (श्री कृष्ण के मक्खन का गोला) नाम दिया गया है। यह मामल्लपुरम, तमिलनाडु में स्थित हैं। २५० टन का विशालकाय पाषण खण्ड केवल ४ फीट के आधार पर और पूर्ण ढलान पर १२०० वर्षों से एक ही स्थान पर कैसे आज तक स्थित है.?? इसीलिए तो कहते हैं कि "मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्......!!!" वैज्ञानिक के लिए आज भी रहस्यमय है यह.!! अकल्पनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय सुदर्शन चक्रधारी🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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स्वयम्भू विराट शिवलिङ्गम..!!!! श्री राजसी महादेव, सिद्धेश्वर नाथ मन्दिर, अरुणाचल प्रदेश। दिव्य शिवलिङ्गम की ऊँचाई २५ फीट हैं। विराट नन्दी चिर प्रतिक्षित मुद्रा में शिवलिङ्गम की ओर मुख किए बैठे हैं। सघन वन में प्राकृतिक सौंदर्य के मध्य छिपा हुआ जीरो माइल से लगभग ४ कि.मी. दूर स्थित है यह पवित्र स्थान। अनुपम, दिव्य, मनोहारी दृश्य.!! महान सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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माँ श्यामा काली मन्दिर...!!! राजनगर, मधुबनी जनपद, बिहार। राजनगर मधुबनी से १४ कि. मी. दूर प्राकृतिक रूप से बहुत सौन्दर्यपूर्ण स्थल है। श्वेत संगमरमर से निर्मित राजनगर श्यामा मन्दिर एक अतुलनीय वैभवशाली मन्दिर है जो अपने वास्तुकला, कलाकृतियों, जालीदार झरोखों के कारण अद्भुत अनुपम है। यह मन्दिर तन्त्र साधना के लिए दिव्य स्थल रहा है। मन्दिर के बाहर धातु का एक विशाल घंटा लगा हुआ है जो दो खम्भों के मध्य लटका हुआ है। मन्दिर के पास ही राज प्रासाद के भग्नावशेष हैं। इस राज प्रासाद के द्वार पर बने दो विशाल हाथी बने हुए हैं जो आज भी जीवन्त प्रतीत होते हैं। ये अपने समय के वैभवशाली अतीत की गाथा कह रहे हैं। सबसे आश्चर्यजनक है कि इनके निर्माण में सीमेंट का उपयोग नहीं हुआ है। (चित्र - साभार) वैभवशाली सनातन विरासत...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय माँ भगवती महाकाली 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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वसन्त नवरात्र आरम्भ होने वाला है। इस बार वसन्तनवरात्रारम्भ व हिन्दुनववर्षारम्भ २०८२ तदनुसार ग्रिगेरियन कैलेंडर 30 मार्च, 2025 से होगा। नवरात्र चार होते हैं.... १. वासंती नवरात्र - चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से इसमें माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना होती है। २. ग्रीष्म नवरात्र - इसे गुप्त नवरात्रि भी कहा जाता है। यह आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होता है और इसमें दस महाविद्या साधना किया जाता है। ३. शारदीय नवरात्र - यह आश्विन शुक्ल प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होता है और नौ दुर्गा का आराधना करते हैं। ४. शिशिर नवरात्र - यह भी गुप्त नवरात्रि पर्व है। यह माघ शुक्ल प्रतिपदा तिथि से आरम्भ होता है और दस महाविद्या साधना किया जाता है। सनातनी पूर्वजों द्वारा देवी/देवों के अनेकानेक प्रतिमाएँ भिन्न भिन्न भाव भंगिमाओं में देवालयों, मन्दिरों, धार्मिक स्थलों आदि पर बड़े ही मनमोहक रूप में गढ़े गए हैं। माँ भगवती महिषासुरमर्दिनी की इस अनुपम प्रतिमा को ही देखें.! (चित्र – साभार) माँ अम्बे की यह षोडशभुजी प्रतिमा "रानी की बाव" पाटन, गुजरात में स्थित है। रानी की बाव गुजरात में पवित्र सरस्वती नदी के तट पर ग...

सनातन धर्म और हम

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वरदराज पेरुमल मन्दिर को जिस ओर से भी देखें एक अद्भुत रोमांच होता है। क्या हमारे पूर्वज किसी दिव्य शक्ति से परिपूर्ण थे जिससे उन्होंने एक ही पाषाण शिला से ऐसा नयनाभिरामी खम्भों को बनाए हैं?? याद रखें ग्रेनाइट सबसे कठोर पत्थर है। (MOH's scale - 8) मुख्यतः इस लटकते हुए कड़ी की शृंखला को बिना किसी जोड़ के कैसे निर्माण किये होंगे?? ऐसा कड़ी का माला सभी १०० खम्भों पर निर्मित है। जब इसे बनाना आज आधुनिक युग में असम्भव है तो पन्द्रहवीं शताब्दी में इसका निर्माण किस तकनीक से हुआ होगा?? आज के आधुनिक विज्ञान को भी यह सोचने को विवश कर देती है। वरदराज पेरुमल मन्दिर, काँचीपुरम, तमिलनाडु। (चित्र – साभार) अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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यह प्रतिमा अपने आप में अद्भुत, अनुठा और अद्वितीय है। इनमें एक ही अखण्ड पाषाण शिला से .... एक ही विग्रह में..... परमपिता महाकाल का शिवलिङ्गम, प्रभु श्रीनिवास स्वामी का प्रतिमा, प्रभु श्री रंगनाथ स्वामी का विग्रह, निर्मित किए हुए हैं। लोग अपने आस्था भक्ति के अनुरूप अपने आराध्य देव को प्रसन्न करने हेतु इनका पूजन अर्चना करते हैं। यहाँ पूजा अर्चना कर भक्त अपने प्रभु श्री का आशीर्वाद अनुग्रह प्राप्त कर धन धान्य समृद्धि संपदा आरोग्य से परिपूर्ण होते हैं। यह विग्रह बेथन्नापल्या, केन्गेरी, बंगलोर, कर्नाटक में स्थित है। अद्वितीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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इस मन्दिर को देखकर अपने पूर्वजों के शिल्पकला और स्थापत्य कला के ज्ञान पर सिर गर्व से उठ जाता है। इसे बनाने में लगे समय परिश्रम की कल्पना से ही एक रोमांचक अनुभूति होती है। इस मन्दिर में एक ईंच भी स्थान ऐसा नहीं है जहाँ शिल्पकारी नहीं किया गया हो। श्री उमामहेश्वर, श्री हरि विष्णु, माँ भगवती, आदि आदि अनेकों देवी, देवों को कितने मनमोहन रूप में गढ़ा गया है। गज, अश्व, नर्तकों, पहियों के शृंखला को जिस एकरूपता और सम्पूर्णता से उकीर्ण किया गया है उसकी कोई तुलना नहीं है। बेल बूटे से जिस प्रकार इसके सौन्दर्य को बढ़ाया गया है उसकी व्याख्या भी संभव नहीं है। कितना महान सनातन धरोहर है ये...!!! क्या वास्तव में भारतवर्ष में एक ही आश्चर्य "तेजोमहालय" ही है.??? यह लक्ष्मी-नरसिंह मन्दिर हरणहल्ली, कर्नाटक में स्थित है। (चित्र – साभार) इसकी सुंदरता को ध्यान से देख इसका आनन्द लें.! अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय माँ महालक्ष्मी🙏🌺 जय श्री हरि नारायण 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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जब पाषण भी हमारे सनातनी पूर्वजों के धर्मपरायणता, अपने आराध्य देव के प्रति अखण्ड समर्पण और अपने धर्म के प्रति निष्काम कर्म की दृढ़प्रतिज्ञता की महान गाथा आज भी दर्शकों को सुना रहे हों......... श्री पुष्पगिरी मन्दिर, आंध्रप्रदेश, आर्यावर्त। (चित्र - साभार) यह मन्दिर सातवीं शताब्दी का बना हुआ है। लगभग १५०० वर्षों के गौरवशाली अतीत के साथ आज भी ये प्राचीन मन्दिर अपने सनातनी निर्माणकर्ताओं के कुशल शिल्पकला के सौंदर्य की किरणें चहुँ ओर बिखेर रहे हैं। नमन है सनातनी पूर्वजों के कला, प्रवीणता और निपुणता को जो अपनी कृतियों के रूप में गर्व से मस्तक ऊँचा किए समग्र विश्व के समक्ष खड़े हैं। अद्वितीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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यह प्रचलित उक्ति है कि "अंधों के हाथ बटेर लग जाता है तो वह नाचने लगता है।" जिसे पाश्चात्य जगत "SEVEN wonders" या सात आश्चर्य/अजूबा कहता है न, वास्तव में वह संसार को छलने मात्र का एक कपोल कल्पित कथा है। यह कुछ - कुछ अंधों के हाथों बटेर जैसा ही है। जिस किसी भी गैंग ने इस सूची को बनाया है उसने आर्यावर्त भरतखण्ड को भ्रमण कर समग्रता से देखा ही नहीं है। यदि वो गैंग अ कलुषित हो स्वच्छ हृदय से इस भूमि पर एक बार विचरण कर लिया होता तो "wonders" के लिए उसे अन्य कहीं भटकना ही नहीं पड़ता। आर्यावर्त भरतखण्ड में तो पग - पग पर wonders ही बिखरे पड़े हैं। ये वो मोती है कि गिनने वाला थक जाएगा पर मोती नहीं चुकेगा। इस पवित्र भूमि पर सात नहीं, सात सहस्र नहीं, सात लाख नहीं, सात कोटि कोटि wonders आज भी विद्यमान हैं। ध्यान रहे ईसा पूर्व ५५० से ही इस पवित्र धरा पर विधर्मियों का आक्रमण होता रहा है और आक्रमणकारियों ने यहाँ के अतुलनीय सनातन वास्तुशिल्प के धरोहरों को ध्वस्त, नष्ट, करता रहा है। वर्तमान समय में भी जो धरोहर शेष बचे हैं वे अतुलनीय, अकल्पनीय हैं। उनमें से कुछ की संयुक्त छवि...

सनातन धर्म और हम

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यह प्राचीन, अप्रतिम, अनुपम शिवलिङ्गम अपने में आर्यावर्त का गौरवशाली इतिहास समेटे हुए हैं.!! यह मनोरम शिवलिङ्गम कुम्भलगढ़ किला, कुम्भलगढ़, राजस्थान में स्थापित है। (चित्र – साभार) इस शिवलिङ्गम की स्थापना का श्रेय महाराणा कुम्भा को जाता है। महाराणा कुम्भा राणा मोकल सिंह और सौभाग्य देवी (जैतमाल परमार की पुत्री) के पुत्र थे। महाराणा कुम्भा ४८वें राणा रहे और इनका शासन १४३३ से १४६८ ई. तक रहा। इन्होंने राज की बागडोर अपने पिता महाराज राणा मोकल सिंह से प्राप्त किया था। मेवाड़ के सिसोदिया साम्राज्य में राणा कुम्भा का अद्वितीय स्थान है। राणा कुम्भा ने कुम्भलगढ़ किला का निर्माण करवाया था। कुम्भलगढ़ किला ही वह स्थान है जहाँ महाराणा प्रताप सिंह सिसोदिया का जन्म हुआ था। इन्हें लोग महाराणा प्रताप या मेवाड़ी राणा के प्रचलित नामों से पुकारते हैं। महाराणा प्रताप का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया तिथि विक्रम संवत १५९७ तदनुसार ९ मई १५४० ई. को हुआ था। महाराणा प्रताप राणा उदय सिंह (द्वितीय) और जयवंती देवी के पुत्र थे। महाराणा प्रताप की अर्धांगिनी देवी अजबरे पुनवार भी दृढ़ इच्छाशक्ति की महिला थी। महाराणा प्रताप ने हल्दीघ...

सनातन धर्म और हम

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क्रूर, अत्याचारी विधर्मियों ने सनातनी मन्दिरों भवनों को सदा ही विनष्ट विखंडित किया। शासन में अत्याचार से अधिकार किया। यहां तक कि इतिहास को बदलने का यथासंभव कुचेष्टा किया। परन्तु क्या संसार से सनातन धर्म के चिह्न को कोई मिटा पाया.?? महान सनातन धर्म का अमिट छाप पग - पग पर मिलेगा। महान काकतीय वंश का राजधानी रहा है वारंगल। इसकी स्थापन ११६३ ई. में किया गया था। काकतीय वंश साम्राज्य के प्रथम नरेश रुद्रदेव प्रथम रहे हैं। इस साम्राज्य के सबसे शक्तिशाली शासक गणपतिदेव रहे जिन्होंने ६३ वर्षों तक शासन किया। काकतीय वंश साम्राज्य के अंतिम नरेश प्रतापरुद्र रहे। काकतीय वंश के शासकों ने पाषाण वास्तुशिल्प और शिल्पकला मूर्तिकला को संरक्षण दे कर अनेक मन्दिरों, तोरण द्वार, राजप्रासाद का निर्माण करवाए। परंतु रेगिस्तानी पशुओं को हीन भावना के कारण सनातन धर्म से जन्म प्रदत्त द्वेष/शत्रुता रहा। और १३०९ ई. में असभ्य विधर्मी अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति मलिक काफूर ने एक लाख की सेना ले इस साम्राज्य को तहस - नहस कर दिया। उस विधर्मी मलिक काफूर के सेना में जिस प्रकार हिनूओं के ही गद्दार था। आज उसी गद्दार के वंशज डीएनए ज...

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सनातनी शिल्पकारों के हाथों निर्मित अकल्पनीय "मास्टर-पीस"...!! आश्चर्यजनक है कि जिसकी प्रतिकृति को कागज पर भी उतारना असम्भव प्रतीत होता है उसे सनातनी पूर्वजों ने बिना किसी "कम्प्यूटर-ग्राफिक्स" के इतनी सटीकता से सहस्रों वर्ष पूर्व ही कैसे बनाए होंगे..!! (चित्र - साभार) ये शिल्प इस बात के प्रमाण हैं कि सनातन संस्कृति का दृढ़तापूर्वक अनुसरण करने से कितना अद्वितीय सृजन किया जा सकता है। यह वास्तुशिल्प इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सनातनी शिल्पकारों के निपुणता उत्कृष्टता कर्मठता व एकाग्रता की तुलना में कोई और सम्पूर्ण समकालीन विश्व में किसी भी पंथ मजहब में था ही नहीं। सनातन धर्मनिष्ठ/शास्त्रनिष्ठ होना ही सभी समस्याओं वर्तमान काल में भी निदान है। श्री चेन्नाकेशवा मन्दिर, बेलूर, कर्नाटक। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय श्रीमन्नारायण 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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विश्व के स्यात एकमात्र अद्वितीय "जीवित" शिवलिङ्गम जिनके आकर में प्रतिवर्ष १" ईंच की वृद्धि होती है, ऐसी मान्यता है। यह माप प्रति वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को मुख्य पुजारी जी के द्वारा किया जाता है। वर्तमान में इस विशाल शिवलिङ्गम की ऊँचाई ९' फुट है। यह शिवलिङ्गम मतङ्गेश्वर मन्दिर, खजुराहो, मध्यप्रदेश में हैं। ऐसी मान्यता है कि परमपिता परमेश्वर महादेव के अनुग्रह से "मार्कण्ड" मणि युधिष्ठिर को प्राप्त हुआ था। यह मार्कण्ड मणि युधिष्ठिर से मतङ्ग ऋषि को तथा उनसे हर्षवर्धन को प्राप्त हुआ। हर्षवर्धन ने इसे भूमि के अन्दर गाड़ दिया। परंतु इनका उचित देखभाल नहीं होने के कारण इनके आकर में वृद्धि होने लगा। ऐसा कहा जाता है कि यह शिवलिङ्गम कलियुग के द्योतक हैं। इनके शिखर स्वर्गलोक व आधार पाताललोक की ओर अग्रसर हैं। जिस दिन इनके आधार पाताललोक को स्पर्श करेंगे कलियुग का अंत हो जाएगा। ऐसा माना जाता है कि आज भी मार्कण्ड मणि इसके नीचे ही दबा हुआ है। मतङ्ग ऋषि के नाम पर ही इनका नाम मतङ्गेश्वर पड़ा है। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर आदिदेव महादेव और माँ पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ था। इ...

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प्रभु भोलेनाथ के शिवालय में शिवलिङ्गम के सामने से भगवान शिव के गण नन्दी ही अनुपस्थित रहें ऐसा कोई कल्पना कर सकते हैं क्या.?? सामान्य रूप में ऐसा सम्भव नहीं है। किन्तु आर्यावर्त में एक ऐसा शिव मन्दिर है जहाँ नन्दी महाराज अनुपस्थित हैं। और इसके पीछे एक अद्भुत पौराणिक कथा है। दक्ष प्रजापति के पुत्री का विवाह भगवान शिव के साथ सम्पन्न हुआ था। परन्तु जब भगवान शिव दक्ष प्रजापति के चरण स्पर्श नहीं किए तो दक्ष प्रजापति इसे अपना अपमान समझ बैठे थे। जब दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया तो सभी देवताओं, ऋषियों आदि को आमंत्रित किया परन्तु भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण पत्र नहीं भेजा गया। माता सती पति की अनिच्छा के विरुद्ध भी जाकर नन्दी महाराज पर सवार होकर अपने पिता के घर यज्ञ स्थल पर चली गईं। किन्तु वहाँ अपने पिता दक्ष प्रजापति और कुछ कुपात्र लोगों द्वारा अपने पति महादेव के अपमान को सहन नहीं कर पाईं। यज्ञ स्थल पर ही देवी सती ने योगाग्नि में आत्मदाह कर लिया। इसकी सूचना मिलने पर भगवान शिव सती वियोग में कुपित और विह्वल हो गए। रुद्र अंश से वीरभद्र उत्पन्न हुए और यज्ञ विध्वंस कर दक्ष प्रजापति के सिर...

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माँ पार्वती के इस तपश्चर्या मुद्रा में बने अद्भुत प्रतिमा को देखें.! इसमें उनके दाएँ पाँव पर ध्यान दें.! यह भगवान शिव की प्राप्ति हेतु अखण्ड दृढ़ता का द्योतक है। इसमें दाएँ पाँव का घुटने से मोड़ पीछे की ओर नहीं अपितु आगे की ओर है। इसमें सनातनी शिल्पकार ने अभीष्ट प्राप्ति हेतु अखण्ड समर्पण भाव और सर्वस्व न्योछावर को इस रूप में निरूपण किया है.! यह दृश्य अद्भुत अतुलनीय है.! महान सनातन धरोहर...!!! जय महामाया भवानी 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🌺🚩 #प्रेमझा

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ऐसा सौंदर्य और कहाँ......!! ओडिशा में माँ तारा-तारिणी शक्तिपीठ एक सुविख्यात दर्शनीय स्थल हैं। माँ तारा-तारिणी शक्तिपीठ पवित्र ऋषिकुल्य नदी के तट पर कुमारी पहाड़ियों पर पुरुषोत्तमपुर के निकट गंजाम जनपद, ओडिशा में एक अतिप्राचीन सुरम्य शक्तिपीठ हैं। (चित्र-साभार) माँ तारा-तारिणी को सम्पूर्ण दक्षिणी ओडिशा में इष्टदेवी का स्थान प्राप्त है। दक्षिणी ओडिशा में प्रत्येक घरों में माँ तारा-तारिणी की भक्तिभाव से आराधना की जाती है। द्रविड़ शैली में निर्मित मन्दिर समुच्चय लोगों को आकर्षित करते हैं और दर्शनार्थियों को अपने सौंदर्य से मन्त्रमुग्ध कर देते हैं। माँ तारा-तारिणी शक्तिपीठ बरहमपुर से ३० कि.मी. उत्तर में स्थित लोकप्रिय धार्मिक स्थल हैं। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय माँ तारा-तारिणी🙏🌺 जय महाकाल 🙏🌺🚩 #प्रेमझा

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सनातन वास्तुशिल्प कितना अद्भुत, अकल्पनीय और रहस्यमय रहा है इसका प्रमाण तो यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याप्त है। श्री नेल्लीअप्पयर मन्दिर, तिरुनेलवेली, तमिलनाडु के ४८ विलक्षण खम्भों में से प्रत्येक को एक अखण्ड पाषाण शिला से निर्मित किया गया है। (चित्र-साभार) सनातनी शिल्पकला कितना वैज्ञानिक था इसका जीवंत साक्ष्य यह खम्भे हैं। इन खम्बों निर्माण इस प्रकार किया गया है कि इनसे शास्त्रीय संगीत के सभी सात सुरों :- षड़ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद, का शुद्ध ध्वनि उत्पन्न होता है। ध्यान रखें, यह निर्माण १३०० वर्ष पूर्व किया गया है। गर्व करें कि वैदिक काल में जो भी हमारे सनातनी पूर्वजों ने बनाकर हमें सौंप गए हैं उनकी प्रतिकृति भी आज वर्तमान समय में आधुनिक विज्ञान से नहीं बनाया जा सकता है। अकल्पनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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महाराष्ट्र में पाँच प्रमुख नदियाँ "गायत्री, सावित्री, वेन्ना, कोयना और कृष्णा"...! इन पाँचों नदियों के सम्मिलित जल प्रवाह को एक ही स्रोत से जोड़कर प्रवाहित करवाने का अचंभित करने वाला कार्य सनातनी पूर्वजों ने सफलतापूर्वक संपन्न किए हैं। श्री पञ्चगंगा मन्दिर, महाबलेश्वर, सतारा, महाराष्ट्र में सुविख्यात मन्दिर है। इस सुविख्यात मन्दिर के निर्माण का श्रेय राजा सिंघनदेव (देवगिरी के यादव राजा) को जाता है। राजा सिंघनदेव ने इस मन्दिर का निर्माण तेरहवीं शताब्दी में करवाया था। इस मन्दिर का पुनर्निर्माण हिंदवी साम्राज्य के संस्थापक सनातनी हृदय सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज के द्वारा सोलहवीं शताब्दी में किए गए थे। मान्यता है कि इस मन्दिर में इस अद्भुत गोमुख से इस पाँचों सरिताओं का सम्मिलित जल एक ही धारा से निकलता है। कितना कष्टसाध्य और दुःसह रहा होगा इसका निर्माण.!! परन्तु इस असम्भव को भी सनातनी पूर्वजों ने सम्भव कर दिखाया.!! अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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दक्ष यज्ञ विध्वंस और माता सती के आत्मदाह करने के उपरांत परमपिता परमेश्वर शिव के द्वारा माता के निष्प्राण देह को अपने स्कंध पर उठा कर रुद्र तांडव से सृष्टि त्राहिमाम कर उठी। सृष्टि की रक्षा करने हेतु श्री हरि नारायण ने अपने सुदर्शन चक्र से उस निष्प्राण देह को खंड में विभाजित कर दिया। ये सभी खंड जहाँ - जहाँ गिरे वहाँ आज भी जागृत शक्ति - पीठ है। उसी निष्प्राण देह का एक खंड श्रीलंका में भी गिरा था। श्री मुन्नेश्वरम देवस्थानम, महा देवालयम, वरियापोला रोड, श्रीलंका। (चित्र - साभार) यह श्रीलंका के सबसे उन्नत और जागृत मन्दिर माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यह ५१ शक्तिपीठों में से एक हैं जहाँ माँ सती के कमर का अंश गिरा था। यहाँ के शिवलिङ्गम के साथ मेरु-यन्त्र संयुक्त हैं जो देवाधिदेव शिव व माँ शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। अद्भुत विश्व सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय माँ भवानी🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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दक्षिण का कैलाश (वल्लीअंगिरी पर्वत) समुद्रतल से १००० मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि जो इन पर्वतों पर चढ़कर भगवान शिव के दर्शन करते हैं उन्हें कैलाश मानसरोवर से समान तृप्ति, सन्तुष्टि, आंनद और पुण्य प्राप्त होता है। पुराणों में वर्णन है कि पराशक्ति का अवतार देवी कन्याकुमारी के रूप में देवाधिदेव महादेव की अर्धांगिनी बनने के लिए हुआ। माँ भगवती ने यह प्रतिज्ञा लिया कि एक निश्चित समय में प्रभात होने से पूर्व ही भगवान महादेव से उनका विवाह हो यदि ऐसा नहीं होता तो वे अपने काया को समाप्त कर लेंगी। यही प्रतिज्ञा कर उन्होंने तपस्या आरम्भ किया। परमपिता देवाधिदेव महादेव उनके तपस्या से प्रसन्न हो उनसे विवाह हेतु कैलाश से दक्षिण दिशा में प्रस्थान किए।  परंतु बहुत सारे लोग इस विवाह के विरुद्ध थे और विवाह रोकने के लिए व्यवधान करने लगे। इसी षड्यंत्र में छल से उन्होंने बहुत से कर्पूर जला कर प्रभात होने का भ्रम उत्पन्न कर दिया। इस भ्रम में कि वह पवित्र मुहूर्त व्यतीत हो गया, भगवान महादेव अत्यंत व्यथित हो वापस लौटने लगे। लौटने के क्रम में भगवान महादेव वल्लीअंगिरी पर्वत पर विश्राम ...