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Showing posts from November, 2023

सनातन धर्म

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जब कोई सनातनी अपने कला के प्रति इतना समर्पित हो जाए कि बस उसे आराध्य देव ही दिखे और कुछ नहीं तो असम्भव भी सम्भव हो जाता है और दुर्लभ भी सुलभप्राप्य हो जाता है। यही असम्भव को सम्भव बनाए हैं श्रीमान राजन "स्वामीमलै" ने उन्होंने १८ वर्ष के अथक परिश्रम से १९९६ में दुर्लभतम "अर्धनारीश्वर" की प्रतिमा को दो भिन्न धातुओं पीतल और ताम्बे से गढ़े हैं। इस अर्धनारीश्वर प्रतिमा में भगवान शिव को पीतल से और देवी शक्ति को ताम्बे से निर्मित हैं। यह सर्वज्ञात है कि पीतल के गलनांक ९१३℃ और ताम्बे का गलनांक १०८३℃ है। तो भी उन्होंने सत्रह असफल प्रयास के उपरांत अठारहवीं बार में अपने भागीरथ प्रयास में सफलता प्राप्त किए और सफलतापूर्वक द्विधात्विक प्रतिमा गढ़ कर अकल्पनीय कलाकृति प्रस्तुत किए। भगवान अर्धनारीश्वर की यह प्रतिमा छः फीट पाँच इन्च ऊँची और साढ़े तीन टन भार की है। (सभी चित्र-साभार) ऐसा विस्मयकारी निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा के आशीर्वाद से ही सम्भव हो सकता है। चित्र को zoom करके देखने पर यह पता चलता है कि उन्होंने कितना गहन चिंतन और शोध करके इस प्रतिमा के सूक्ष्म से सूक्ष्म अवयवों, आभूष...

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आर्यावर्त में जिस ओर भी पग बढ़ाएँगे उस ओर सनातन संस्कृति के विस्मयकारी पाषाण शिल्प दृष्टिगोचर होते रहेंगे। इन पाषाण शिल्प का साक्षात्कार आपको एक पृथक लोक में विचरण कराते हैं। इनका दृश्यावलोकन आपके रोम रोम में दिव्य ऊर्जा का संचार करते हैं। ये आपको रोमांचित कर देते हैं। तीर्थंकर चन्द्रनाथ जी की एक अतुलनीय विशालकाय प्रतिमा मंदारगिरि पहाड़ी की चोटी पर तुमकुर, कर्नाटक में स्थित हैं। तीर्थंकर चन्द्रनाथ जी की प्रतिमा इक्कीस मीटर ऊँची हैं। इस पहाड़ी पर कलात्मक ४३५ पग सीढ़ी के बने हुए हैं।   पहाड़ी की चोटी पर चार भव्य मन्दिर बने हुए हैं। इन चार मन्दिरों में दो मन्दिर बारहवीं शताब्दी का तथा अन्य दो चौदहवीं शताब्दी का बना हुआ है। जैन मताबलम्बियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण और दर्शनीय स्थल है। वैभवपूर्ण सनातन धरोहर...!! जय जिनेन्द्र🙏🌺 जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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यह भक्ति की शक्ति ही है जो एक मानव का रूपांतरण महामानव में कर देता है। भक्ति में भक्त अपने को सम्पूर्ण समर्पित कर आराध्य देव को प्राप्त कर लेता है। यह भक्ति की शक्ति और आराध्य देव के प्रति समर्पण ही है जो उसके कार्य में भगवान के अनुग्रह से दिव्यता का सम्मिश्रण हो जाता है। ग्रेनाइट का MOHS SCALE में कठोरता ८ है जबकि सबसे कठोरतम हीरा का MOHS SCALE में कठोरता १० है। आज आधुनिक युग में लेजर उपकरण के द्वारा भी ग्रेनाइट पर शिल्पकला अत्यंत कठिन है। किन्तु सहस्रों वर्ष पूर्व सनातनी शिल्पकारों ने बिना आधुनिक तकनीक के इस नन्दी का निर्माण अपने हाथों से किया है। यह नन्दी महाराज, रामप्पा मन्दिर, वारंगल जनपद, तेलंगाना। यह नन्दी एक ही अखण्ड पाषण शिला ग्रेनाइट से बना है। इस नन्दी के प्रतिमा पर कहीं भी "छेनी-हथौड़ी" का कोई चिह्न दिखाई देता है क्या.?? ऐसी स्निग्धता सतह पर लाने में कितना श्रम, समय और निपुणता लगा होगा इसकी कल्पना करें.!!!! इनके ऊपर निर्मित आभूषणों की सूक्ष्मता में एक छोटी सी चूक सम्पूर्ण प्रतिमा को कुरूप कर सकता था। परन्तु उन सनातनी पूर्वजों के धर्म और कला के प्रति समर्पण और धैर्य...

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देवाधिदेव महादेव काल परिवर्तन से परे हैं इसलिए महाकाल हैं। भगवान शिव अपने हाथ में त्रिशूल धारण किए हुए हैं। त्रिशूल त्रिक का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह त्रिशूल हमें बताते हैं कि... चेतना की तीनों अवस्थाएँ "जाग्रत, स्वप्न व सुसुप्त" ब्रह्माण्ड के तीनों तत्व "सत, रज व तम" कुण्डलिनी की तीनों नाड़ियाँ "सुषुम्ना, पिंगला व इड़ा"  ये सभी परमपिता त्रिशूलधारी के वश में ही है। भूत वर्तमान और भविष्य सभी इनके ही नियंत्रण में है। त्रिशूल बताते हैं कि  ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी सात्विक, राजसिक व तामसिक है सभी भगवान शिव के ही नियंत्रण में हैं। त्रिशूल बताते हैं कि तीनों लोकों आकाश, भूलोक व पाताल का संचालन निष्पादन भगवान भोलेनाथ के द्वारा निर्धारित किया जाता है। त्रिशूल बताते हैं कि देव, मानव व दानव सभी उन दयानिधि भगवान नीलकण्ठ के अनुग्रह प्राप्ति के लिए ही सतत प्रयत्नशील रहते हैं। बाबा केदारनाथ धाम का दिव्य त्रिशूल, श्री केदारनाथ धाम मन्दिर, केदारनाथ धाम, उत्तराखंड। (चित्र-साभार) अद्भुत सनातन धरोहर...!! ॐ नमः परम् शिवाय 🚩 जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा ...

सनातन धर्म

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आधुनिक तकनीक.................नहीं. नहीं.!! आधुनिक शिक्षा.....................नहीं. नहीं.!! आधुनिक विज्ञान...................नहीं. नहीं.!! ग्राफिक्स..............................नहीं.नहीं.!! सॉफ्टवेयर...........................नहीं. नहीं.!! आधुनिक यन्त्र......................नहीं. नहीं.!! तो भी सहस्रों वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों ने कई फीट ऊँचे मन्दिरों के भीतरी छतों में अपने शिल्पकुशलता से दुर्लभतम शिल्प निर्माण किए जो आज के तथाकथित "मॉडर्न इंजीनियर्स" को लज्जित कर देने के लिए पर्याप्त है। क्या आज आधुनिक विज्ञान और तकनीकों का उपयोग कर के भी इसकी अनुकृति का निर्माण करना किसी से सम्भव है.???? सोचकर देखें.!! हम सांस्कृतिक और कलात्मक रूप से आदिकाल से ही समृद्ध रहे हैं। यह निर्माण देवशिल्पी विश्वकर्मा के अनुग्रह और आशीर्वाद के बिना सम्भव ही नहीं हो सकता है। ऐसा शिल्प निर्माण वही लोग कर सकते हैं जो गहरे हृदयतल पर भक्तिभाव से लबालब भरा हुआ हो.!! ओत-प्रोत हो.! ऐसे भक्तिभाव की प्राप्ति किसी व्यक्ति प्रदत्त पंथ में उत्पन्न ही नहीं होगा। इसके लिए प्रकृति प्रदत्त सनातन धर्म के शरण में आना ...

सनातन धर्म

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वामपंथी कितना अधम, कितना नीच, कितना घृणित होता है इसके लिए किसी को अब कोई प्रमाण की आवश्यकता ही नहीं होता है। यह तो पूर्व प्रमाणित सत्य है। किन्तु आर्यावर्त के वामियों की निकृष्टता तो "लज्जा को भी लज्जित" कर देता है। किसी भी राष्ट्र के निर्माण में यह अनिवार्य होता है कि वे अपने वर्तमान के अतीत से शिक्षा लेकर ही भविष्य के वर्तमान का निर्माण करें तो वे सदैव उन्नति के पथ पर चलायमान रहते हैं। दुर्भाग्यवश आर्यावर्त के कथित इतिहासकार वैश्विक वामपंथी षड्यंत्र में लिप्त होकर यहाँ के गौरवशाली इतिहास को ही मटियामेट कर दिया और यह भी प्रयास किया की लोग वास्तविक इतिहास से कभी परिचित नहीं हो पाए। परन्तु सत्य को कोई छुपा सकता है क्या.? सत्य को कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकता है। विश्व के सात आश्चर्य में अत्यंत ही विषम परिस्थिति में एक मात्र तेजोमहालय को स्थान मिला। जबकि आर्यावर्त में तो हर ओर आश्चर्य ही आश्चर्य बिखरा पड़ा है। संलग्न छाया चित्र मालादेवी जैन मन्दिर, ग्यारसपुर, विदिशा, मध्यप्रदेश के मार्ग में बने हिंडोला तोरण द्वार का है। चित्र को zoom करके देखें तो पाएँ...

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हिमाचल प्रदेश का अलौकिक प्राकृतिक वातावरण सबों के मन मोह लेता है.!!! चहुँ ओर प्रकृति का दिव्य सौंदर्य और सुमधुर रागिनियों से निरंतर साक्षात्कार होता रहता है। ऐसी मान्यता है कि पौराणिक समय में परमपिता देवाधिदेव महादेव भ्रमण करते हुए कुछ समय के लिए इसी हिमाचल प्रदेश के जटोली में आकर निवास किए थे। कालान्तर में सिद्ध स्वामी कृष्णानन्द परमहँस ने जटोली में आकर यहीं तपश्चर्या किए। स्वामी कृष्णानन्द परमहँस की प्रेरणा व मार्गदर्शन पर यहाँ एक मन्दिर निर्माण का निर्णय लिया गया। मन्दिर निर्माण के आरम्भ होने और इसे सम्पूर्णता प्राप्त करने में उनचालीस वर्ष का समय लग गया। मन्दिर को जैसा स्वामी कृष्णानन्द परमहँस जी का दिशा-निर्देश था, इसे द्रविड़ स्थापत्य शैली में बनाया गया है। श्री शिव मन्दिर, जटोली, सोलन, हिमाचल प्रदेश, द्रविड़ वस्तुशिल्प का अतुलनीय उदाहरण है। इस मन्दिर के पत्थरों को थपथपाने पर उससे डमरू सदृश्य ध्वनि उत्पन्न होती है। इस मन्दिर की ऊँचाई १११ फीट है। सम्भवतः यह एशिया का सबसे ऊँचा शिव मन्दिर है। यह मन्दिर शिव भक्तों व दर्शनार्थियों के मध्य अतिलोकप्रिय है। शैव साधक भक्त यहाँ आकर प्रभु महाद...

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अभी श्री राम जन्मभूमि अयोध्या में श्री राम जन्मस्थल पर मन्दिर का पुनर्निर्माण किया जा रहा है। इस मन्दिर का श्रेय लेने वाले सत्ताजीवियों में होड़ मची है कि कौन सबसे बड़ा भक्त है (कथित)। इसके आगे चर्चा को विराम देकर आर्यावर्त से सुदूर समुद्र पार के देश थाईलैंड चलते हैं.! वैसे तो थाईलैंड बौद्ध बाहुल्य देश है। पर क्या आप जानते हैं कि थाईलैंड का राष्ट्रीय ग्रंथ रामायण है.?? रामायण का अध्ययन वहां के विद्यालय में पाठ्यक्रम में समहित है। वहां के सभी विद्यार्थियों को रामायण का अध्ययन अनिवार्य है। वहां रामायण को "RAMAKEIN" के नाम से अंगीकृत किया गया है। वास्तव में Ramakein में तीन ग्रंथों के निचोड़ को संयुक्त रूप से संकलित किया गया है। ये ग्रंथ हैं १. श्री वाल्मीकि रामायण, २. श्री विष्णु पुराण और ३. श्री हनुमान नाटक। अब आप स्वयं सोचिए कि आर्यावर्त से २५८७ कि.मी. दूर देश में रामायण पाठ्यक्रम में समहित है और इसका अध्ययन वहां के विद्यार्थियों को अनिवार्य है। परन्तु इस भूमि का दुर्भाग्य देखिए कि जो प्रभु श्री राम जी की जन्मभूमि है वहां सत्ताजीवी इसे कभी पाठ्यक्रम में समहित नहीं कर पाए, हाँ...

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शनैः-शनैः ही सही, सनातनियों को यह भान होने लगा है कि फिरंगी अंग्रेजों ने आर्यावर्त से हमारा मात्र धन ही नहीं लूटा अपितु हमारे सनातनी पूर्वजों के विज्ञान व वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धतियों के प्राचीन आदि-ग्रन्थों को चुराकर, छीनकर और जिस भी प्रकार से हो सकता था, अपने देश ले गया। उन्होंने हमारी भाषाएँ सीखी और हमारे ग्रन्थों का अंग्रेजी, फ्रांसीसी, डच, आदि में अनुवाद करके हमारे ही ऋषि मुनियों के प्रयोगों, सिद्धांतों व आविष्कारों को अपना बताकर उन्हें "अपना-अविष्कार" का नाम दिया। जबकि सत्य ये है कि जिन जिन चीजों, पद्धतियों, धारणाओं, व्यवस्थाओं, विज्ञान, भौतिक, बौद्धिकता, खगोलीय, ज्योतिष शास्त्र, चिकित्सीय सन्दर्भो में अंग्रेजों ने अविष्कार करके अपने नाम पेटेंट करवाये, वो सब के सब सहस्रों, लाखों वर्ष पूर्व हमारे सनातनी पूर्वजों, ऋषियों, मुनियों, मनीषियों ने आविष्कृत व निर्माण कर व्यवस्था में ले लिए थे। उन्होंने उनका नामकरण भी कर दिया था। फिरंगी अंग्रेजों ने केवल अंग्रेजी भाषा में उन उपलब्धियों को पुनर्नामकरण किया और उन कृति-चौर्य का पेटेंट अपने नाम करवाया। आइए जानें, हमारे सनातनी पुर्वज...

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सम्पूर्ण विश्व में श्री मारुतिनन्दन महावीर स्वामी जी को अखण्ड ब्रह्मचारी के रूप में ही पूजा जाता है। विश्व भर के मन्दिरों में श्री आञ्जनेय हनुमानजी की एकल प्रतिमाएँ ही स्थापित हैं। किन्तु क्या आप जानते हैं कि श्री हनुमान जी विवाहित ब्रह्मचारी हैं.??? आश्चर्य हुआ न...!!! आईए श्री हनुमान जी के इस पाणिग्रहण कथा को जानते हैं.!!!! इसका सम्पूर्ण वर्णन "पराशर संहिता" में उल्लिखित है। श्री हनुमान जी ने अपने गुरू के रूप में श्री सूर्यदेव को वरण कर उनके शरण में विद्याध्ययन के लिए गए थे। श्री हनुमान जी ने अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का प्रण ले लिया था। अब, श्री सूर्यदेव तो सतत चलायमान हैं तो श्री हनुमानजी जी उनके संग चलते हुए ही शिक्षा ग्रहण करने लगे। शिक्षा ग्रहण करते हुए नौ विद्याओं में पाँच विद्याओं को श्री हनुमान जी ने पूर्णता से ग्रहण कर पारंगत हो गए। अन्य चार विद्याओं के प्राप्ति के लिए विवाहित होना आवश्यक था। अब धर्म संकट दोनों के ही समक्ष उत्पन्न हो गया क्योंकि प्रण के अनुसार श्री हनुमान जी विवाह नहीं करेंगे और श्री सूर्यदेव विद्या दान के अनुशासन को तोड़ नहीं सकते। श्री सूर्यदेव धर्मसं...

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Era परिवर्तन क्या और कैसे होता है इसका एक उदाहरण लेते हैं.! Pre 2014 और Post 2014 के era का निष्पक्ष विश्लेषण करें.! आईए इसे भिन्न दृष्टिकोण से देखते हैं... २०१४ से पूर्व सोशल मीडिया भी था आर्यावर्त के अनेकानेक सनातनी और देशप्रेमी भी थे किन्तु उनकी अभिव्यक्ति उतनी स्वतंत्र रूप से प्रस्फुटित नहीं हो पाती थी क्योंकि ji-हादी समर्थक विषकन्या द्वारा संचालित व्यवस्था था और एक अनकहा प्रतिबंध व्याप्त था। अब इस भव्य वैभवशाली धरोहर को देखें.. ऐसा नहीं है कि इसका निर्माण २०१४ के पश्चात हुआ है, परन्तु यह अधिकांश देशवासियों के लिए अल्पज्ञात ही था। इसके बारे में लोगों को जानकारी का आभाव इसलिए था क्योंकि व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मात्र ताजमहल और कुतुबमीनार ही था या फिर अजमेर वाले मुर्दे का कब्र। कांगी और वामी अपने सनातन से घृणा के कारण हमें स्वर्णिम सनातनी इतिहास तक नहीं पढ़ाया गया। सौ एकड़ के विस्तृत क्षेत्र में निर्मित यह मन्दिर आर्यावर्त ही नहीं स्यात विश्व का सबसे भव्यतापूर्ण मन्दिर है। यह पन्द्रह टन स्वर्ण से निर्मित श्री महालक्ष्मी मन्दिर, वेल्लोर, तमिलनाडु में स्थित है। (चित्र-साभार) इस मन्दिर ...

सनातन धर्म सनातन धर्म और हम 🚩

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पन्द्रह टन.... अर्थात १५०००  किलो ग्राम शुद्ध सोने से बना है यह महालक्ष्मी मंदिर ...!!! परन्तु.... वामियों /लिब्रांडों/लहड़ू गैंग के लिए भारत का इतिहास रेगिस्तानी पशुओं से आरम्भ होकर उस पर ही समाप्त हो जाता है ..! यही कारण है कि.... वामपंथी सेकुलर पिल्लों ने कभी आपको ऐसे मन्दिरों के बारे में नहीं बताया...! क्योंकि...  उन अधम के लिए तो सम्पूर्ण भारत में बस एक ही सुन्दर मकबरा है.... मुमताज का मकबरा - ताजमहल.! परन्तु.... आपके सूचनार्थ बता दूँ कि.... तमिलनाडु के वेल्लोर नगर के मलाईकोड़ी पहाड़ों पर स्थित श्री महालक्ष्मी मन्दिर १५ टन (१५००० किलो ग्राम ) शुद्ध सोने से बना है। यह भव्य मन्दिर सौ एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला है और इस श्री महालक्ष्मी मन्दिर में हर एक कलाकृति हाथों से बनाई गई है। यह सम्पूर्ण विश्व का एकलौता ऐसा मन्दिर है जिसमें इतने सोने का प्रयोग हुआ है। अमृतसर के गोल्डन टेम्पल में भी सिर्फ ७५० किलो की सोने की ही छतरी लगी हुई है। इस मन्दिर को भक्तों के दर्शन पूजन हेतु २००७ में खोला गया था। और रात के समय यहाँ दर्शन हेतु भक्तों की संख्या अधिक रहती है। क्योंकि रात में इस स...

सनातन धर्म

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ये सभी संलग्न चित्र मात्र भवन/मन्दिर/राजप्रासाद/मठ नहीं हैं अपितु हमारे सनातनी पूर्वजों द्वारा पाषाण शिला पर लिखा हुआ इतिहास है जिसे वामियों/लहड़ू गैंग ने हमारे ही पाठ्य पुस्तकों से विलुप्त कर दिया। (सभी चित्र - साभार) इसमें दोष जितना उनका है उतना ही सनातनियों का भी है। जब हम ही अपने वास्तविक शौर्य पराक्रम वाले "नायक" के यशोगाण को भुला कर छद्म (kripto) नायकों का गुणगान करने लगे। आज पुष्यमित्र शुंग कितने को याद है.? जबकि अशोक बच्चे बच्चे को पता है। आज महर्षि दाधीच के त्याग को कितने लोग जानते हैं.? जबकि किसी छद्म NGO के CEO को त्याग की प्रतिमूर्ति प्रचारित किया जाता है। जिन लोगों को हम चुन कर देश का भाग्य विधाता बना दिया वे भी अपने स्वार्थ में आर्यावर्त को हरिश्चन्द्र, शिवि, रघु, ऋषभदेव,  विक्रमादित्य, राम, कृष्ण आदि का नहीं कह कर गांदी/बूध का कह कर देश विदेश में घूमता रहता है। कभी आपने सोचा है कि हमारे पुस्तकों में जितने सम्राटों समुद्रगुप्त/ चद्रगुप्त प्रथम/ चंद्रगुप्त मौर्य/ बिम्बिसार/ जरासंध आदि आदि और इन जैसे ही असंख्य के राज्य और राजकाज दोनों ही के बारे में विस्तार से वर्...

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सनातनी सदा से ही यह कहते और मानते हुए आए हैं कि... आदि से अंत तक... अंत से अनंत तक... सभी चराचर "शिव" से ही है, शिव ही है। क्योंकि कंकड़ - कंकड़ में "शङ्कर" ही व्यक्त हो रहे हैं। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शिव में ही समहित है। परमपिता देवाधिदेव महादेव सभी मानव काया में स्वयं को ही व्यक्त किए हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मानव देह में व्यक्त है। बस आवश्यकता है कि हम उसे अपने भीतर ध्यान/समाधि में उतर कर अनुभव करें..देखें।  पूरी स्पष्टता से वह ब्रह्माण्ड भीतर दिखाई देगा। आदि काल में सनातनी मनीषियों ने कहा/बताया है। योगसूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने इस विधा को अनुपम रूप में वर्णित किया है। सतयुग में यह भीतर की यात्रा का अनुसंधान अपने चरम बिंदु पर था। और सनातनी पूर्ण चैतन्य ब्रह्माण्ड से एकाकार होकर आनंद में जीवन जीते थे। तभी तो आशीर्वाद फलित और श्राप घटित होता था। कलयुग में हम भीतर की यात्रा से विमुख होकर बाहर - बाहर ही भागे जा रहे हैं। इसी लिए हमारे हाथ रिक्त ही हैं। एक बार बाहर को समग्रता से जानने हेतु भीतर की यात्रा पर चलें तो आज भी उस परम् संपदा को प्राप्त कर सकते हैं। मानव देह...

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आर्यावर्त का दुर्भाग्य देखिए कि इस पर सर्वप्रथम "रेगिस्तानी पशुओं" ने आक्रमण किया जो विध्वंस और दुष्कर्म का पर्याय था। सनातनी कृतियों का विध्वंस और सनातनी नारियों का शीलहरण व हत्या ही इन जंगली पशुओं का मुख्य कार्य था। इसके पश्चात फिरंगी भेड़िये का आक्रमण हुआ जो पाशविकता में रेगिस्तानी खच्चरों के जैसा ही था किन्तु इसका ध्यान विध्वंस से अधिक कृति-चौर्य की ओर रहा था। आर्यावर्त में खगोलीय कौशल विकास किस उच्चतम स्तर पर था इसका प्रमाण यह  "खगोलीय-वेधयन्त्र" है जो खगोलीय माप में प्रयुक्त होने वाला यन्त्र है।(चित्र-साभार) वर्तमान में यह यन्त्र जेनेवा संग्रहालय के संरक्षित है। यह खगोलीय वेधयन्त्र चौदहवीं शताब्दी का माना जाता है। इस खगोलीय वेधयन्त्र पर संस्कृत भाषा में बारह राशियों में नाम स्पष्ट रूप से उकीर्ण हैं। फिरंगियों के लूट के अतिरिक्त और किसी साधन से यह जेनेवा नहीं पहुँचा हो सकता है। क्योंकि कोहिनूर हीरे से लेकर अनेकों दुर्लभतम मूर्तियों और अद्वितीय वस्तुओं को फिरंगियों ने चुराकर इस देश से ले गए। यह ASTROLABE (फिरंगी ने यही नाम दिया है) विश्व के समक्ष प्रस्तुत सनातनी ...

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सम्पूर्ण ब्रह्मांड का "सृष्टि, पालन व संहार" जब परमपिता देवाधिदेव महादेव पर ही निर्भर करता है तो जहाँ भी जल-थल-नभ में हाथ डालेंगे उन महेश्वर को ही पाएँगे। यह अतिदुर्लभ भगवान शिव का "पँचक्रिया" विग्रह सहस्रों वर्ष प्राचीन हैं। (चित्र-साभार) इस विग्रह में भगवान महेश्वर के पाँच मुख पाँच क्रियाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं :- १. उत्पत्ति. २. स्थिति. ३. संहार. ४. तिरोधान. ५. अनुग्रह. इस अतुलनीय विग्रह की प्राप्ति भी आश्चर्यजनक ही है। कटनी, मध्यप्रदेश में सेतु निर्माण के लिए नींव की खुदाई की जा रही थी। भूतल से चालीस फीट अन्दर खुदाई कर्ताओं को अनेक प्राचीन पाषाण मूर्तियों की प्राप्ति हुई। (चित्र - साभार) उन्हीं मूर्तियों में एक यह अतुलनीय पँचक्रिया विग्रह हैं। सहस्रों वर्ष भूगर्भ में दबे हुए रहने के पश्चात भी इस विग्रह की दिव्य कान्ति से आप सम्मोहित होने से स्वयं को नहीं रोक पाएँगे। इस विग्रह के जटा, आभूषण, मुखमण्डल, भ्रू, कुंडल आदि के शिल्प शैली पर ध्यान दें.!! किस अद्भुत निपुणता और प्रवीणता से सनातनी पूर्वजों ने इसे निर्मित किया है कि इतने युगों पश्चात भी विग्रह दर्शनकर्ता...

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सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सृजन और संहार यह दो क्रियाएँ अनवरत चलते रहते हैं। जो कुछ भी सजग, सचेत, प्रकृति से तारतम्य मिला कर नहीं चलता है उसका विनाश तय हो जाता है। जीव को जीवन में प्रकृति से तारतम्य मिला कर चलने में, सजग, सचेत रखने में उसका धर्म ही सहायक होता है। धर्म ही वह संबल प्रदान करता है, वह प्रकाश प्रदान करता है जिसके आलोक में जीव सुख समृद्धि ऐश्वर्य प्राप्त करते हुए अपने आराध्य देव से एकाकार होने के पथ पर उत्तरोत्तर अग्रसर होता है। धर्म ही जीव को व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक क्षेत्र में एक लयबद्ध संगीत से जोड़ कर उन्नति के मार्ग प्रशस्त कर आगे ले जाता है। जहाँ धर्म की हानि हो जाती है वहाँ जनजीवन व धर्म स्थलों का पराभव अवश्यम्भावी है। इस मन्दिर के अद्भुत वास्तुशिल्प को देखें.!! कभी यहाँ भी भक्तों के भीड़ से वातावरण गूँजायमान रहता होगा, किन्तु सनातन धर्म की समाप्ति के साथ ही निस्तब्धता व्याप्त हो गई है। यह श्री गोविन्द हिन्दू मन्दिर, पुथिया, बांग्लादेश में है। जब देश ही सनातन धर्म से वंचित है तो मन्दिरों को कौन सँवारेगा.??? अतः धर्म की रक्षा ही परम् कर्तव्य है... धर्म को समग्रता से ...

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अनन्त, अविनाशी, सर्वशक्तिमान भगवान शिव तो सर्वत्र व्याप्त हैं...!! प्राकृतिक सौंदर्य के मध्य, दिव्य शान्ति का प्रसाद भक्तों को बाँटते "शिवन ध्यान केन्द्र"....!! निश्छल प्रेम की सरिता अनवरत रूप से प्रवाहित किए हैं.!! सघन वन में स्थापित अलौकिक शिवलिङ्ग, मलेशिया में स्थित है..!! भक्त यहाँ भगवान शिव के सानिध्य में, निर्दोष प्रकृति के गोद में स्वर्गीय अनुभूति की प्राप्ति करते हैं..!!! अनुपम विश्व सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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कश्मीर ऋग्वेद में वर्णित सप्तर्षियों में से एक महर्षि कश्यप की भूमि रही है.!!! अनन्तनाग श्रीमन्नारायण के आसन, नागों के राजा शेषनाग की भूमि रही है.!!! बारामुला का वास्तविक नाम "वाराह-मुल" जो भगवान श्री हरि विष्णु के वाराह अवतार के कारण पड़ा, सनातन धर्म/संस्कृति की भूमि रही है.!!! कश्मीर जगतगुरु आदि शङ्कराचार्य की कर्मभूमि रहा है.!!! कश्मीर सदैव सनातनियों की भूमि रही है.!!! इतिहास में भी यह भूमि कभी भी म्लेच्छों की नहीं रही जब तक कि चौदहवीं शताब्दी में "रेगिस्तानी पशुओं" ने आक्रमण कर सनातनियों की वीभत्स रूप से रक्तपात कर अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर लिया और निरंतर अपने जनसंख्या को बढ़ाया.!!! कश्मीर सदा से ही आर्यों की भूमि आर्यावर्त का शिखर रहा है.!!! ॐ नमः परम् शिवाय 🚩 जय बाबा अमरनाथ🙏🌺 (चित्र-साभार) जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा