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Showing posts from May, 2025

सनातन धर्म और हम

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!!.सत्यम शिवम सुंदरम.!! ईश्वर सत्य है.!! सत्य ही शिव है.!! शिव ही सुंदर है.!! इस चित्र को ध्यानपूर्वक देखें और कल्पना करें कि इसके सृजनकर्ता भक्ति के किस परम् आनन्द की अवस्था में होंगे.!! इस सनातनी शिल्पकार के हृदय में अपने आराध्य देव के प्रति कितनी श्रद्धा और समर्पण रहा होगा जो इतना जीवन्त विग्रह निर्माण किए हैं। यह श्री भैरवनाथ का विग्रह श्री पञ्चलिङ्गेश्वर मन्दिर में स्थित हैं। मुनावल्ली, बेलगवी तालुका, कर्नाटक। यह भैरव विग्रह कल्याण चालुक्य वंश के शासनकाल १३वीं सदी का निर्माण माना जाता है। चालुक्य वंश साम्राज्य के संस्थापक पुलकेशिन थे जिन्होंने बादामी (वातापी) में अपनी राजधानी स्थपित किया था। वास्तव में चालुक्य की राजधानी एहोल (कर्नाटक) रही थी।  जिसे ५४३ ई. में पुलकेशिन प्रथम के द्वारा परिवर्तित कर बादामी कर दिया गया था। पुलकेशिन का पुत्र कीर्तिवर्धन था उसके कीर्ति पताका को आगे बढ़ाने में सहायक होता रहा। कर्नाटक के ऐहोल को द्रविड़ वास्तुकला का उद्गम कहा जाता है। यह चालुक्यों की पहली राजधानी थी और यहाँ उन्होंने छठी शताब्दी के पूर्व अनेक वैभवशाली मन्दिरों का निर्माण करवाया था। चा...

सनातन धर्म और हम

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सनातन संस्कृति के किसी भी शिला खण्ड को आप देखेंगे तो पाएँगे कि उस में निर्मित शिल्प पर एक सम्पूर्ण ग्रन्थ लिखा जा सकता है। यह शिल्प बादामी गुफा, बादामी जिला, बागलकोट, कर्नाटक में है। (चित्र - साभार) इस मूर्ति के अंगविन्यास, भाव भंगिमाएँ, आभूषणों और चित्र अलंकरणों को देखकर इसके निर्माण और निर्माण कार्य से पूर्व परिकल्पना और प्रबंध के बारे में अनुमान लगाएँ। आप इस अनुमान की कल्पना मातृ से मन्त्रमुग्ध और अचंभित होकर रह जाएंगे। शिल्पकार ने इतने आकर्षक रूप में कटाव और कमनीता की परिकल्पना कैसे किया होगा। ध्यान रखें उस समय ना कंप्यूटर था और ना ही ग्राफिक डिजाइनर। अनायास ही इसे देखने पर जीवित होने का भ्रम उत्पन्न होता है। इस मूर्ति में देवी एक हाथ से बालक के सिर को सहला कर वात्सल्य प्रकट कर रही है तो दूसरे हाथ से तोते को दाना चुगा रही है। कितना जीवन्त और भावपूर्ण है यह शिल्प। सनातनी शिल्पकार ने जिस निपुणता और सटीकता ने इसे निर्माण किया है कि देखकर मन पुलकित हो जाता है। नमन है उन सनातनी पूर्वजों को जिन्होंने इसे निर्मित किया है और यह सहस्रों वर्षों पश्चात भी अपने पूर्ण आकर्षण में शोभायमान है। अत...

सनातन धर्म और हम

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श्री कोपिणेश्वर मन्दिर में स्थापित वृहत शिवलिङ्गम है। इनका वास्त्विक नाम कौपीन पर आधारित कौपिनेश्वर रहा होगा जो कालांतर में कोपिणेश्वर हो गया है। इस शिवलिङ्गम की ऊंचाई ५' फीट और परिधि भी ५' फीट हैं। श्री कोपिणेश्वर मन्दिर भगवान शिव को समर्पित हैं। श्री कोपिणेश्वर शिवलिङ्गम महाराष्ट्र के ही नहीं आर्यावर्त  सबसे वृहद शिवलिङ्ग में से एक हैं। श्री कोपिणेश्वर महादेव ठाणे के संरक्षक देव हैं। मन्दिर का निर्माण शिलाहारा वंश के शासकों द्वारा करवाया गया था। मन्दिर में टूट फूट होने पर इसका जीर्णोद्धार एवं पुनर्निर्माण १७६० ई. में करवाया गया। आवश्यकता होने पर मन्दिर के गर्भगृह के समक्ष वृहत कक्ष को संग्रहित धन एवं दान एकत्र कर १८७९ में बनवाया गया। इस मन्दिर का सबसे तात्कालिक जीर्णोद्धार १९९६ ई. में किया गया है। मन्दिर में दो प्रवेश द्वार हैं - १. मसुंडा झील के सामने, २. जंभली नाका मंडी के अंदर। मन्दिर के प्रवेश द्वार पर नन्दी महाराज स्थपित हैं। मन्दिर परिसर में श्री ब्रह्मदेव, श्रीराम, श्री उत्तरेश्वर (काशी विश्वलिङ्गेश्वर), श्री दत्तात्रेय, माँ काली, माँ शीतला(थटकाई), श्री आञ्जनेय, गरूड़ ...

सनातन धर्म और हम

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इस चिर प्रतीक्षा में बैठे नन्दी महाराज के चित्र को zoom करके ध्यान से देखें.!! क्यों.!!! अचम्भित हो गए.?? चौंक गए.?? क्या इस नन्दी महाराज के गहने और आभूषणों में कोई त्रुटि दिखाई देती है.?? अब एक बार स्वयं कल्पना करें.... विचार करें... चिंतन करें.. कि क्या इतनी सूक्ष्म कलाकारी मात्र "छेनी-हथौड़ी" से सम्भव है (उस समय तक आधुनिक लेजर तकनीक उपलब्ध नहीं था).?? यदि इतनी सटीकता और सम्पूर्णता छेनी से बनाया जा सकता है तो आज इस जैसा निर्माण क्यों हो पा रहा है.?? इस नन्दी महाराज की सम्पूर्णता का अनुमान लगाने हेतु इसके मुखाकृति, नासिका छिद्र, खूर, पाँव के घुमाव पर ध्यान दें आप इसके जीवंतता से स्वयं प्रभावित हो जाएँगे। सत्य तो तो यह है कि वामपंथी इतिहासकारों ने षड़यंत्र और सनातनियों को हीन दिखाने के उद्देश्य से ही हमसे झूठ बोला। हमारी सनातन सभ्यता प्राचीन काल में वर्तमान समय से कहीं अधिक उन्नत थी। गर्व करें कि हमारे सनातनी पूर्वजों की थाती आज भी अपने गौरवगाथा को विश्व को सुनाने और दिखाने में सक्षम है। एक बात और.. यह नन्दी महाराज एक ही अखण्ड पाषाण शिला से निर्मित किया गया है। इसमें कोई जोड़ न...

सनातन धर्म और हम

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नाम/संज्ञा कभी कभी कितना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देश की राजधानी में खड़े होकर यदि आप किसी से पूछें कि "विष्णु स्तम्भ" कहाँ है तो स्यात १ प्रतिशत लोग भी नहीं बता पाए कि यह राजधानी क्षेत्र में है भी कि नहीं.!?! वास्तव में इन्द्रप्रस्थ के "विष्णु-स्तम्भ" को इसके वास्तविक नाम और रूप में रहने ही कहाँ दिया गया.! म्लेच्छों के अवैध अतिक्रमण के पश्चात तो इसे दिल्ली का कुतुबमीनार कहा जाने लगा। विचार करने की बात है कि जब गुलाम कुतुबुद्दीन मात्र चार वर्ष ही राज कर पाया तो उसने इस अद्भुत कृति का कैसे निर्माण करवा दिया.?? परन्तु यहाँ एक अन्य "विष्णु-स्तम्भ" की बात करते हैं.... इस विष्णु-स्तम्भ को "कीर्ति-स्तम्भ" के नाम से भी ख्याति प्राप्त है। राजपुताना शासकों में राणा कुम्भ सबसे पराक्रमी और शौर्यशाली राणा रहे हैं। राणा कुम्भा ने महमूद खिलजी को धरती पर नाक रगड़वा कर १४४८ में पराजित कर दिए थे। महमूद खिलजी पर अपने विजय को राणा कुम्भा ने भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित कर इस विजय के स्मृति में इस "कीर्ति-स्तम्भ" का निर्माण करवाये थे। यह कीर्ति-स्...

सनातन धर्म और हम

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आर्यावर्त के प्रत्येक पाषाण खण्ड में सनातन धर्म का गौरवान्वित शौर्यपूर्ण इतिहास लिखा हुआ है। इस इतिहास को पढ़ने वाले लोगों में जिज्ञासा, ललक और तत्परता अवश्य ही होना चाहिए। अन्यथा वे इसमें लिखे इतिहास के अर्थ को नहीं जान सकते हैं। भोग नन्दीश्वर मन्दिर का निर्माण नौवीं सदी में नन्दी पहाड़ों के तलहटी पर किया गया है। यह अद्वितीय मन्दिर आदिदेव भगवान शिव को समर्पित है। भोग नन्दीश्वर मन्दिर, चिक्कबल्लपुर, कर्नाटक में स्थित है। (चित्र - साभार) इस मन्दिर का निर्माण उस काल में हुआ है जब "किताबी" अस्तित्व में भी नहीं आया था। ध्यान से जूम करके देखें, जिन आकृतियों को कागज पर भी उकेरना असम्भव है उन्हें हमारे पूर्वजों ने पत्थरों पर त्रुटिरहित निर्माण किए हैं। वास्तव में विचार करें तो आधुनिक युग में लेजर तकनीकों से भी इसकी प्रतिलिपि बनाना कदाचित असम्भव ही होगा। और अब वर्तमान में "कटपीस" सनातनी मन्दिरों/देवालयों पर अनैतिक अवैध अतिक्रमण कर उस पर अपने नाम का "लेबल" चिपका कर अधिकार दिखाता है।  क्या आज हम उन सनातनी शिल्पकारों वास्तुकारों के निःस्वार्थ परिश्रम और पुरुषार्थ तथा ध...

सनातन धर्म और हम

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आर्यावर्त का राजसत्ता जब तक सनातन धर्म द्वारा निर्देशित किया जाता रहा तब तक सदा समृद्धि सम्पदा से देश परिपूर्ण रहा। विधर्मी म्लेच्छों ततपश्चात फिरंगी लुटेरों ने यहाँ के जनसमान्य के विचारों को दूषित कर धर्म विमुख कर दिया। परिणामस्वरूप समृद्धि शनैः - शनैः अवसान की ओर अग्रसर होता गया। आज तो राजसत्ता "सिकुलर गिरोह" के चंगुल में कराह रहा है और राजकीय क्रियाकलापों में "कट - पेस्ट shame-वि.धान" का ही बोलबाला है। गहरे तल पर चिंतन करने पर पाएँगे की उत्तरी क्षेत्र की अपेक्षा दक्षिणी क्षेत्र में मन्दिरों, धर्म स्थलों और धार्मिक अनुष्ठानों का संरक्षण पर्याप्त मात्रा में है। इसका कारण है कि असभ्य लुटेरों रेगिस्तानी पशुओं का विध्वंसक शक्ति उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में क्षीण हो गया था। शैव परम्परा उत्तर में कश्मीर और दक्षिणी क्षेत्रों में चोल साम्राज्य में महत्वपूर्ण भूमिका में रहा है। चोल साम्राज्य के राजराजा, राजेन्द्र प्रथम आदि ने भगवान शिव के मन्दिरों, मण्डपों आदि के निर्माण तथा वास्तु एवं शिल्पकला के संरक्षण में महती भूमिका निभाई है। विजयनगर साम्राज्य विश्व में अपनी समृद्धि के...

सनातन धर्म और हम

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आर्यावर्त के अधिकांश लोग इसके बारे में जानते भी नहीं होंगे क्योंकि यह कोई मकबरा नहीं, म.स्जिद नहीं या मुगलों का हड़पा/कब्जाया कोई महल या राजप्रासाद नहीं है। क्योंकि वामजीवियों (कथित इतिहासकार) और कांगियों ने तो इतिहास के पाठ्य पुस्तकों में केवल मकबरों, म.स्जिदों, चर्चों को ही महिमामण्डित करने का षड़यंत्र किया है। यह है श्री तिरुचेंदुर मुरुगन मन्दिर परीसर, तिरुचेंदुर, तमिलनाडु। (चित्र - साभार) भारतवर्ष के सबसे वृहत मन्दिर समुच्चयों में यह चतुर्थ स्थान रखता है। यह मन्दिर देवसेना के अधिपति, पर्वतीनन्दन, भगवान श्री सुब्रह्मण्यम कार्तिकेय स्वामी जी को समर्पित है। यह अपने सौंदर्य और वैभव के लिये प्रसिद्ध है। इसका अस्तित्व वैदिक काल से ही है। इसका उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। यह मन्दिर कुछ एक उन वैभवपूर्ण मन्दिरों में से है जो मुगलों-जेहादियों के खूनी पंजों से तो बच गया पर धूर्त वामपंथी इतिहासकारों और गुलाबो मंडली के खूनी खेल से न बच सका और  इन महान धरोहरों को पाठ्य पुस्तकों से दूर रखा और हम अनभिज्ञ बने रहे। इसके वैभवशाली निर्माण को देखकर सनातनी पूर्वजों के प्रति मस्तक श्रद्धा से ...

सनातन धर्म और हम

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यह अर्धनिर्मित मन्दिर अपने में एक इतिहास समेटे हैं। यह हैं देवाधिदेव महादेव को समर्पित श्री भोजेश्वर मन्दिर, भोजपुर गाँव, मध्यप्रदेश। इस मन्दिर के गर्भगृह में २.३ मीटर ऊँचा शिवलिङ्गम स्थापित हैं। इस मन्दिर का निमार्ण ग्यारहवीं सदी में सम्राट भोज द्वारा प्रारंभ करवाया गया था। उस समय यह शिवलिङ्गम आर्यावर्त के संभवतः सबसे बड़ा स्थापित शिवलिङ्गम था। निर्माण कार्य प्रारंभ होने के पश्चात विभिन्न प्रकार के विघ्न होने लगे। पुनः निर्माण प्रयास करने और पुनः विघ्न होने पर अन्ततः निर्माण कार्य रोक दिया गया। और इस प्रकार इस मन्दिर का शिखर कभी निर्मित नहीं हो पाया। इसे एक जागृत स्थल माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ समर्पित भाव से पूजन वंदन करने से अभीष्ट की प्राप्ति होती है। आज भी शिव भक्तों की भीड़ यहाँ दर्शन पूजन अर्चन वंदन हेतु लगा रहता है। विख्यात सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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कुलदेवी/कुलदेव का महत्व सनातन धर्म में अतुलनीय है। आस्था और श्रद्धा भक्ति का आरम्भ ही कुलदेवी/कुलदेव से होता है। कोई भी सनातनी परिवार अपने किसी भी मङ्गल कार्य का शुभारम्भ इनके पूजन अर्चन वंदन से ही आरम्भ करता है। ऐसी ही एक कुल - स्वामनी का यह अनुपम विग्रह है। कोंकण क्षेत्र में जोगेश्वरी जोगाई शक्ति स्थल स्थित है। जोगेश्वरी जोगाई शक्ति स्थल अम्बेजोगाई ग्राम में स्थित है। जोगेश्वरी जोगाई मन्दिर बालाघाट पहाड़ों के निकट, जयंती नदी के तट पर बना है। जोगेश्वरी जोगाई शक्ति स्थल अम्बेजोगाई ग्राम, बीड़ जनपद, महाराष्ट्र में है। ऐसी मान्यता है कि आदिशक्ति जोगेश्वरी माता इस क्षेत्र की "कुल-स्वामिनी" हैं। जोगेश्वरी देवी मन्दिर में आदिशक्ति माँ जोगेश्वरी का अद्भुत, मनोहारी, दिव्य विग्रह स्थापित है। (चित्र-साभार) इस क्षेत्र के लोगों में माता के प्रति अनन्य भक्ति भाव है। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय माँ जोगेश्वरी 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🌺🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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सनातनियों को कथित वामी लुगदी उपन्यासकार (मूढ़ इतिहासकार) ने कितना झूठ बोल और लिख कर भ्रमित एवं हीन भावना से ग्रसित किया है, एक उदाहरण प्रस्तुत है। ऑस्ट्रेलिया के पहला आधिकारिक खोज का श्रेय विलेम जैंसजून को ई. सन १६०६ में दिया जाता है। पहला फिरंगी जिसने आर्यावर्त के पवित्र भूमि पर अपना अपवित्र पांव रखा था वह पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा माना जाता है जो ८ जुलाई १४९७ में भारत की खोज में निकला था और वह २० मई १४९८ को केरल के कोझिकोड जनपद के कालीकट (काप्पड़ गाँव) पहुँचा था। अफ्रीका का खोज यूरोपीय नाविकों ने उन्नीसवीं सदी में किया था। अर्थात इन लुगदी उपन्यासकार इतिहासकारों के शब्दों में १४९८ व १६०६ तक आर्यावर्त भरतखण्ड का ऑस्ट्रेलिया/अफ्रीका से संपर्क का कोई दूर दूर तक संबंध नहीं था। अब इस चर्चा को यहीं रोककर संलग्न चित्र को ध्यान से देखें.!! (चित्र - साभार) क्या इस प्रस्तर मूर्ति में आपको "जिराफ" गढ़ा हुआ दिखाई देता है.?? ध्यान रखें जिराफ अफ्रीका/ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है और इसे किसी पाषाण शिला पर गढ़ने हेतु उस शिल्पकार को जिराफ को देखना और जानना अवश्य ही अनिवार्य है। अब इस मू...

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सनातनी पूर्वजों ने अपने सांस्कृतिक/सामाजिक जीवन के सभी घटनाओं को पाषाण शिला पर ही गढ़ कर इतिहास लेखन किया जो आज सम्पूर्ण आर्यावर्त में अनमोल बिखरे मोती के समान हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि उन इतिहास को हम कितना डिकोड कर पाते हैं, कितना पढ़ पाते हैं। यह जीवंत मूर्ति गुल्लिका अज्जी की है। यह गोमतेश्वर मन्दिर, श्रवणबेलगोला, कर्नाटक में स्थापित है। (चित्र - साभार) जैन अनुयाइयों के लिए गोमतेश्वर एक महत्त्वपूर्ण धर्मिक स्थल है। श्री बाहुबली को गोमतेश्वर भी कहा जाता है। श्री बाहुबली का निर्माण ९८१ ई. में गंगा मंत्री और सेनापति चामुंडराय ने करवाया था। श्री बाहुबली की ऊंचाई ५७' फीट है। गुल्लिका अज्जी की कथा कुछ इस प्रकार है। किंवदंती है कि श्री गोमतेश्वर का सेनापति चामुंडराय निर्माण कार्य संपन्न होने के पश्चात उनका अभिषेक करने का विचार किया। श्री गोमतेश्वर अभिषेक हेतु उसने पाँच पवित्र द्रव दुग्ध, कोमल नारियल जल, मधु, शर्करा, एवं पवित्र सरिता जल को सैकड़ों पात्रों में इकट्ठा किया। जब उसने अभिषेक आरम्भ किया तो आश्चर्यजनक रूप से द्रव पदार्थ मस्तक के नाभी तक ही आता था। नाभी से नीचे द्रव प...

सनातन धर्म और हम

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एक अनूठा अद्वितीय शिवलिङ्गम जिस में भगवान वामनपुरीश्वर और देवी अम्बुजाक्षी उकीर्ण हैं। जिस गोपनीयता से ये यहां निर्मित हैं उसी प्रकार श्रद्धालुओं को भी कुछ क्षणों के लिए ही इनका दर्शन उपलब्ध होता है और पुनः इन्हें आवरण से ढँक दिया जाता है। इनका निर्माण छठी सदी में चोल राजाओं द्वारा करवाया गया था। ये मन्दिर तिरुमणिकुझि, कुड्डालोर, तमिलनाडु में स्थित हैं। (चित्र –साभार) इसकी किंवदंती है कि श्री हरि नारायण विष्णु के अनन्य भक्त प्रह्लाद के पौत्र चक्रवर्ती बलि पूर्व जन्म में चूहा थे। एक बार दीपक से घृत खाने के समय दीपक की बाती अनजाने में ऊपर उठ गया। दीपक की बाती बुझने वाली थी परंतु वह ऊपर उठने के कारण पुनः जल उठी। इससे भगवान शिव प्रसन्न होकर उस चूहे को अगले जन्म में असुर योनि में जन्म लेने और श्री हरि विष्णु का अनुग्रह प्राप्ति का वरदान दिए। वही चूहा अगले बलि के रूप में जन्म लिया और श्री हरि विष्णु के अनुग्रह से चिरंजीवी व अमर हो गया। मान्यता है कि देवी अम्बुजाक्षी की आराधना से सन्तान प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण होती है। इस स्थान का नाम "तिरु (एक सम्मानजनक उपसर्ग) + मणि (श्रीविष्णु) + क...