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Showing posts from June, 2025

सनातन धर्म और हम

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जब देवी सती अपने पिता के यज्ञ कुण्ड में कूदकर अपने प्राण त्याग दीं और भगवान शिव उनके निर्जीव शरीर को अपने कंधों पर उठा कर संहार ताण्डव करने लगे। सम्पूर्ण सृष्टि त्राहिमाम करने लगी तो श्री विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के अनेक भागों में विभाजित कर दिये। जहाँ जहाँ भी देवी सती के अंग गिरे आर्यावर्त में वह स्थान शक्तिपीठ बन गए। आर्यावर्त में ५१ शक्तिपीठ रहे हैं किंतु इस खंडित भूमि में अब ४९ ही हैं (हिंगलाज माता पाकिस्तान और ढाकेश्वरी बांग्लादेश में हैं)। भारत में प्रथम हिन्दवी साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज भी एक शक्तिपीठ के अनन्य भक्त रहे। उन्होंने देवी तुलजा भवानी माता का सदैव पूजन अर्चना किए। देवी तुलजा भवानी उन्हीं ५१ शक्तिपीठों में एक हैं। माँ तुलजा भवानी तुलजापुर, उस्मानाबाद जनपद, महाराष्ट्र में स्थित हैं। (चित्र - साभार) देवी तुलजा भवानी माता का मन्दिर किला परिसर ही है। इस किले का निर्माण छत्रपति शिवाजी महाराज ने ही करवाया था और वे नियमित रूप से माँ भवानी की आराधना करते थे। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय माँ तुलजा भवानी🙏🌺 जय महाकाल ...

सनातन धर्म और हम

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सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनकी शक्ति से संचालित है उन देवाधिदेव महादेव का अद्वितीय मन्दिर.... श्री होयसलेश्व मन्दिर, हलेबीदु, कर्नाटक। (चित्र - साभार) होयसल साम्राज्य के नरेश विष्णुवर्धन द्वारा एक मानव निर्मित कृत्रिम झील के किनारे होयसलेश्व मन्दिर का निर्माण बारहवीं सदी में करवाया गया था। श्री होयसलेश्व मन्दिर भगवान शिव को समर्पित है। श्री होयसलेश्व मन्दिर का निर्माण soapstone पत्थरों से किया गया है। गर्भगृह में दिव्य शिवलिङ्गम विराजमान हैं। आज भी देवाधिदेव महादेव के दर्शन लाभ प्राप्त करने हेतु शिव भक्त आते रहते हैं। इस मन्दिर का कोई भी एक फीट स्थान कलाकृतियों से रहित नहीं है। कितना श्रमसाध्य रहा होगा यह कार्य जिन्हें सनातनी शिल्पकारों ने अपने निपुण हाथों से सम्भव किए हैं। इस दुर्लभ शिल्प कला को शुक्रवारी ने कलाकारों के हाथों को काटकर और पुस्तकालयों को जलाकर लुप्त कर दिया। जो कुछ शेष कला बचा उसे इतवारियों ने ग्रँथ चौर्य कर निर्लज्जता से अपने नाम करवा लिया। अद्भुत सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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वैदिक सनातन संस्कृति के धरोहरों को किस प्रकार सनतनी द्वारा ही विस्मृत किया गया है उसके दुर्भाग्य का एक जीवंत उदाहरण है आर्यावर्त में रघुनंदन हिल्स, उनाकोटी, त्रिपुरा। स्थानीय बोली में उनाकोटी का अर्थ है "एक कोटि से एक कम" अर्थात १००००००० - १ = ९९९९९९९ की संख्या। माउण्ट रशमोर नेशनल मेमोरियल, साउथ डकोटा, अमेरिका विश्वविख्यात है क्योंकि वहाँ एक पहाड़ को काटकर अमेरिका के राष्ट्रपति वाशिंगटन, जेफरसन, रूजवेल्ट और लिंकन के मुखाकृति को बनाया गया है। इसके निर्माण में सभी आधुनिक यंत्रों और तकनीकी का उपयोग किया गया है। किन्तु जब विश्व के लोगों को लिखना पढ़ना तक नहीं आता था उस समय सनातनी शिल्पकारों ने उनाकोटी के रघुनंदन पहाड़ों पर १००० भगवान के मूर्तियों का निर्माण अलग अलग भाव भंगिमाओं में कर चुके थे। इन अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय निर्माण का समय निर्धारित नहीं किया गया है। सबसे बड़ा प्रश्न है कि जब एक दो मूर्तियों के निर्माण में वर्षों लग जाता है तो ये सम्पूर्ण निर्माण कितने वर्षों में किये गए होंगे.?? वे कौन थे जिन्होंने इस अकल्पनीय मूर्तियों का निर्माण किए.??? कितना दुर्भाग्यपूर्ण विडंब...

सनातन धर्म और हम

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जिसका अभिषेक स्वयं प्रकृति करती हो उसका दृश्य कितना मनोहारी और सौंदर्यपूर्ण होगा.!! ये श्री अञ्जनी महादेव मन्दिर, सोलन घाटी, हिमाचल प्रदेश हैं। (चित्र - साभार) यहाँ पहाड़ से प्राकृतिक रूप से सतत जल शिवलिङ्गम पर गिरता रहता है और प्रकृति भगवान शिव का जलाभिषेक करती रहती है। सर्दियों के ऋतु में सम्पूर्ण शिवलिङ्गम हिम से आच्छादित हो जाते हैं और एक विशाल हिम-शिवलिङ्गम का निर्माण करते हैं। सर्दियों में एक दिव्य शांति और निरवता यहाँ व्याप्त हो जाती हैं। कुछ होते हैं तो परमपिता देवाधिदेव महादेव ही अपने सभी सोलह कलाओं में यहाँ चहुं ओर व्याप्त होते हैं। शिव भक्त उस शांति में प्रभु शिव के सानिध्य में आसन प्राणायाम ध्यान कर उनके आशीर्वाद और अनुग्रह प्राप्त करते हैं। प्रभु की लीला न्यारी...!! अद्भुत सनातन धरोहर...!! ॐ नमः परम् शिवाय 🚩 जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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आर्यावर्त का अतीत गौरवपूर्ण रहा है। यहाँ के वीर योद्धाओं ने विश्व विजय किया है। यहाँ के मन्दिर, भवन, राज प्रासाद, व अन्य प्रतिष्ठान अपने वास्तुशिल्प एवं स्थापत्य कला के लिए विश्व विख्यात और अद्वितीय, अतुलनीय रहे हैं। एक अन्धकार का समय भी आया जब राष्ट्र विधर्मियों के अधिकार में चला गया। सामान्यतः यह राजनैतिक दासता का काल था। इसे हमें मानसिक दासता के रूप में स्वीकार नहीं करना चाहिए था लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित हुई। जब विधर्मियों से मुक्ति मिली तो हमें अपने स्वाभिमान की स्थिति में आ जाना चाहिए था। परंतु नहीं.! हम आजतक मानसिक दासता की मनःस्थिति में ही जी रहे हैं। हमें आज भी अपने किसी गौरव पर गर्व करने के लिए फिरंगियों के 'प्रमाणपत्र' की आवश्यकता होती है। यह चित्र श्री रत्नेश्वर मन्दिर की है जो भगवान शिव को समर्पित है। श्री रत्नेश्वर मन्दिर मणिकर्णिका घाट के निकट, वाराणसी, उत्तरप्रदेश में है। (चित्र - साभार) इसकी विशिष्टता है कि यह ९ डिग्री के झुकाव पर है।  इस मन्दिर की ऊँचाई ७४ मीटर है। अब इसकी तुलना में "पीसा की मीनार" से करें जो ५ डिग्री के झुकाव पर और ५४ मीटर ऊ...

सनातन धर्म और हम

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श्री गणपति भईया सदा से ही गजमुखी नहीं रहे हैं। वे भी सामान्य देव के जैसे ही रहे थे। जगतमाता पार्वती के द्वारा द्वार पर खड़े होकर रक्षा करने का आदेश और परमपिता भगवान महादेव का वहां आगमन होना। भगवान महादेव को प्रवेश द्वार पर श्री गणपति भईया द्वारा रोकना, प्रभु महादेव का क्रोधित होकर उनका मस्तक विच्छेद करना, यह संपूर्ण कथा समस्त सनातनी को ज्ञात है। श्री आदि गणपति, लंबोदर विनायक जी का यह संलग्न अनुपम छवि है। (चित्र - साभार) यह विग्रह आदि विनायक या नरमुख पिलैयार या मानवमुखी गणेश का विग्रह तमिलनाडु में स्थपित है। यह मुक्तिश्वर मन्दिर, तिलातर्पनापुरी (Thilatharpanapuri), तमिलनाडु में स्थित है। यह मन्दिर मायावरम तिरुवरूर मार्ग पर कथनूर के निकट स्थित है। गणपत्य एवं शैव श्रद्धालु बड़े ही भक्ति भाव से इस मन्दिर में पूजन अर्चन हेतु आते हैं। स्थानीय सनातनी लोगों में इस मन्दिर के प्रति प्रगाढ श्रद्धा एवं आस्था है। सभी सनातनी इनके दर्शन और आशीर्वाद से लाभान्वित होते हैं। दुर्लभतम सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय गणपति भईया 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🌺🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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सतयुग के द्वितीय चरण में देवताओं और असुरों ने यह निर्णय लिया कि समुद्र मंथन किया जाए। समुद्र मंथन हेतु मन्दार पर्वत को मथानी तथा नागराज वासुकी को नेती (डोरी) के रूप में प्रयोग किया गया। परन्तु मंथन में अवरोध उत्पन्न हो गया क्योंकि मथानी मन्दार पर्वत आधार विहीन होने के कारण टिक नहीं पा रहा था। समस्या के समाधान हेतु श्री हरि विष्णु ने कूर्म अवतार लिए। कूर्म (कच्छप) पर मथानी मन्दार पर्वत टिकाया गया और समुद्र मंथन आरम्भ हुआ। सर्वप्रथम मंथन से हलाहल विष निकला। विष के प्रचण्ड प्रभाव से कोलाहल मच गया, सम्पूर्ण सृष्टि जलने लगी। विष को स्वीकार करने कोई भी आगे नहीं आ रहे थे। अन्ततः परमपिता देवाधिदेव महादेव ने उस हलाहल विष का पान कर सृष्टि की रक्षा किए। हलाहल विष को प्रभु ने अपने कण्ठ में ही रोक लिए। विष के प्रभाव से उनका कण्ठ नील वर्ण का हो गया और वे नीलकण्ठ कहलाये। परन्तु विष के ताप ने भगवान शङ्कर को विह्वल किया और उस ताप की शान्ति के लिए जगतमाता पार्वती आगे बढ़ कर अपने कर स्पर्श से परमपिता को शीतलता प्रदान किए। इसी स्पर्शानुभूति की प्रक्रिया को सनातनी पूर्वजों ने सजीव चित्रण पाषण पर किए हैं। यह...

सनातन धर्म और हम

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देवभूमि उत्तराखंड का दृश्य वैसे भी दिव्य, मनोरम होते हैं। प्रकृति ने अपने सौंदर्य को हृदय खोल कर इस पवित्र भूमि को सौंपा है। एक ओर उत्तुंग शिखर से सुशोभित पर्वत राज तो दूसरी ओर कलकल बहती सरिता। एक ओर जैव विविधता से भरा पूरा क्षेत्र तो दूसरी ओर मंत्रों से गुंजायमान वातावरण। इसी पावन देवभूमि पर स्थित है श्री कल्पेश्वर शिवालय। श्री कल्पेश्वर (कल्पनाथ) मन्दिर देवाधिदेव महादेव को समर्पित हैं। श्री कल्पेश्वर मन्दिर में अनुपम शिवलिङ्गम स्थापित हैं। श्री कल्पेश्वर मन्दिर उर्गम गाँव, गढ़वाल जनपद, उत्तराखंड में स्थित हैं। (चित्र - साभार) श्री कल्पेश्वर मन्दिर विशाल झरने के निकट २२०० मीटर की ऊँचाई पर स्थित हैं। इस शिवालय को पञ्चकेदार का एक गुप्त अवयव माना जाता है। श्री कल्पेश्वर मन्दिर जोशीमठ से ३० कि. मी. की दूरी पर स्थित दर्शनीय पवित्र स्थल हैं। शिव भक्त यहाँ आकर दर्शन लाभ प्राप्त करते हैं और परमपिता भगवान शिव के आशीर्वाद अनुग्रह से अपना जीवन धन्य करते हैं। दिव्य सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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श्री हरि नारायण विष्णु जी की अनुजा देवी मीनाक्षी जी (पार्वती जी) का पाणिग्रहण श्री सुंदरेश्वर जी (महादेव जी) के साथ हुआ था। मान्यता है कि जिस स्थान पर यह विवाह सम्पन्न हुआ था वहाँ पर श्री मीनाक्षी सुंदरेश्वर मन्दिर स्थित है। यह श्री मीनाक्षी सुंदरेश्वर मन्दिर का एक दुर्लभ छायाचित्र है (१८७० ई.) (चित्र - साभार)। इस अनुपम चित्र में श्री हरि अपनी अनुजा माता मीनाक्षी का हाथ प्रभु सुंदरेश्वर को सौंप रहे हैं। श्री मीनाक्षी सुंदरेश्वर मन्दिर, मदुरै में स्थापित है। यह आर्यावर्त के दक्षिणी क्षेत्र का एक विश्वविख्यात मन्दिर है। किसी समय में इस मन्दिर की गणना विश्व के "सात आश्चर्य" में हुआ करता था। श्री मीनाक्षी सुंदरेश्वर मन्दिर अनुमानतः २५०० वर्ष से भी अधिक प्राचीन माना जाता है। गोपुरम के आसपास नगर बसे हुए हैं। मन्दिर के गर्भगृह में शिवलिङ्गम स्थापित हैं। यह मन्दिर समुच्चय १४ एकड़ के विस्तृत क्षेत्र में विस्तरित है। इस मन्दिर के ४५०० खम्भे हैं। इस मन्दिर में १४ अटारी बने हुए हैं। यह सनातन धर्म का अद्वितीय और अतुलनीय मन्दिर है। यह मन्दिर द्रविड़ वास्तुकला का अमूल्य धरोहर है। इस मन्दिर के...

सनातन धर्म और हम

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श्री हरि नारायण विष्णु के शेषशायी विग्रह रूप बहुतायत से देखने को मिल जाते हैं। पर श्री हरि नारायण के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम और माता सीता का विग्रह मन्दिरों में खड़े (उदग्र) रूप में ही पाए जाते हैं। किन्तु.. इस अनूठे मन्दिर में भगवान श्री राम शयन अवस्था में हैं। श्री अनन्त शयन रामन मन्दिर, कुरइंजीपडी, कड्डलोर, तमिलनाडु। (चित्र - साभार) यह मन्दिर सहस्र वर्ष से भी अधिक पुरातन माना जाता है। श्यामवर्णी पाषाण शिला से निर्मित इस विग्रह की छवि निराली है। इस मन्दिर में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम आदिशेष पर शयन कर रहे हैं और भगवती सीता बैठी हुई हैं। भगवान के इस इस विग्रह को स्थानीय लोगों द्वारा "शयन कोलम" कहा जाता है। स्थानीय लोगों में यह अतिप्रसिद्ध है और लोगों की इनके प्रति अखण्ड आस्था है। अपने अभीष्ट सिद्धि प्राप्त करने हेतु लोग दूर दूर से इनके दर्शन प्राप्त करने आते हैं। अनुपम सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय श्री राम🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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मलेशिया जो आज एक इस्लामी देश है, कभी यहाँ पर भी वेदों की ऋचाएँ गूँजती थी। कभी यहाँ के वायुमंडल "ॐ नमः शिवाय" के पंचाक्षरी मन्त्र से गुंजायमान होता था। कभी यहाँ भी घर घर में शिवपुराण का पाठ किया जाता था। हाँ, ये मलय देश सनातन धर्म संस्कृति परम्परा का पालन करने वाला देश था। आज भी इस देश के कन्दराओं में बने भित्तिचित्र इसे प्रमाणित करते हैं। ये भगवान शिव का नटराज रूप बटु कन्दरा में बना हुआ है। यह गुफ़ा मन्दिर, गोम्बक, सेलंगर, मलेशिया में स्थित हैं। भगवान शिव "नटराज" असुर अपस्मार (मूयालक) के ऊपर ताण्डव नृत्य में लीन हैं। (चित्र - साभार) उनके दाहिने हाथ में डमरु, बाएँ हाथ में अग्नि पात्र, दूसरा दायाँ हाथ अभय मुद्रा में है। भगवान शिव अपने दाहिने पाँव पर असुर अपस्मार पर संतुलन में हैं। ये हैं सनातन धर्म के महान धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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प्राचीन विश्व समुदाय शैव परम्परा से ही संचालित होते थे इसके प्रमाण सम्पूर्ण विश्व में दृष्टिगोचर होते हैं। भगवान शिव ही उनके आराध्य देव रहे हैं, अतः शिवलिङ्गम और शिव मन्दिरों का मिलना स्वाभाविक है। जावा, सुमात्रा, बाली, सभी सनातनी संस्कृति परंपरा के ही पुष्पित पल्लवित होते रहे थे। आज विश्व के सबसे बड़े इस.लामिक अनुयायी वाला देश इंडोनेशिया कभी सनातन संस्कृति परंपरा से ही संचालित था और वे अपने सनातन धरोहरों को आज भी सम्मान सहेज कर रखे हुए हैं। ये प्राचीनतम भगवान शिव का शिवालय जावा में हैं। इनका निर्माण काल बारहवीं शताब्दी निर्धारित किया गया है। यह मन्दिर मजपाहित (MAJAPAHIT) सनातनी साम्राज्य का एक अंश है। समय के झंझावातों को सह कर भी आज ये समस्त विश्व के समक्ष सनातन के जीवंत साक्ष्य प्रस्तुत कर रहे हैं। दुर्लभतम सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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हमारे सनातनी पूर्वजों ने मानव जीवन के सभी भावों को पाषाण पर जीवंत चित्रण किए हुए हैं। इस पाषण प्रतिमा में माता पार्वती व परमपिता शिव के मध्य अनुपम भाव सम्प्रेषण उकीर्ण किया गया है। इस प्रतिमा में दर्शाया गया है कि माँ पार्वती परमपिता शिव से रुष्ट हो गई हैं और परमपिता शिव मनुहार कर माँ पार्वती को मनाने रिझाने की चेष्टा में हैं। कितना अनुपम भावुकतापूर्ण जीवंत चित्रण है। यह उमा-महेश्वर प्रतिमा श्री सोमेश्वर मन्दिर, कुरुडुमले, कोलार जनपद, कर्नाटक का है। यह प्रतिमा चोल राजाओं द्वारा (चोल मन्दिर) ११वीं सदी में बनवाया माना गया है। अद्वितीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म और हम

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विश्व के WONDERS (वण्डर्स, आश्चर्य, अजूबों) की खोज कर सूची बनाने वाले को एक बार तो सम्पूर्ण आर्यावर्त का भ्रमण कर मन्दिरों, धार्मिक स्थलों, पुरातन स्मारकों, राजप्रासादों का उचित अवलोकन एवं मूल्यांकन कर सूची बद्ध करना चाहिए था।  परन्तु  वामजीवियों के निकृष्ट, घृणित सोच व छल कपट एवं षड्यंत्र के कारण यह हो न सका.!! अन्यथा WONDERS (वण्डर्स, आश्चर्य, अजूबे) की सबसे बड़ी संख्या आर्यावर्त से ही मिलता। ये हैं श्री वृहदेश्वर मन्दिर। देवाधिदेव महादेव को समर्पित है यह विराट मन्दिर। श्री वृहदेश्वर मन्दिर तंजावूर, तमिलनाडु में स्थित हैं। इस मन्दिर के निर्माण में चट्टानों को जोड़ने हेतु किसी भी प्रकार के गारे/सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया है। वास्तव में यह मन्दिर "interloking system" से बने मन्दिर का उत्कृष्ट कृति है। १,३०,००० टन भार के पाषाण शिलाओं का उपयोग इसे बनाने में किया गया है। भारत के छः बड़े भूकम्प को झेलने के बाद भी यह ज्यों का त्यों अपने स्थान पर सगर्व खड़ा है। १५०० वर्षों के झंझावातों को सहने के पश्चात भी यह अकल्पनीय वास्तुशिल्प अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ खड़ा है। इस मन्दिर के विमान ...

सनातन धर्म और हम

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कोई इस वास्तुशिल्प को दिखलाकर यदि आपसे यह पूछ बैठे कि यह संपूर्ण निर्माण कार्य किस पदार्थ पर किया गया है.?? तो कदाचित आप भी यही कहेंगे कि यह संपूर्ण निर्माण काष्ठ (लकड़ी) पर ही किया गया है। पर ठहरिए...!! एक क्षण सोचें यदि ऐसा नहीं हुआ हो तब....!?! भ्रमित हो गए ना.!! यह निर्माण वास्तव में काष्ठ (लकड़ी) नहीं पाषाण (पत्थर) पर किया गया है। हमारे सनातनी पूर्वजों की सम्पन्नता, भव्य वास्तुकला, उत्कृष्ट पाषाण शिल्प शैली, आश्चर्यजनक कल्पना, स्वर्गलोक सदृष्य सुंदरता का निश्छल प्रतीक रच दिया है। सनातन धर्म में अनन्य आस्था, अडिग विश्वास,  चरम भक्ति, और पवित्र उपासना के प्रतीक ये मंदिर सजीवता का प्रतिबिम्ब है। (चित्र - साभार) अचरज मत करें ये तो सनातन स्थापत्य शिल्पकला का छोटा उदाहरण है जो मिटा दिया गया है आपके इतिहास के पाठ्य पुस्तकों से वामियाें के षडयंत्र रचने के कारण और आपको हीन भावना से ओतप्रोत करने हेतु.!! काशीराज काली मन्दिर, बनारस। नगर की हृदय स्थली में शिव - शक्ति का वास, काशी राज परिवार का बनवाया माँ काली व पंचदेव का भव्य मन्दिर  गोदौलिया चौक के निकट ही पत्थरों से कलात्मकता के साथ...

सनातन धर्म और हम

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सत्य सदा ही कल्पना से भी विचित्र होता है..!!! अद्वितीय, अतुलनीय, अकल्पनीय..!!!! १५०० वर्ष पूर्व, ३०० वर्षों तक, २० पीढ़ियों ने पहाड़ को उपर से नीचे की ओर बढ़ते हुए क्रम में पत्थरों को काट - काट कर बनाया है यह "श्री कैलाश मन्दिर".! सामान्यतः किसी भी मन्दिर, भवन आदि का निर्माण आधार से शिखर की ओर बढ़ते हुए क्रम में किया जाता है। परंतु इस मन्दिर की ठीक इसके विपरित शिखर से आधार की ओर बढ़ते हुए क्रम में किया गया है। श्री कैलाश मन्दिर, वेरुल लेणी, सम्भाजी नगर, महाराष्ट्र। (चित्र - साभार) विश्व के किसी भी स्मारक से लाखों गुणा सुन्दर और आकर्षक है यह मन्दिर समुच्चय। सनातनी पूर्वजों के पाषाण शिल्प कला का अद्भुत उदाहरण है। संपूर्ण सनातन पौराणिक कथाओं के शिल्प निर्मित हैं इस मन्दिर में। इस मन्दिर में श्री हरि नारायण विष्णु अवतार, भगवान देवाधिदेव महादेव से लेकर रामायण, महाभारत आदि को भी मूर्तियों के रूप में दर्शाए गए हैं। यह सम्पूर्ण निर्माण जब आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं था तब का निर्माण है, वो भी १५०० वर्ष पहले का। बिना किसी विद्युत चालित यंत्रों के और बिना कंप्यूटर ग्राफिक्स की सहायता के, जो...

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श्री त्र्यंबकेश्‍वर मन्दिर.!!! नासिक, महाराष्ट्र। त्र्यंबकेश्‍वर ज्योर्तिलिङ्ग मन्दिर महाराष्ट्र-प्रांत के नासिक जनपद में त्र्यंबक गाँव में हैं। यहाँ के निकटवर्ती ब्रह्म गिरि नामक पर्वत से गोदावरी नदी का उद्गम है। गौतम ऋषि तथा गोदावरी के प्रार्थनानुसार भगवान शिव इस स्थान में वास करने की कृपा की और त्र्यंबकेश्‍वर नाम से विख्यात हुए। मन्दिर के अंदर एक छोटे से कुण्ड में तीन छोटे - छोटे लिङ्ग हैं। ये त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश - इन तीनों देवों के प्रतीक माने जाते हैं। गोदावरी नदी के किनारे स्थित त्र्यंबकेश्‍वर मन्दिर कृष्णवर्णा पाषाणों से निर्मित है। (चित्र - साभार) मन्दिर का स्‍थापत्‍य अद्भुत है। इस मन्दिर के पंचक्रोशी में कालसर्प शांति, त्रिपिंडी विधि और नारायण नागबलि की पूजा संपन्‍न होती है। इन क्रियाओं को भक्‍तजन विभिन्न मनोकामना पूर्ति हेतु करवाते हैं। इस प्राचीन मन्दिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था। इस मन्दिर का जीर्णोद्धार १७५५ में आरम्भ हुआ था और इकत्तीस वर्ष के लंबे अवधि के पश्चात १७८६ में सम्पूर्ण हुआ। कहा जाता है कि इस भव्य मन्दिर के...

सनातन धर्म और हम

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पर्वतीनन्दन षण्मुख का एक लोकप्रिय मन्दिर...!!! श्री कुक्के सुब्रमण्यम स्वामी मन्दिर।  यह मन्दिर सुब्रह्मण्या गाँव, दक्षिण कन्नड़ा जनपद, कर्नाटक में स्थित हैं। इस मन्दिर में भगवान श्री सुब्रमण्यम स्वामी (मुरुगन, कार्तिकेय) का पूजन उनके भ्राता श्री गणेश जी के साथ ही किया जाता है। (चित्र - साभार) इस मन्दिर में श्री गणपति की प्रतिमा उनके वाहन मूषक पर आरूढ़ निर्मित हैं। इस प्रतिमा के हाथ में बने नाग बन्ध पर ध्यान दें। कितना अनुपम और उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन है। महान सनातन धरोहर..!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय श्री गणपति विनायक🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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शास्त्र केवल पुस्तकों में ही नहीं मन्दिरों में भी गढ़े पड़े है। सनातन धर्म को मिटाने की इच्छा रखने वालों वामजीवियों को यह जान लेना चाहिए कि हमारा अस्तित्व मिटा पाना तुम्हारे लिए संभव नहीं है। तुमने इतिहास में अपने स्वार्थ अनुकूल परिवर्तन कर दिए, तब भी हमारा इतिहास और भविष्य इन मन्दिरों से निकल कर प्रमाण लेकर खड़ा है। यह श्री मीनाक्षी अम्माँ मन्दिर है। (चित्र - साभार) माना जाता है की यहाँ जगतमाता पार्वती जी और परमपिता भगवान शिव का विवाह हुआ था। यह मंदिर स्वयं देवराज इंद्र ने बनवाया था, और इसके निर्माण कर्ता स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा रहे हैं। इस मन्दिर में अब कुछ विशिष्ट बातें देखिये --  आधार से ऊर्ध्व की ओर.... त्रेतायुग के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी का चित्रण किया गया है। उसी में आप हनुमानजी की मूर्ति देखें। वे वानररूप में नहीं बल्कि मानव रूप में हैं। श्रीराम जी की धोती का रंग भी पीला है, पीला रंग सूर्य का प्रतीक है। श्रीराम सूर्यवंशी थे।🌞 द्वापरयुग के दूसरे अवतार श्रीकृष्ण हैं। श्रीकृष्ण के माथे पर चन्द्रमा विराजमान है, जो उनके चन्द्रवंशी अवतार होने के कारण है।🌙 लेकिन श्...

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ये भव्य अद्वितीय माँ महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा एक ही पाषण शिला से निर्मित है। इस प्रतिमा में माँ दुर्गा महिषासुर का वध कर रही हैं। माँ महिषासुरमर्दिनी के प्रतिमा को अष्टभुजी बनाया गया है। माँ अम्बे अपने त्रिशूल से महिषासुर का वध कर रही हैं जो महिष से उत्पन्न होता निर्मित किया गया है। यह गङ्ग राजवंश, ओडिशा का तेरहवीं सदी का निर्माण निर्धारित किया गया है। (चित्र - साभार) इसकी प्रतिमा का जीवंत अंगविन्यास, आभूषणों का अति जटिल और सूक्ष्म नक्काशी देखने पर रोमांच उत्पन्न करते हैं। सर्व ज्ञात है कि ग्रेनाइट सबसे कठोर चट्टान है तो इस महीन नक्काशी को किन यन्त्रो द्वारा किया गया होगा जब कि उस समय लेज़र तकनीक का आविष्कार नहीं हुआ था, आश्चर्यजनक है न.!! हाँ, इतना तो है कि इसे छेनी हथौड़ी से नहीं बनाया गया होगा। महान सनातनी शिल्पकारों के कला निपुणता पर गर्व है। दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना है कि अब यह खंडित है। महान सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय माँ अम्बे दुर्गा 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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आर्यावर्त का प्राचीन वैदिक सनातन संस्कृति का वास्तुशिल्प, स्थापत्य कला और पाषाण शिल्प कला सम्पूर्ण विश्व में अकल्पनीय और अतुलनीय रहा है। इनकी आज जो अनुकृति भी बनाई जाती है वह भी अद्भुत और अतुलनीय ही प्रतीत होती है। क्योंकि एक ओर तो रेगिस्तान वाले जहाँ १९३० ई. तक (जब तक वहाँ खनिज तेल नहीं मिला था) सब बद्दू था तो दूसरी ओर पश्चिम वाले जो १८६० ई. से पहले जिनका शिक्षा का कोई संस्थान ही नहीं था। और जिन्होंने जितने भी नवाचार/अनुसंधान/शोध का दावा करते हैं वास्तविकता में वह कोलोनियल एरा में आर्यावर्त से लूटे गए पांडुलिपियों का कीर्तिचौर्य ही रहा है, धीरे धीरे यह बात प्रमाणित भी होती जा रही है। यह अलौकिक नयनाभिरामी मन्दिर समुच्चय सोफॉलोक चार धाम नामची, सोफॉलोक, सिक्किम में स्थित है। यह सम्पूर्ण स्थली देवाधिदेव महादेव को समर्पित है। यहाँ सभी १२ (बारह) ज्योतिर्लिंगों की अनुकृति और चार धाम की प्रतिकृति ७ (सात) एकड़ के विस्तृत भूभाग पर निर्माण किया गया है। यहाँ का मुख्य आकर्षण भगवान शिव जी का २७ मीटर ऊँचा विग्रह है जो मुख्य मन्दिर के शिखर पर ध्यानस्थ बैठे हुए हैं। विश्व भर के सनातनी धर्मावलंबी इस मनो...

सनातन धर्म और हम

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हमारे सनातनी पूर्वजों ने कितने श्रमसाध्य शिल्पकारी को इतने कुशलता और निपुणता पूर्वक अपने इतिहास को पाषाण पर मूर्तियों/चित्रों के रूप में लिख दिया है जो यह किसी अन्य किताबी मज.हब में देखने को नहीं मिलता है। इस पाषाण कृतियों को देखकर वामियों/भीमटों का यह दुष्प्रचार कि ब्राह्मणों ने अन्य जातियों को धर्मग्रंथों को पढ़ने से वंचित रखा था, भी खंडित हो जाता है। इस मूर्ति को ज़ूम कर ध्यानपूर्वक देखें.!! (चित्र-साभार) इसमें रामायण (अरण्यकाण्ड) के एक कथा का सम्पूर्ण चित्रण किया गया है। अब विचार करें कि यदि ब्राह्मणों ने अन्य जातियों को धर्मग्रंथ नहीं पढ़ने दिया तो इस सनातनी शिल्पकार ने इतने विस्तार पूर्वक वर्णन सहित इस प्रतिमा का निर्माण किस प्रकार किया.?? क्योंकि प्रत्येक छोटी छोटी बातों को इतने सटीकता से ग्रँथ को पढ़े बिना निर्माण करना असंभव है। इस चित्र में कबन्ध (अर्थात धड़ नेतृत्वहीन) दानव के प्रभु श्री राम के हाथों मुक्ति की कथा को चित्रित किया गया है। कबन्ध दानव वास्तव में एक गन्धर्व था। उसका नाम विश्ववासु था। यह श्री नामक अप्सरा का पुत्र था। विश्ववासु ने अपने तपश्चर्या द्वारा सृष्टिकर्ता ब्रह्...