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Showing posts from March, 2023

सनातन धर्म

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परमपिता भगवान शिव के सुंदरेश्वर रूप की अर्धांगिनी माँ मिनाक्षी अम्माँ हैं। माँ मिनाक्षी अम्माँ को श्री हरि नारायण का अनुजा माना जाता है। इस प्रतिमा में माँ मिनाक्षी अम्माँ अपने दुर्लभतम, अद्वितीय, दिव्य रूप में हैं। (चित्र-साभार) यह प्रतिमा मीनाक्षी मन्दिर के पुडुमण्डपम, मदुरै, तमिलनाडु में हैं। जैसा कि सदैव ही होता रहा है, यह प्रतिमा भी म्लेच्छों के हीनभावना, शत्रुता और द्वेष का भेंट चढ़ कर खंडित हो गया है। सनातनी शिल्पकारों के कला निपुणता का यह जीवंत प्रमाण है। कला की उत्कृष्टता अनुमान इस प्रतिमा के मुकुट, आभूषणों और वस्त्रों को देखकर सहज हो जाता है। प्रतिमा के ठेहुना को ध्यान से देखें, वस्त्र के साथ अस्थि और मांसपेशियों के सूक्ष्मता को कितने सजीवता से दर्शाया गया है। मुखमण्डल पर मातृत्व और वत्सलता स्पष्ट रूप में परिलक्षित होता है। गर्व है अपने सनातनी पूर्वजों पर जिन्होंने इस जीवंत प्रतिमा का निर्माण किए। सर्व मङ्गल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥ ॐ सर्वसम्मोहिन्यै विद्महे विश्वजनन्यै च धीमहि तन्नो शक्तिः प्रचोदयात॥ अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सना...

सनातन धर्म

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शिल्पकला और वास्तुकला जहाँ अपने श्रेष्ठता को प्राप्त करते हैं....!!!! जिनके दीवारों पर वैदिक सनातन धर्म की महागाथा पत्थरों पर अंकित हैं...!!! उसी अकल्पनीय, अतुलनीय मन्दिर को श्री मीनाक्षी अम्मान मन्दिर कहा जाता है। श्री मिनाक्षी अम्मान मन्दिर, मदुरई, तमिलनाडु। अरुलमिगु मीनाक्षी सुंदरेश्वर मन्दिर  सनातन धर्म का एक ऐतिहासिक महत्व का मन्दिर है जो वैगई नदी के दक्षिणी तट पर स्थित है। यह मन्दिर थिरुकामकोट्टम उदय आलूदैया नचियार "देवी मीनाक्षी" को समर्पित है। देवी मीनाक्षी पार्वती जी के ही एक रूप हैं जिनका पाणिग्रहण देव सुंदरेश्वर भगवान शिव के रूप से हुआ है। तमिल संगम साहित्य (छठी शताब्दी) में वर्णित है कि मीनाक्षी मन्दिर मदुरई नगर के केंद्र में स्थित है। तमिल शिव नारायण (छठी - नौवीं शताब्दी) के सूक्तों वर्णित 'पादल पत्र स्थलम' के २७५ शिव मन्दिरों के समूह का, मीनाक्षी मन्दिर भी उनमें से एक मन्दिर है। मीनाक्षी मन्दिर में त्रेतायुग (मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम युग) द्वापरयुग (लीलाधारी श्री कृष्ण युग) और कलियुग (श्री कल्कि अवतार) के धार्मिक, सामाजिक जीवन के गाथाओं को मूर्तियों मे...

सनातन धर्म

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शास्त्र केवल शब्दों में नहीं मन्दिरों में भी गढ़े पड़े है। सनातन धर्म को मिटाने की इच्छा रखने वालों वामजीवियों को यह जान लेना चाहिए कि हमारा अस्तित्व मिटा पाना तुम्हारे लिए संभव नहीं है। तुमने इतिहास में अपने स्वार्थ अनुकूल परिवर्तन कर दिए, तब भी हमारा इतिहास और भविष्य इन मन्दिरों में गढ़ा पड़ा है। यह श्री मीनाक्षी अम्माँ मन्दिर है। (चित्र - साभार) माना जाता है की यहाँ माता पार्वती जी और परम् पिता महादेव का विवाह सम्पन्न हुआ था। यह मंदिर स्वयं देवराज इंद्र ने बनवाया था, और इसके निर्माणकर्ता स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा रहे हैं। इस मन्दिर में अब कुछ विशिष्ट बातें देखिये --  त्रेता युग के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी का चित्रण किया गया है। उसी में आप गदाधारी आञ्जनेय हनुमानजी की मूर्ति देखें। वे वानररूप में नहीं अपितु मानव रूप में हैं। प्रभु श्रीराम जी की धोती का रंग भी पीला है, पीला रंग सूर्य का प्रतीक है। श्रीराम सूर्यवंशी थे।🌞 द्वापर के दूसरे अवतार लीलाधर श्रीकृष्ण हैं। लीलाधर श्रीकृष्ण के मस्तक पर चन्द्रमा विराजमान है, जो उनके चन्द्रवंशी अवतार होने के कारण है।🌙 परंतु श्रीकृष्ण ...

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जिसे देखते ही दर्शक के पांव ठहर जाए... जिसे देखते ही दर्शक के विचारों का प्रवाह रुक जाए... जिसे देखते ही दर्शक के नेत्र ठहर जाए... जिसे देखते ही दर्शक अचंभित हो जाए... जिसे देखते ही दर्शक का रोम रोम रोमांच से भर जाए... ऐसा सनतनी शिल्पकरों के ही कृति के साथ हो सकता है.!!! कितना जीवंत कलाकृति है ये.!!! जिन्होंने इसे निर्मित किए होंगे उनके हाथों के उत्कृष्ट शिल्पकला के विलक्षण योग्यता की कल्पना करें.!!! आप सोचकर ही पुलकित रोमांच का अनुभव करेंगे.!!! यह कलाकृति नर्मदा नदी के किनारे श्री महेश्वर शिव मंदिर में निर्मित है। (चित्र - साभार) इस मूर्ति की कामनीयता, एक - एक कटाव एवं लोच, केश विन्यास, वस्त्र परिधान, आभूषणों का सौन्दर्य, अंग - अवयवों का संतुलन, भाव - भंगिमाओं का अद्भुत संप्रेषण, क्या किसी भी दर्शक को मंत्रमुग्ध करने में कोई कमी है.?? जिन्होंने इसकी परिकल्पना किए होंगे उनके कल्पनाशीलता का अनुमान लगाया जा सकता है क्या.?? सनातनी पूर्वजों के कला समर्पण के समक्ष कोई भी नत हो जाएगा। धन्य हैं सनातनी पूर्वज जिनके हाथों इसका निर्माण हुआ.!!! वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाका...

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यदि भारतवर्ष के विशालतम किला की चर्चा करें तो यह उनमें से एक महत्वपूर्ण किला है। स्यात यह एकमात्र किला है जिसको विधर्मी आक्रांताओं ने कभी भी क्षति पहुंचाने का दुस्साहस नहीं कर पाया। ये है राजपूताना गौरव "मेहरानगढ़ किला" जोधपुर, राजस्थान। यह महान राव जोधा राठौड़ के द्वारा १४५९ ई. में बनवाया गया था। इसके दीवारों की ऊँचाई १२०' फीट और मोटाई ७०' फीट है। इसे देखकर कभी रुडयार्ड किपलिंग इसे "THE WORK OF GIANTS" कहा था। (चित्र - साभार) मेहरानगढ़ का शाब्दिक अर्थ भी "सूर्य का किला" होता है। राठौड़ वंशजों के आराध्य "सूर्य देव" रहे हैं इसलिए इन्हें "सूर्यवंश" भी कहा जाता है। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय आदित्य सूर्यदेव 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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ये वादक संग वाद्ययंत्रों की प्रस्तर प्रतिमाएँ श्री भोग नन्दीश्वर मंदिर में निर्मित हैं। ये प्रतिमाएँ अपने सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों में सम्प्रेषण में समर्थ हैं। यह शिल्पकार के उत्कृष्ट कला प्रवीणता को दर्शाता है। श्री भोग नंदीश्वर मन्दिर देवाधिदेव महेश्वर व माता पार्वती को समर्पित हैं। इस मन्दिर की मुख्य विशेषता वृहताकार नंदी की प्रतिमा है जो एक ही ग्रेनाइट शिला से निर्मित है। भक्ति और शिल्पकला का अद्भुत संगम हैं ये मूर्तियां। (चित्र - साभार) प्राचीन काल में सनातनी राजाओं ने अपने आराध्य देव/देवी के अतुलनीय देवालयों का निर्माण किया और इनके शिल्पकारों/वास्तुकारों के संरक्षण में सदैव सहायक की भूमिका निभाई। श्री भोग नंदीश्वर मन्दिर नंदी पहाड़ियों में स्थित हैं। नंदी पहाड़ियाँ, नंदी ग्राम, कर्नाटक। वैभवपूर्ण कलात्मक सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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देवाधिदेव महादेव के अंश के रूप में अष्ट भैरव की आराधना प्रचलित है। ये अष्ट भैरव पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्र, और आत्मा के प्रतिनिधित्व करते हैं। ये अष्ट भैरव हैं :- १. असितांग भैरव (वाहन - हंस) २. रुद्र भैरव (वाहन - वृषभ) ३. चंद्र भैरव (वाहन - मोर) ४. क्रोध भैरव (वाहन - बाज) ५. उन्मत्त भैरव (वाहन - अश्व) ६. कपाल भैरव ( वाहन - गज) ७. भीषण भैरव (वाहन - शार्दूल) ८. संहार भैरव (वाहन - स्वान) ॐ नमो भैरवाय नमः 🙏🌺 जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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यह दिव्य पवित्र आम का वृक्ष एकम्बरेश्वर शिव मंदिर में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि यह ३५०० वर्षों से भी अधिक प्राचीन है। इस वृक्ष में एक अद्वितीय विशिष्टता है। इस वृक्ष के चार शाखाएँ चारों वेद ऋगवेद, सामवेद, यजुर्वेद, व अथर्ववेद के प्रतिनिधित्व करते हैं, ऐसी मान्यता है। इस मान्यता के प्रमाण भी इसी वृक्ष में अवस्थित है। आश्चर्यजनक रूप से इस चारों शाखाओं के फल के स्वाद भिन्न भिन्न होते हैं। (चित्र - साभार) इनके फल के स्वाद के इस भिन्नता का क्या रहस्य है.?? यह भिन्नता क्यों.! इसका उत्तर आधुनिक विश्व में किसी के पास नहीं है। अकल्पनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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श्रीपुरम मन्दिर के भव्यता को जानकर मन विपुल आह्लाद से पुलकित हो जाता है। यह वैभवशाली भव्य मन्दिर १५००० कि. ग्रा. शुद्ध सोने से बना है "श्रीपुरम" मन्दिर। १०० एकड़ से अधिक क्षेत्र में विस्तारित यह मन्दिर चारों ओर से हरियाली से आच्छादित है। हरियाली के मध्य निर्मित यह मन्दिर "पंद्रह हजार किलो" शुद्ध सोने से बना है। मान्यता है कि यह मन्दिर माता लक्ष्मी का निवास स्थल है। ऊपर से वायवीय अवलोकन करते हैं तो यह मन्दिर एक षट्कोणीय आकृति (STAR) में दृश्य होते हैं। (चित्र - साभार) श्रीपुरम मंदिर, वेल्लोर, तमिलनाडु। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय माँ महालक्ष्मी 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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एक अतुलनीय, अद्वितीय, सौन्दर्यपूर्ण चौमुख शिवलिङ्गम.!!!! मेवाड़ के महाराजाओं द्वारा निर्मित २५० स्मृति-स्थलों में से एक में स्थापित यह चौमुख शिवलिङ्गम मन्त्रमुग्ध करने वाले हैं। यहाँ ही छटा अद्भुत एवं निराली है। यह सम्मोहित करनेवाले स्मृति-स्थल ३५० वर्ष पूर्व उदयपुर में १९ महाराजाओं की स्मृति में बनवाया गया था। यह दर्शनीय चौमुख शिवलिङ्गम आहड़ (महासतियाँ), उदयपुर, राजस्थान में स्थापित हैं। इसके एक - एक ईंच में सनातनी शिल्पकारों के कला निपुणता,  दक्षता, प्रवीणता झलकता है। दर्शकों के मुंह से स्वत: ही धन्य धन्य धन्य निकल आया है। सौंदर्यपूर्ण सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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यह कथा सर्वज्ञात है कि दक्ष प्रजापति यज्ञ का आयोजन करते हैं और द्वेष से देवाधिदेव महादेव को निमंत्रण नहीं देते हैं। माता सती भगवान शिव के विचारों के विरुद्ध जाकर नन्दी महाराज पर सवार होकर यज्ञ स्थल पर आती हैं। वहां अपने पति का अपमान होता देख कर यज्ञकुण्ड में कूद कर प्राण त्याग देती हैं। रूद्र के अंश देव वीरभद्र यज्ञ विध्वंस कर दक्ष प्रजापति के सिर को काट लेते हैं। परम् पिता भोलेनाथ सती के वियोग में विह्वल हो उनके निष्प्राण देह को लेकर रूद्र तांडव करने लगे। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड त्राहिमाम करने लगा। सृष्टि के रक्षार्थ श्री हरि नारायण ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के निष्प्राण देह को काट कर खंड खंड कर दिया। जहां जहां देवी सती ने अंग गिरे वहां पर शक्तिपीठ हैं। ऐसी मान्यता है कि माता सती का बायां नेत्र यहां गिरा था। एक अन्य कथा है कि अंगराज कर्ण अपने दान के लिए विख्यात रहे। वे मुद्गलपुरी वर्तमान समय में मुंगेर, बिहार में अपनी राजधानी बनाए थे। उनके राजमहल को कर्णचौरा के नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में उसी स्थान पर स्वामी सत्यानंद द्वारा स्थपित इंटरनेशनल योग सेंटर है। ऐसी मान्यता है कि ...

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यह श्री (नृत्य) गणपति जी की प्रतिमा अपने सौंदर्य से दर्शनार्थियों को आनन्दित करते हैं। जिन सनातनी शिल्पकारों ने इनका सृजन किया है उनके एकाग्रता की कल्पना करें..!! एक असन्तुलित आघात प्रतिमा के सम्पूर्ण सौंदर्य को नष्ट कर सकता था। परन्तु सनातनी पूर्वजों ने अपने कला निपुण हाथों से इस अद्वितीय प्रतिमा का सृजन कर विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर छोड़ गए हैं कि वे इन्हें देखें और सनातनी पाषाण शिल्पकला के सम्मान में नत हो जाएँ।(चित्र-साभार) यह अद्भुत विनायक गणेश जी की प्रतिमा बारहवीं शताब्दी का बना हुआ है। आज एक सहस्र वर्ष बीत जाने के पश्चात भी इनके सौंदर्य में कोई कमी नहीं है। ये प्रतिमा आज के आधुनिक शिल्पकार को चुनौती दे रहे हैं कि इनकी एक प्रतिलिपि तो बनाकर दिखाओ.!! यह दुर्लभतम प्रतिमा हलेबीदु, कर्नाटक में स्थापित है। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय विघ्नहर्ता विनायक जी🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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जिस प्रकार का सनातनी जन जागरण आरम्भ हुआ है अब इसे एक धार्मिक नेतृत्व की परम आवश्यकता है। क्योंकि धर्म पथ पर आगे बढ़ने के लिए सिकुलर राजनीतिक नेतृत्व प्रभावी नहीं हो सकता है। हमारे मठ के मठाधीशों को तीन विषयों पर केंद्रित होना सनातन धर्म के भविष्य के लिए शुभ होगा। क्योंकि सनातनी बचेंगे तभी तो ये भी रहेंगे। १. इन्हें अस्पताल, अनाथालय, वृद्धाश्रम आदि को छोड़ एक मात्र निःशुल्क शिक्षा पर केंद्रित होना चाहिए। क्योंकि शिक्षा और अनुसंधान यह दो ही महत्वपूर्ण अवयव रहे हैं जिनके कारण आर्यावर्त विश्व का सिरमौर रहा था। इस शिक्षा का उद्देश्य संस्कारित, विद्यावान, सबल, संग्रामी सनातनी निर्माण का होना चाहिए ना कि "मॉडर्न सिकुलर मनी मेकिंग मशीन" बनाने की। २. धर्म ग्रँथों का निःशुल्क वितरण जनता के मध्य करना चाहिए।  इसमें प्रारम्भ श्री हनुमानचालीसा और श्रीमद्भगवद्गीता से करें।  एक बार जिन्हें धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने में रस मिलने लगता है फिर वे स्वतः अन्य धर्म ग्रँथों को स्वमेव रुचि से अध्ययन करेंगे। यह उसी प्रकार है जैसे किसी बालक को एक बार मिठाई का स्वाद देना। इन पर आरम्भ में अधिक धन व्यय की आव...

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कितना नयनाभिरामी और अद्भुत दृश्य है..!! चहुँ ओर शिवलिङ्गम ही दृश्यमान हैं.!! (चित्र-साभार) यह कर्नाटक के शिवकाशी नदी का मनोहारी दृश्य है जो जल स्तर घटने पर दिखाई देते हैं। चहुँ ओर जो लाखों की संख्या में शिवलिङ्गम दृष्टिगोचर हो रहे हैं इनका अभिप्राय क्या है.??? इन्हें निर्माण करने वाले कौन से सनातनी पूर्वज रहे थे और इन्हें इतने विस्तृत क्षेत्र में क्यों बना कर छोड़ गए हैं.?? इन शिवलिङ्गम के निर्माण का प्रयोजन क्या रहा होगा.??? कितना श्रमसाध्य रहा होगा हमारे पूर्वजों के लिए इन्हें निर्मित करना.??? परन्तु शैव परम्परा में शिव भक्ति में आनंदविभोर हो इनका निर्माण कर उन्होंने इन समृद्ध सनातन धरोहरों हमारे मंथन के निमित्त ही छोड़ गए हैं.!! सहस्रों वर्ष प्राचीन यह निर्माण किसी विशिष्ट सनातनी समूह द्वारा अवश्य ही किसी महत्वपूर्ण उद्देश्य हेतु ही किया गया होगा.!! यह रहस्य तो आज तक अनावृत नहीं हो पाया है.!! इस विस्तृत क्षेत्र में शिवलिङ्गम के अतिरिक्त नंदी जी, आञ्जनेय महावीर जी, श्री गणपति जी आदि भी निर्मित हैं। अद्वितीय अकल्पनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा ...

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बिहार में ऐतिहासिक धरोहर को पर्यटन के पर्याप्त विज्ञापन नहीं मिलने से कुछ प्राचीन विरासत जनसामान्य के लिए अल्प ज्ञात हैं। माँ काली का वैभवशाली मन्दिर राजनगर, मधुबनी जनपद, बिहार में है। इस मन्दिर में तन्त्र साधना के सर्वोच्च रूप अर्थात माँ काली भगवान शिव के हृदय पर स्मित मुस्कान के साथ स्थापित हैं। (चित्र-साभार) किंवदंती है कि महान तांत्रिक महाराजा रामेश्वर सिंह अपने तन्त्र साधना के पूर्णाहुति के उपरांत माँ काली की इसी स्थान पर स्थापना किए थे। यहाँ उन्होंने सम्पूर्ण मन्दिर श्वेत संगमरमर से निर्मित करवाये हैं। इसकी सूक्ष्म कलाकृति मनमोहक है। मन्दिर के पास ही एक विशाल घंटा लगा हुआ है। इस मन्दिर के अतिरिक्त भी अनेक मन्दिर और राजप्रासाद का निर्माण उस काल में करवाया गया था जो प्रक्रिया १९२६ ई. तक चलता रहा। दरभंगा नरेश महाराजा लक्ष्मणेश्वर सिंह के देहावसान के पश्चात महाराजा रामेश्वर सिंह राजनगर को छोड़ दरभंगा प्रस्थान कर गए। निर्माण प्रक्रिया सम्पूर्ण होते ही दुर्भाग्यवश १९३४ का प्रलयंकारी भूकंप आया। बिहार में इस भूकंप का सबसे अधिक प्रभाव दरभंगा में ही था। इसप्रकार यह सौन्दर्यपूर्ण निर्माण भूक...

सनातन धर्म

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एक ऐसा विरल अप्रतिम मन्दिर जहाँ देवाधिदेव महादेव के ग्यारह शिवलिङ्गम एक ही वेदी पर स्थापित हैं। श्री एकादश रुद्र महादेव मन्दिर.!!! यह मन्दिर मंगरौनी गाँव, राजनगर प्रखंड, मधुबनी जनपद, बिहार में स्थित हैं। यह मन्दिर सम्पूर्ण मधुबनी निवासियों के लिए महत्वपूर्ण मन्दिर हैं। इस मन्दिर में लगभग आठ फीट लंबाई और पाँच फीट चौड़ाई में बनी वेदी पर ही सभी एकादश शिवलिङ्गम स्थापित हैं। भक्तों की ऐसी आस्था है कि इन एकादश रुद्र महादेव के पूजन अर्चन से उन्हें गयारह गुणा अधिक फल की प्राप्ति होती है। इस प्रकार का यह अपने आप में अनूठा शिवालय है। श्रावण मास में यहाँ काँवड़ यात्रा की भी प्रथा रही है। भक्त काँवड़िये अखण्ड आस्था से काँवड़ यात्रा कर शिवलिङ्ग का  जलाभिषेक करते हैं और प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। अद्भुत सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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माँ श्यामा काली मन्दिर🙏🚩 राजनगर, मधुबनी जनपद, बिहार। राजनगर मधुबनी से १४ की.मी. दूर प्राकृतिक रूप से बहुत सौन्दर्यपूर्ण स्थल है। श्वेत संगमरमर से निर्मित राजनगर श्यामा मन्दिर एक अतुलनीय वैभवशाली मन्दिर है जो अपने वास्तुकला, कलाकृतियों, जालीदार झरोखों के कारण अद्भुत अनुपम है। यह मन्दिर तन्त्र साधना के लिए दिव्य स्थल रहा है। मन्दिर के बाहर धातु का एक विशाल घंटा लगा हुआ है जो दो खम्भों के मध्य लटका हुआ है। मन्दिर के पास ही राज प्रासाद के भग्नावशेष हैं। इस राज प्रासाद के द्वार पर बने दो विशाल हाथी बने हुए हैं जो आज भी जीवन्त प्रतीत होते हैं। ये अपने समय के वैभवशाली अतीत की गाथा कह रहे हैं। सबसे आश्चर्यजनक है कि इनके निर्माण में सीमेंट का उपयोग नहीं हुआ है। वैभवशाली सनातन विरासत...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय जगतमाता भवानी🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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स्वयम्भू विराट शिवलिङ्गम..!!!! श्री राजसी महादेव, सिद्धेश्वर नाथ मन्दिर, अरुणाचल प्रदेश। दिव्य शिवलिङ्गम की ऊँचाई २५ फीट हैं। विराट नन्दी चिर प्रतिक्षित मुद्रा में शिवलिङ्गम की ओर मुख किए बैठे हैं। सघन वन में प्राकृतिक सौंदर्य के मध्य छिपा हुआ ज़ीरो माइल से लगभग ४ कि.मी. दूर स्थित है यह पवित्र स्थान। अनुपम, दिव्य, मनोहारी दृश्य.!! महान सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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शिवालय के अन्दर तो शिवलिङ्ग सभी स्थानों पर मिलते हैं। परन्तु यदि सम्पूर्ण शिवालय ही शिवलिङ्गाकृति में हो तो कितना मनमोहक दृश्य हो.!! और यह अतुलनीय शिव मन्दिर शिवलिङ्ग की आकृति में ही निर्मित हैं। यह मन्दिर रामगढ़, झारखंड में निर्जन वन में स्थित हैं। (चित्र-साभार) मन्दिर के स्थापत्य में लिङ्गाकृति और जल लहरी (अरघा) का स्वरूप स्पष्टता से दृष्टिगोचर होता है। इस मन्दिर के देखभाल और पुनर्निर्माण/सौंदर्यीकरण की अत्यंत आवश्यकता है अन्यथा हम इस अद्भुत विशिष्टतापूर्ण मन्दिर को खो देंगे। इसके निर्माण का वास्तविक समय तो ज्ञात नहीं है। इसे निर्माण करवाने वाले सनातनी पूर्वजों को नमन। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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प्रकृति को अपने सृजनकर्ता के आलिंगन/वंदन के लिए न किसी शासन के अनुमोदन की आवश्यकता होती है और ना ही किसी आदेशपाल को उत्कोच देने का। क्योंकि सृष्टि के सृजनकर्ता का अनुग्रह तो चहुँ ओर फुहारों के रूप में बरसता ही रहता है। जहाँ प्रकृति स्वयं लीलाधर श्री कृष्ण को अपने आलिंगनबद्ध करने को ललायित हैं... विश्व के सबसे ऊँचाई पर स्थित श्री कृष्ण मन्दिर। किन्नौर, हिमाचल प्रदेश। क्या इस दृश्य को देखने हेतु स्वयं समय नहीं ठहर गया है.?? ऐसा सौंदर्य और कहाँ...!! सौन्दर्यपूर्ण सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय लीलाधर..!! जय नन्दलाला...!! जय गोपाळ....!!🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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जब भक्ति, आस्था व समर्पण अपने सर्वोच्च स्तर के परे चला जाता है तो जो निर्माण कार्य सम्पन्न होता है वो किसी भक्त के द्वारा नहीं अपितु स्वयं आराध्य देव के द्वारा सम्पूर्ण होता है। श्री रंगनाथस्वामी मन्दिर, श्रीरंगम, तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु। (चित्र-साभार) इस मन्दिर में निर्मित लधु मूर्तियाँ, कलाकृतियाँ, रंगसंयोजन सभी अकल्पनीय, अतुलनीय हैं। गर्व करें कि यह आश्चर्यजनक निर्माण सनातनी हाथों से प्रभु ने सम्पन्न करवाया है। इसे देखें और स्मृति के आनन्दवन में खो जाएँ..!! यह दिव्य अनुभूति और कहीं नहीं प्राप्त होने वाले..!! गौरवान्वित सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय रंगनाथ स्वामी🙏🌺 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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"सन्यास" कभी भी प्रयास से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। सन्यास तो स्वतः घटित होने की प्रक्रिया है। जब भीतर की प्यास अपने परम् अवस्था में पहुंचता है तो संन्यास घटित होता है और जीव सन्यस्त हो जाता है। एक संन्यासी संसार में तो होता है परंतु सन्यासी के भीतर संसार नहीं होता है। वह संसार में रह कर भी संसार से निर्लिप्त होता है। आजकल चर्चा है कि "संन्यासी उत्पादन" का factory 🏭 बैठाया जा रहा है। जहां सन्यासी बनाया जाएगा। एक किराना परचून व्यापारी जो सर्कस वाला करतब भी मंच पर दिखा कर धन लाभ करता है वही इस factory 🏭 का सर्वेसर्वा है। वह कहता है कि महर्षि वंश परंपरा में सन्यासी का उत्पादन करेगा। इस अंध मूढ़ मति से कुछ महर्षि के संदर्भ में पूछना चाहता हूं। एक यक्ष प्रश्न है...... क्या कोई भी महर्षि कुंवारे रहे हैं.?? १. महर्षि कश्यप - दिती, अदिति, दनु, अरिष्ठा, सुरसा, खसा, सुरभि, विनता, कद्रु, क्रोधवशा, इरा, मुनि, ताम्रा (१३ पत्नियां), २. अत्रि - अनुसूया, ३. वसिष्ठ - अरुंधति, ४. गौतम - अहिल्या, ५. जमदग्नि - रेणुका, ६. भारद्वाज - सुशीला, ७. विश्वमित्र - (मेनका, से संसर्ग)। यहां...

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क्या वास्तव में "रेगिस्तानी पशुओं के झुण्ड" के आर्यावर्त में प्रवेश से पूर्व यहाँ "वास्तुशिल्प" या"सूई" भी नहीं बनता था.??? आईये देखते हैं.!! कितना दुर्लभतम भव्यतापूर्ण यह मन्दिर है जिसे सनातनी पूर्वजों ने अपने हाथों से सम्पूर्ण पहाड़ को ही काटकर ही बना डाले हैं। यह निर्माण कार्य "रेगिस्तानी पशु" के आने से पूर्व का है। यह अतुलनीय श्री नेमिनाथ मन्दिर, ग्वालियर किला, ग्वालियर, मध्यप्रदेश में स्थित है। मन्दिर के विशालकाय पाषण कक्ष में श्री नेमिनाथ ध्यान साधना में पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं। श्री नेमिनाथ के मस्तक पर अतिसौन्दर्यपूर्ण पाषाण छत्र बना हुआ है। कक्ष के छत पर पूर्ण पुष्पित कमल निर्मित है जो सनातन संस्कृति का पवित्र चिह्न है (अष्टदल कमल सनातन धर्म में पवित्र हैं)। आश्चर्यजनक रूप से यह सभी निर्माण एक ही अखण्ड पाषाण शिला को काटकर निर्मित किया गया है। कक्ष के बाहरी निर्माण को मन्दिर के रूप में गढ़ा गया है। मन्दिर के ऊपर और निचले तले के बाँयीं ओर के भीत पर ध्यान दें। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी मिट्टी के भीत को धारदार छुरी से काट कर यह बनाय...

सनातन धर्म

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सनातन धर्म में सृजनात्मकता अंतर्निहित है। सृजनशीलता वह आधार है जो सनातन धर्म के अतिरिक्त अन्य किसी "किताबी" पंथ में नहीं मिलता है। सहस्रों वर्षों तक विधर्मियों, म्लेच्छों, लुटेरों, आक्रांताओं, आक्रमणकारियों के द्वारा विखण्डित/भग्न/ध्वस्त किए जाने के पश्चात भी सृजन की जीवटता समाप्त नहीं हुई। सनातन धर्म के प्रतिष्ठानों में जो भी उत्कीर्ण हैं वह मात्र धार्मिक प्रतीक नहीं है अपितु सम्पूर्ण समाज के सांस्कृतिक/धार्मिक/सामाजिक और व्यावसायिक क्षेत्रों के परिदृश्यों का चित्रण है। इन चित्रों के जूम(zoom) करके देखें..!! क्या मूर्तियों, आकृतियों, संरचनाओं को देख आप किसी सम्मोहन शक्ति का अनुभव कर रहे हैं.?? यही है सनातनी शिल्पकारों के कला निपुण हाथों का चमत्कार.!! ये सभी चित्र चूली जैन मन्दिर, हलवाड़-धनगढ़रा उच्च पथ, गुजरात के हैं। (सभी चित्र-साभार) ये सभी चित्र मन्दिर के बाहरी निर्माण के हैं। मन्दिर के अंदर की Photography प्रतिबंधित है। जब मन्दिर के बाहर का निर्माण इतना सौंदर्यपूर्ण है तो अंदर का निर्माण कितना नयनाभिरामी और मनमोहन होगा यह स्वयं कल्पना किया जा सकता है। सनातन शिल्प कला में उ...