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Showing posts from September, 2023

सनातन धर्म

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देव सरिता माँ नर्मदा के तट पर देवाधिदेव महादेव का ज्योतिर्लिङ्ग ओम्कारेश्वर स्थित हैं। यह सुविख्यात ज्योतिर्लिङ्ग मध्यप्रदेश में स्थापित हैं। इसी ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग के मन्दिर में एक अतिदुर्लभ भगवान शिव का प्रतिमा उकीर्ण है। यह भगवान शिव का अद्वितीय अष्टभुजी प्रतिमा हैं। (चित्र-साभार) भगवान शिव के इस प्रतिमा के हाथों में त्रिशूल, डमरू, नाग, गदा, मुण्ड खप्पड़, व कमल सुशोभित हैं। दो हाथ नृत्य मुद्रा में हैं। इनके पाद भी नृत्य मुद्रा में हैं। प्रभु अपने बाँये पाँव पर खड़े हैं व दायाँ पाँव नृत्य की मुद्रा में ऊपर उठे हुए हैं। इस सम्पूर्ण प्रतिमा के मुखमण्डल, अंगविन्यास, आभूषणों, आयुधों, भाव भंगिमाओं में सनातनी शिल्पकार का निपुणता व उत्कृष्टता स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। अप्रतिम सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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हरिश्चंद्रगढ़ उस स्थल पर है जहाँ ठाणे, पुणे और अहमदनगर जनपद (महाराष्ट्र) की सीमाएँ मिलती हैं। हरिश्चंद्रगढ़ का इतिहास अतिप्राचीन है। यहाँ सूक्ष्म पाषाणिकमानव अवशेष मिले हैं। अग्निपुराण, मत्स्यपुराण व स्कन्दपुराण में हरिश्चंद्रगढ़ के संदर्भ मिले हैं। मान्यता है कि इसकी उत्पत्ति छठी शताब्दी में कलचुरी वंश के शासन काल में हुई व हरिश्चंद्रगढ़ किले का निर्माण इनके द्वारा ही कराया गया। इसके कन्दराओं में शिल्पकला व कलाकृति का निर्माण ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ। यहाँ इनके चट्टानों को तारामती, रोहिताश्व नामकरण किया गया है किन्तु इसका सम्बन्ध अयोध्या से नहीं है। महान ऋषि चांगदेव जिन्होंने तत्वसार ग्रन्थ की रचना की, चौदहवीं शताब्दी में यहाँ ध्यान करते थे। हरिश्चंद्रेश्वर मन्दिर अतिदुर्लभ व अकल्पनीय सनातन वास्तुशिल्प का आदर्श उदाहरण है। (चित्र-साभार) यह सम्पूर्ण मन्दिर आश्चर्यजनक रूप से एक ही पाषाण शिला से निर्मित है। मन्दिर का शीर्ष उत्तर-भारतीय मन्दिरों के शैली में निर्मित है। यह आधार से शीर्ष तक १६ मीटर ऊँचा है। कहा जाता है कि मङ्गलगङ्गा नदी यहाँ के एक सरोवर से निकलती है। यह मन्दिर प्राचीन आर्यावर्त...

सनातन धर्म

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सनातन धर्म के जितने भी अतिप्राचीन मन्दिर/मठ हैं उनमें कोई न कोई रहस्यमयी विलक्षणता होते ही हैं। उनके निर्माण के पीछे एक सम्पूर्ण गाथा होती है। इसका प्रमुख कारण है की मन्दिर/मठ निर्माण से पूर्व उस स्थान को पञ्चभूतो का आवाहन कर 'सिद्ध/जागृत' किया जाता था। ऐसा ही एक दिव्य स्थल कोटितीर्थ है। कोटितीर्थ वितस्ता (झेलम) नदी के तट पर स्थित एक पवित्र स्थान है। यह कोटितीर्थ बारामुला, कश्मीर में है। इस दिव्य कोटितीर्थ में एक अतिप्राचीन अतिदुर्लभ शिवलिङ्ग स्थापित हैं। (चित्र-साभार) इस पौराणिक कोटितीर्थ का उल्लेख भृगुसंहिता में है। इस कोटितीर्थ में एक ऐसा अकल्पनीय झरना है जो अपने विलक्षण गुण के कारण अद्वितीय है। इस अद्भुत झरना का जल गर्मी में ठंढा और सर्दी में गर्म रहता है। यह एक अद्भुत दर्शनीय धार्मिक स्थल है। अद्भुत सनातन धरोहर...!! ॐ नमः परम् शिवाय 🚩 जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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नब्बे का दशक और कश्मीरी सनातनियों का भोगा हुआ रक्तपात आज भी आँखों से अश्रुधारा बहाने के लिए पर्याप्त है। क्या कोई उस अमानवीय अत्याचार को जीवनपर्यन्त भूल सकता है जब मलेच्छों ने सनातनियों के रक्त से श्रीनगर के सड़कों को रंग दिया था। उन सनातनियों के मर्मान्तक पीड़ा का अनुमान सहज लगाया जा सकता है जब म्लेच्छों ने उनके आराध्य देव को अपमानित कर अपवित्र किया था। उस समय जिन १८ मन्दिरों को अपवित्र, क्षतिग्रस्त, ध्वस्त, विखण्डित किया गया था उनमें से एक यह भगवान शिव का मन्दिर भी है। यह भग्न महादेव मन्दिर रैनावाड़ी (मूल नाम - राजानक वाटिका), श्रीनगर, कश्मीर का है। (चित्र-साभार) मन्दिर ही नहीं प्रभु के शिवलिङ्ग तक को भी क्षतिग्रस्त किया गया था। यह प्राचीन मन्दिर कभी अपने विशिष्टता के लिए सुविख्यात था परन्तु विधर्मियों के कुकर्मों के कारण आज परित्यक्त सा है। इन सब के पश्चात भी क्या कोई "भाई-चारा" का नारा लगाया जा सकता है.??? क्या यह माना जाएगा कि सबका डीएनए एक है.?? वैभवशाली सनातन धरोहर के भग्नावशेष...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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भगवान श्रीमन्नारायण के आवेशावतार (षष्ठ) श्री परशुरामजी का दुर्लभतम प्रतिमा है यह। यह प्रतिमा ग्यारहवीं शताब्दी का निर्मित माना गया है। यह अप्रतिम प्रतिमा बेलूरघाट महाविद्यालय, पश्चिम बंगाल के संग्रहालय में संरक्षित हैं। (चित्र-साभार) इसके अंग अवयव, भाव भंगिमा, आभूषण की उत्कृष्टता सनातनी शिल्पकार के प्रवीणता व निपुणता के परिचायक हैं। इनके हाथों में परसु सुशोभित है। यज्ञोपवीत को अनुपम रूप में उकेरा गया है। कटि प्रदेश में बंधे अंगवस्त्र के गांठ पर ध्यान दें, यह कितने उत्कृष्ट रूप में गढ़ा गया है। लघु मूर्तियां का सौंदर्य ही अनूठा है। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय श्री परशुराम जी 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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जब कभी भी कहीं आप कोई अद्वितीय, अतुलनीय, अकल्पनीय वास्तुशिल्प देखते हैं तो संशय रहित होकर गर्व व पूर्ण विश्वास से कह सकते हैं कि यह निर्माण हमारे सनातनी पूर्वजों के हाथों ही हुआ है। सहस्रों वर्ष पूर्व और वर्तमान के भारतवर्ष से सुदूर इस्लामी बहुसंख्यक समुदाय के देश में जो यह दुर्लभ निर्माण देख रहे हैं, यह भी सनातन धर्मावलंबियों ने निर्मित किए हैं। विश्वविख्यात बोरोबुदुर मन्दिर इंडोनेशिया। (चित्र-साभार) आज भले ही यह देश इस्लामी हैं किन्तु प्राचीन काल में यह भू भाग सनातन संस्कृति से पुष्पित पल्लवित रहा है। इसे ध्यान से देखें..! क्या इस मन्दिर और पवित्र श्रीयंत्र में एकरूपता नहीं है.!?! इस अद्भुत मन्दिर का निर्माण हमारे ही सनातनी पूर्वजों के द्वारा "शैलेन्द्र साम्राज्य" के काल में हुआ था। यह असम्भव सा निर्माण "गुप्त काल" में हुए हैं और इस निर्माण में सनातन और बौद्ध वास्तुकला का अपूर्व संयोजन किया गया है।  यह गौरवशाली निर्माण विश्व धरोहर में सम्मानित हैं। गौरवान्वित सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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श्री रामलिङ्गेश्वर स्वामी पापनाशम मन्दिर में परमपिता देवाधिदेव भगवान शिव के शिवलिङ्ग की स्थापना स्वयं मर्यादापुरुषोत्तम दशरथनन्दन प्रभु श्री राम के हाथों हुए हैं, ऐसी ही मान्यता है। मान्यता है कि जब प्रभु श्री राम जी १०७ शिवलिङ्गों की स्थापना सम्पन्न कर चुके थे तो १०८ वां शिवलिङ्ग श्री राम भक्त आञ्जनेय हनुमानजी के द्वारा भगवान शिव की नगरी काशी से लाया गया। इस प्रकार यहाँ १०८ शिवलिङ्ग स्थापित हुए। (चित्र-साभार) यह मन्दिर कुंबकोणाम, तमिलनाडु में स्थित हैं। शिव भक्तों में इस मन्दिर के प्रति अनन्य आस्था भाव है। शिवलिङ्ग का पूजन अर्चन, दर्शन अभीष्ट मनोकामना पूर्णकारी हैं। मन्दिर की भव्यता आकर्षक व अद्वितीय है। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩🙏 जय महाकाल🔱🚩🔱 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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सम्पूर्ण विश्व में अति प्राचीन सनातन धर्म के प्रमाण सभी स्थानों पर विद्यमान हैं। किम्वदंती है कि श्री चितरेश्वर महादेव मन्दिर, चितरेश्वरी, पुरी, ओडिशा का सम्बन्ध "प्राचीन सरस्वती-सिन्धु सभ्यता" से है।(चित्र-साभार) स्थानीय निवासी भी इसे इतना ही प्राचीन मानते हैं। किन्तु अभिलेखों में वर्णित के अनुसार इस मन्दिर का निर्माण सोमवंशी शासनकाल में दसवीं शताब्दी में सोमवंशी नरेशों द्वारा करवाया गया था। यह मन्दिर चितरेश्वरी में कोणार्क से लगभग दस मील दूर है। श्री चितरेश्वर मन्दिर भगवान देवाधिदेव शिव को समर्पित हैं। इस मन्दिर के अब जो भी निर्माण समय के झंझावातों से बचे हुए हैं सभी लाल बलुआ पत्थर के हैं। प्राचीन शिवलिङ्ग की आभा निराली है। महान सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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भगवान शिव का लिङ्गोद्भव मूर्ति कितने अद्वितीय रूप में उत्कीर्ण किया गया है। इस सम्पूर्णता व निपुणता से सूक्ष्म से सूक्ष्म अवयवों, बेल-बूटों, झरोखों इत्यादि का निर्माण किया गया कि दर्शक मन्त्रमुग्ध हो जाते हैं। लिङ्गोद्भव के शीर्ष पर बने रक्षक, अभिषेक करते हुए गज, एवं देव की मूर्ति के निर्माण पर ध्यान दें। कितने अद्भुत दृश्य को अनुपम रूप में गढ़ा गया है। यह दुर्लभतम पाषाण शिल्प सनातनी हाथों से निर्मित हुए हैं। यह विरुपाक्ष मन्दिर, पट्टदकल, कर्नाटक में हैं। (चित्र - साभार) सनातनी पूर्वजों ने जो भी शिल्पकला व वास्तुकला में निर्मित किए हैं उसकी प्रतिकृति भी बनाना आधुनिक युग में अकल्पनीय ही लगता है। वैभवपूर्ण सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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यह धरा अपने गर्भ में सनातन धर्म के एक से बढ़कर एक साक्ष्य को समेटे हुए हैं, और जब कभी भी विश्व को साक्ष्य की आवश्यकता होती है... ये अपने उदर से उसे प्रकट कर देती हैं। मध्यप्रदेश के उमरिया में एक व्यक्ति जब अपने गृह निर्माण के लिए खुदाई करवाने लगे थे.. तो उस निर्माण स्थल से ये अति प्राचीन सनातनी देवी की भग्न प्रतिमा प्रकट हुई। (चित्र-साभार) यह देवी की भग्न प्रतिमा वैदिक काल की ही प्रतीत होती हैं। इसीलिए तो कहते हैं कि जब न ईसा थे ना ही मूसा थे तब भी बस सनातन धर्म ही सर्वत्र व्याप्त था। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय माँ🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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यह देखकर अत्यंत पीड़ा होती है कि दूसरी शताब्दी का शिवलिङ्ग दो सहस्राब्दी व्यतीत होने के पश्चात भी ऐसी स्थिति में है।(चित्र-साभार) सभी सनातनी को अविलम्ब इसके मन्दिर निर्माण व सुरक्षा संरक्षण का उपाय करना चाहिए क्योंकि यह ऐतिहासिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण प्राचीन स्थल हैं। वैसे तो इस स्थल को ASI अपने हाथों में ले लिया है पर आज भी यह शिवलिङ्ग एक मन्दिर की बाट जोह रहा है। नंदा गांव में पुरातात्विक दृष्टिकोण से यह अतिप्राचीन शिवलिङ्ग बहुत महत्वपूर्ण हैं। राजस्थान के मध्य स्थित तीर्थ राज पुष्कर का नंदा सरस्वती संगम स्थल इसे महत्वपूर्ण बनाते हैं। इस शिवलिङ्ग को कुषाण काल (दूसरी - तीसरी शताब्दी) का माना जाता है। भगवान शिव का लकुलीश अवतार इस चतुर्भुज सर्वतोभद्र शिवलिङ्ग पर उत्कृष्ट शिल्प कौशल के माध्यम से उत्कीर्ण है । सणाल कमल, चक्रधारी श्री विष्णु, माँ लक्ष्मी, हलधर बलराम, सूर्यदेव सहित इस शिवलिङ्ग पर कुल तैंतीस कोटि देवताओं की मूर्तियाँ उकीर्ण हैं। यहाँ पहुँचने के लिए पुष्कर से गोविंदगढ़ सड़क पर स्थित नंद गांव जाना पड़ता है। अद्भुत सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा...

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भगवान श्री कृष्ण अपने बाल गोपाल रूप में मनमोहन हैं।🙏 प्रभु के कृष्णवर्णी विग्रह के हाथों में उनके प्रिय माखन का गोला है। (चित्र-साभार) भगवान आभूषणों से सुसज्जित हैं। श्री नवनीत कृष्ण स्वामी, अप्रमेय मन्दिर। डोडा मल्लूर ग्राम, रामनगर जनपद, कर्नाटक। भव्यतापूर्ण सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय श्री द्वारिकाधीश🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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भगवान यशोदानंदन श्री कृष्ण को समर्पित इस मन्दिर को "काँच का मन्दिर" कहा जाता है। इस मन्दिर का यह नामकरण इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें सभी साज-सज्जा काँच से ही किया गया है।(चित्र-साभार) काँच का मन्दिर, वृन्दावन, मथुरा जनपद, उत्तरप्रदेश। इस मन्दिर के भव्य सौंदर्य दर्शकों को कल्पनालोक में भ्रमण करा देते हैं। इस मन्दिर का वैभव और सौंदर्य देवलोक सदृश्य है। यहाँ आइए और जी भर कर श्रीकृष्ण भावनामृत का पान कीजिए.!! वैभवपूर्ण सनातन धरोहर....!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय श्री सुदर्शन चक्रधारी🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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द्वारिकाधीश भगवान श्री कृष्ण का एक नाम "मदनमोहन" भी है। श्री मदनमोहन को समर्पित यह अतुलनीय मन्दिर १५९० ई. से १६२७ ई के मध्य मुल्तान के रामदास खत्री (कपूरी) के द्वारा निर्माण करवाया गया था। इस मन्दिर को क्रूर धर्मान्ध म्लेच्छ औरंगजेब के द्वारा ध्वस्त करवा दिया गया था। यह भव्यता पूर्ण श्री मदनमोहन मन्दिर, वृन्दावन, मथुरा जनपद, उत्तरप्रदेश में स्थित हैं। जब मुगलों के द्वारा इस मन्दिर को ध्वस्त किया गया तो इस मन्दिर के भगवान मदनमोहन के मूल प्रतिमा को सुरक्षित राजस्थान स्थानांतरित कर दिया गया था। वर्तमान समय में भी वह मूल विग्रह राजस्थान के करौली में सुरक्षित है। इस मन्दिर का पुनर्निर्माण १८१९ ई. में नन्दलाल वासु के सौजन्य से किया गया है। इस मन्दिर के निर्माण में लाल पत्थरों का उपयोग किया गया है जो इसे भव्यता प्रदान करते हैं। (चित्र-साभार) इस मन्दिर में अब मूल विग्रह के प्रतिकृति का पूजन अर्चन किया जाता है। यह मन्दिर अपने आकर्षक निर्माण के कारण दर्शकों को मन्त्रमुग्ध कर देते हैं। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! हरि बोल.....!!🚩 जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय मदनमोहन🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा...

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यह जीवन भी तो एक द्यूत क्रीड़ा के सदृश्य ही है। हर पल हम सुख/आनन्द की अपेक्षा/अभिलाषा में अज्ञात पर दाँव लगाते चले जाते हैं। यह द्युत क्रीड़ा ही था जिसने आर्यावर्त के भविष्य को बदल कर रख दिया था। द्यूत क्रीड़ा का द्वापरयुग के साथ विशिष्ट सम्बंध रहा है। द्यूत के दो विशिष्ट (विख्यात और कुख्यात) व्यक्ति द्वापरयुग में हुए। एक द्यूत प्रेमी जो सदा अधर्म को पोषित करते रहे - गन्धार नरेश शकुनि हुए। ये अपने कृत्यों के कारण कुख्यात रहे। दूसरे द्यूत शिक्षक कंक (धर्मराज युधिष्ठिर) हुए जिन्होंने विराट के राजा को अपने अज्ञातवास की अवधि में द्यूत क्रीड़ा का शिक्षा दिए। ये धर्म समर्थन के कारण सुविख्यात रहे। द्यूत क्रीड़ा में द्युत पट्टिका और गोटियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संलग्न चित्र विश्व के सबसे प्राचीनतम द्यूत क्रीड़ा पट्टिका और गोटियों का है। यह उत्खनन में गुजरात के लोथल से प्राप्य है। जाँच करने पर यह पट्टिका ईसापूर्व  २४०० ई. का माना गया है। जी हाँ, ठीक सुना.!! ईसा पूर्व २४०० ई...! (चित्र-साभार) गोटियाँ दुर्लभ रूप में हैं। सनातन संस्कृति के भग्नावशेष...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #...

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यह वैभवशाली भव्य मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मन्दिर विख्यात विरुपाक्ष मन्दिर के जैसा ही निर्माण का निर्णय किया गया था। परन्तु इसका आकार विरुपाक्ष मन्दिर की अपेक्षा लघु रूप में है। इस मन्दिर का निर्माण चालुक्यराज विजयादित्य सत्याश्रय के द्वारा ७२० ई. में आरंभ किया गया किन्तु दुर्भाग्यवश कभी भी यह निर्माण पूर्ण नहीं हो पाया। (चित्र-साभार) यह दुर्लभ मन्दिर श्री संगमेश्वर महादेव मन्दिर हैं। पट्टदकाल, कर्नाटक। यह अत्यंत आकर्षक मन्दिर है और इसमें द्रविड़ शिल्प कला व स्थापत्य कला का अनुपम रूप से प्रयोग दृष्टिगोचर होता है। इस मन्दिर में दुर्लभ शिवलिङ्ग के अतिरिक्त नटराज व नृसिंह की मनमोहक प्रतिमाएँ दर्शन को प्राप्य हैं। अतुलनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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सनातनी शिल्पकारों के हाथों के स्पर्श मात्र से पाषाण शिला भी बोलने लगते हैं। ये प्रस्तर शिला खण्ड भी गौरवपूर्ण ऐतिहासिक गाथा को सुना रहे हैं। इस पाषाण खण्ड में कुरुक्षेत्र के महाभारत की महत्वपूर्ण कथा उकीर्ण हैं। (चित्र-साभार) एक ओर (बाएँ) पांडवों की सेना है जिसका नेतृत्व कौन्तेय अर्जुन कर रहे हैं और उनके रथ के सारथी द्वारकाधीश हैं। वहीं दूसरी ओर (दाएँ) कौरवों की सेना है जिसका नेतृत्व राधेय कर्ण कर रहे हैं और उनके रथ के सारथी मार्द्र नरेश हैं। इस रचना में कर्ण के रथ का पहिया भूमि में धंस गया है। और कर्ण उसे निकालने के लिए प्रयत्नशील है। यहाँ कर्ण निःशस्त्र है। उधर अर्जुन अपने गाण्डीव पर वाण चढ़ा कर आक्रमण को उद्यत हैं। कर्ण अर्जुन को सम्बोधित हो आग्रह कर रहा है कि वह निःशस्त्र है अतः युद्ध-नीति के अनुसार अर्जुन को वाण नहीं चलाना चाहिए। दोनों ओर के सैनिक युद्धरत हैं। कितने अद्भुत व दुर्लभ रूप में यह सम्पूर्ण कथा इस शिला खण्ड पर निर्माण किया गया है। देखकर अचम्भा और रोमांच होता है.!! सनातनी शिल्पकारों के कला के समक्ष मस्तक नत हो जाता है.!! सनातनी मन्दिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के...

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औघड़दानी का रूप निराला। निर्जन  वन  में  डेरा  डाला॥ देवाधिदेव महादेव अपने ध्यान में मग्न हैं कोई भक्त आए या नहीं आए, कोई अन्तर नहीं पड़ता है। भगवान शिव अपना अनुग्रह व आशीर्वाद भक्तों को सतत प्रदान करते रहे हैं। प्राचीन अनुपम शिवलिङ्ग, धोडप किला, महाराष्ट्र। (चित्र-साभार) नन्दी भैया चिर-प्रतीक्षा में प्रभु को निहार रहे हैं। इसका निर्माण जिस किसी सनातनी साधक ने किया होगा उनका धर्म के प्रति समर्पण वंदनीय है। आज यह स्थान निर्जन है तो भी दिव्य ऊर्जा को अनुभव किया जा सकता है। दर्शनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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अकल्पनीय को साकार करने की शिल्पकला सनातनी पूर्वजों के ही सामर्थ्य में था और उन्होंने इसे निर्माण कर एक धरोहर के रूप में हमारे लिए छोड़ गए हैं। यह दुर्लभ शिल्पकला व झरोखा किसी काष्ठ खण्ड पर नहीं अपितु पाषाण पर निर्मित है। झरोखे का पल्ला भी पाषाण से ही निर्मित है। किन्तु इन अतुलनीय अद्भुत निर्माण कार्य को हमारे इतिहास में स्थान नहीं मिला क्योंकि "लहरू गैंग व वामी इतिहासकार" को सनातन संस्कृति से बैर और घृणा रहा है। यह अद्वितीय निर्माण "काशीराज काली मन्दिर" वाराणसी, उत्तरप्रदेश में निर्मित है। 'काशीराज काली मन्दिर' काशी नरेश की व्यक्तिगत सम्पत्ति है और पर्यटकों दर्शनार्थियों के लिए लगभग गुप्त ही है। इस पाषाण झरोखे में लीलाधर श्री कृष्ण के द्वारा यमुना जी के तट पर वस्त्र चुराने की कथा जीवन्त रूप में प्रदर्शित किया गया है। अहा.!! मनोहारी दृश्य। कन्हैया कदम्ब के डाल पर गोपियों के वस्त्र ले बैठे हैं और गोपियाँ वस्त्र प्राप्ति के लिए कान्हा से मनुहार कर रही हैं। ध्यान रखें कि हमारे सनातन धर्म के मन्दिर उत्कृष्ट कलाकृतियों के भण्डार हैं।  आवश्यकता है कि इन्हें जनसमान्य...