सनातन धर्म
जब कोई सनातनी अपने कला के प्रति इतना समर्पित हो जाए कि बस उसे आराध्य देव ही दिखे और कुछ नहीं तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है और दुर्लभ भी सुलभप्राप्य हो जाता है। यही असम्भव को सम्भव बनाए हैं श्रीमान राजन "स्वामीमलै" ने उन्होंने १८ वर्ष के अथक परिश्रम से १९९६ में दुर्लभतम "अर्धनारीश्वर" की प्रतिमा को दो भिन्न धातुओं पीतल और ताम्बे से गढ़े हैं। इस अर्धनारीश्वर प्रतिमा में भगवान शिव को पीतल से और देवी शक्ति को ताम्बे से निर्मित हैं। यह सर्वज्ञात है कि पीतल के गलनांक ९१३℃ और ताम्बे का गलनांक १०८३℃ है। तो भी उन्होंने सत्रह असफल प्रयास के उपरांत अठारहवीं बार में अपने भागीरथ प्रयास में सफलता प्राप्त किए और सफलतापूर्वक द्विधात्विक प्रतिमा गढ़ कर अकल्पनीय कलाकृति प्रस्तुत किए। भगवान अर्धनारीश्वर की यह प्रतिमा छः फीट पाँच इन्च ऊँची और साढ़े तीन टन भार की है। (सभी चित्र-साभार) ऐसा विस्मयकारी निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा के आशीर्वाद से ही सम्भव हो सकता है। चित्र को zoom करके देखने पर यह पता चलता है कि उन्होंने कितना गहन चिंतन और शोध करके इस प्रतिमा के सूक्ष्म से सूक्ष्म अवयवों, आभूष...