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Showing posts from April, 2023

सनातन धर्म

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आज कल मिक्स ब्रीड गैंग जातिप्रथा को येन केन प्रकारेन अनुचित सिद्ध करने को भिन्न भिन्न प्रकार के कुतर्क दे रहा है और विष्टावमन किए जा रहा है। पर यह नहीं देखता कि जातिप्रथा ही वह प्राथमिक रक्षा पंक्ति रहा है जिन्होंने सदा से विधर्मियों के आक्रमण अत्याचार का मुंह तोड़ प्रत्युत्तर देते रहा है और सनातन संस्कृति परंपरा का रक्षा किया है। यह गैंग वैभवशाली जातिप्रथा के शौर्यपूर्ण कीर्तिमानों को झुठलाने का हर संभव प्रयास कर रहा है, परंतु यह निरर्थक ही सिद्ध होगा। ऐसा ही वैभवशाली इतिहास टांगीनाथ धाम मन्दिर का रहा है। मान्यता है कि संलग्न चित्र में जो त्रिशूल - परशु है वह श्री हरि नारायण के षष्ठ आवेशावतार श्री परशुराम जी के द्वारा धँसाया गया है। (चित्र - साभार) झारखंड के गुमला जनपद में भगवान परशुराम का यह तपस्थली रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान परशुराम ने यहाँ देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न करने हेतु घोर तपस्या की थी।  यहीं उन्होंने अपने परशु को भूमि में गाड़ दिया था। इस परशु की ऊपरी आकृति कुछ कुछ त्रिशूल से मिलती है। इसी कारण यहाँ सनातनी श्रद्धालु इस परशु की पूजा के लिए आते है। परम् पिता ...

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कोई कितना भी निपुण शिल्पकार हो,  बिना आस्था, भक्ति और समर्पण के ऐसा सृजन असम्भव है। यह अद्वितीय, अतुलनीय, अद्भुत श्री बालाजी वेंकटेश्वर भगवान का विग्रह शिल्पकार के आस्था भक्ति और समर्पण का कथा स्वयं कह रहे हैं। यह भक्ति, आस्था और समर्पण सनातन धर्म के अतिरिक्त और किसी "किताबी" में हो ही नहीं सकता। श्री बालाजी व्यंकटेश का विग्रह सूरजकुण्ड, फरीदाबाद। शिल्पकार के श्रम और कला के प्रति समर्पण सोचकर ही रोमांच की अनुभूति होती है। (चित्र - साभार) लौटें अपने सनातन संस्कृति की ओर। विस्मयकारी सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय श्री व्यंकटेश्वर 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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माँ आदिशक्ति का इस पावन धाम में माँ पाताल-भैरवी के रूप में पूजी जाती हैं। यह स्थल तांत्रिक साधना हेतु जागृत सिद्ध शक्ति-स्थल है। सुदूर क्षेत्रों से तांत्रिक अपने तन्त्र साधना के लिए और माँ के अनुग्रह/आशीर्वाद से अभीष्ट सिद्धि प्राप्ति हेतु यहाँ आते हैं।(चित्र-साभार) यह स्थल श्री बर्फानी धाम के नाम से विख्यात हैं। श्री बर्फानी धाम, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़। माँ पाताल-भैरवी अपने दिव्य चतुर्भुजी रूप में यहाँ विराजमान हैं। माँ के हाथों में खड्ग, त्रिशूल, खप्पड़ और मुंड सुशोभित हैं। वैभवशाली सनातन धरोहर..!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय माँ पाताल भैरवी 🙏🌺 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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कोई भी मनुष्य जब शिव-भावनामृत का पान कर लेता है तो वह परमानन्द की स्थिति प्राप्त कर लेता है। सनातन धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करने से चारो पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सुफल होते हैं। उस समृद्धि में भक्त अपने आराध्य देव के निमित्त समर्पण भाव से जो भी करते हैं वह निष्काम कर्म ही है। सुदूर मॉरीशस की धरती पर शिव भक्त "घुनोवा परिवार" ने अरबों की राशि व्यय कर अद्भुत दर्शनीय स्थल का निर्माण करवाया है। यह स्थल भक्ति और पर्यटन दोनों ही में लोकप्रिय है। मॉरीशस के "GOYAVE DE CHINE, POSTE DE FLACQ, Mauritius" टापू पर एक दर्शनीय शिव मन्दिर का निर्माण २००७ में करवाया गया है। इस सौंदर्यपूर्ण मन्दिर का नाम "सागर शिव मन्दिर" है। सागर शिव मन्दिर में परमपिता त्रिशूलधारी शिव का १०८ फीट का विराट काँस्य प्रतिमा स्थापित किया गया है।(सभी चित्र-साभार) सागर शिव मन्दिर वनस्पतियों और खाड़ी के प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा हुआ है। मॉरीशस के तीन प्रमुख दर्शनीय सनातनी मन्दिरों में से एक यह टापू पर स्थित है। सागर शिव मन्दिर मॉरीशस के पूर्वी भाग में सनातनियों का अतिलोकप्रिय मन्दिर है। लौटें ...

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ये हैं भारत के सनातन धर्म की अकल्पनीय कलाकृतियाँ व वास्तुशिल्प। रानी जी की बाव (बावड़ी), पाटन, गुजरात। रेगिस्तानी पशुओं के झुंड और फिरंगी आक्रांताओं ने भारतवर्ष में प्रवेश किया और सनातन वास्तु और शिल्पकला को  तहस-नहस कर दिया। इस दुनिया के सात अजूबों का नाम रखने वालों ने कभी रानीजी की बावड़ी की यात्रा नहीं की। जल की शुद्धता को उजागर करने वाले एक उल्टे मंदिर के रूप में निर्मित किया गया यह बावड़ी  सनातनी पूर्वजों की अद्वितीय कृति हैं। (चित्र - साभार) यह मूर्तिकला पैनलों के साथ सीढ़ियों के ७ स्तरों में विभाजित है। यह  ६४ × २० × २७  घन मीटर के माप में है। रानीजी की बावड़ी गुजरात के पाटन में स्थित एक अनूठा कूआँ है, जो सरस्वती नदी के तट पर स्थित है।  इस बाव के भीत पर श्री हरि नारायण के दशावतारों को जीवंत मूर्तियों के रूप में गढ़ा गया है। इसके निर्माण का श्रेय सौराष्ट्र के खेंगारा की बेटी "देवी उदयमाती" को दिया जाता है, जो ग्यारहवीं शताब्दी के चौलुक्य वंश की रानी और भीम प्रथम की पत्नी हैं। धन्य हैं वो सनातनी वास्तुकार/शिल्पकार जिन्होंने इन्हें इसका निर्माण कार्य किए। और धन...

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जिन्होंने विश्व के धरोहरों को सूची में केवल सात आश्चर्य (अजूबों/WONDERS) बनाया है उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष के भवनों का भ्रमण ही नहीं किया है अन्यथा यह मूढ़तापूर्ण निर्णय नहीं किया होता। ये हैं भारतवर्ष के विभिन्न राज-प्रासादों के झरोखे जिनके अतुलनीय सूक्ष्म कलाकृतियों को देख कर ही अचंभित हो जायेंगे। जब झरोखे की शिल्पकला इतनी उत्कृष्ट है तो सम्पूर्ण राजप्रासाद और भवनों के सौन्दर्य की कल्पना स्वयं कर सकते हैं। और हाँ.!! यह कृति बिना किसी कंप्यूटर ग्राफिक्स या लेज़र गाइडेड टेक्नोलॉजी के मध्यकालीन राजप्रासादों में शिल्पकारों ने अपने हाथों से निर्मित किया गया है। पंरतु हाय रे सनातन संस्कृति का दुर्भाग्य.....!! यह विडम्बना ही है कि इसी भूमि में जन्मे मैकाले व मैक्समूलर के वामपंथी मानसपुत्र इतिहासकार ने आर्यावर्त के वैभवशाली इतिहास को ताजमहल से आरंभ कर कुतुबमीनार पर समाप्त कर दिया। धन्य है सनातनी पूर्वज जिन्होंने इसे निर्मित किया है। अकल्पनीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा ...

सनातन धर्म

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प्रभु!!! आप ही ब्रह्माण्ड के परम् धाम हैं.!! आप आदि, मध्य और अंत से परे हैं.!! आपकी महिमा अपरम्पार है.!! सनातनी इस संसार में जहाँ भी रहे हैं अपने आराध्य देव के लिए सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं। उन्होंने अपने प्रभु के सौन्दर्यपूर्ण मन्दिरों का निर्माण करवाया है। इस मन्दिर को देखकर आपको यह भान होता होगा कि यह आर्यावर्त के दक्षिणी क्षेत्र में कहीं स्थापित हो सकता है। परन्तु नहीं, ऐसा नहीं है.!! यह द्रविड़ शैली में निर्मित मन्दिर आर्यावर्त से सुदूर समुद्र पार के देश में है। यह मन्दिर भगवान नारायण को समर्पित है। यह अद्भुत मन्दिर 10530 Troy Ln N, Maple Grove, MN 55311, United States में स्थित है।(चित्र-साभार) वैभवशाली विश्व सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म 🙏🚩 जय श्रीमन्नारायण🙏🌺 जय महाकाल 🙏🌺🚩 #प्रेमझा

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कौथलम की दिव्यता न्यारी है......!!! प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर दृश्य मन को सम्मोहित कर लेते हैं। कौथलम में ऊँचाई पर से जलप्रपात का जल अपने में वनस्पतियों के औषधीय गुणों को समेटे हुए सतत गिरते रहते हैं। यह क्षेत्र पुष्प पौधों के सौन्दर्य से इंद्रलोक की प्रतीति कराते हैं। कौथलम महान ऋषि अगस्त्य का तप क्षेत्र रहा है। ऋषि अगस्त्य ने इस स्थान पर ध्यान और तपश्चर्या कर इस अलौकिक " श्री सिद्धेश्वरी पीठम" का स्थापना प्राचीन वैदिक काल में किए थे।(चित्र-साभार) यह दुर्लभतम शिवलिङ्गम अपने आप में ही अनूठा प्रमाण हैं। श्री सिद्धेश्वरी पीठम का पवित्र स्थल कोर्टल्लम, तिरुनेलवेली जनपद, तमिलनाडु में स्थित है। श्री सिद्धेश्वरी पीठम धार्मिक महत्व के साथ-साथ एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल के रूप में लोकप्रिय है। परमपिता देवाधिदेव महादेव अपना अनुग्रह आशिर्वाद भक्तों को सुख समृद्धि संपदा आरोग्य ऐश्वर्य प्रदान करने हेतु निरन्तर प्रदान करते रहते हैं। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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गन्धार नरेश, द्यूत व्यसनी, कुटिल शकुनि का मन्दिर और वह भी भारत में....!! आश्चर्य हो रहा है न....!! किन्तु इसी प्रकार की असामान्य विचारों के कारण ही इस देश को विविधता वाला देश कहा जाता है।(एकता की बात नहीं कर रहा) यह मन्दिर इस बात का प्रमाण है कि इस देश के जहाँ अच्छाई का पूजन किया जाता है वहीं दूसरी ओर छल-कपट को भी पूजा जाता है। मान्यता है कि द्वापरयुग में शकुनि ने यहीं एक ग्रेनाइट चट्टान पर बैठकर भगवान महादेव को प्रसन्न करने हेतु तपस्या किया था। कहा जाता है कि इसी ग्रेनाइट चट्टान से शकुनि की प्रतिमा को बनाया गया है। (सभी चित्र-साभार) मायामकोट्टु मालांचारुवु मालानाड़ा मन्दिर शकुनि को समर्पित है। यह मन्दिर पवित्रेश्वरम में कोट्टाराक्का के निकट, कोल्लम जनपद, केरल में स्थित है। केरल वह राज्य जहाँ एक ओर भगवान नारायण का विश्व विख्यात श्री पद्मनाभस्वामी मन्दिर, तथा अखण्ड ब्रह्मचारी भगवान अयप्पा स्वामी का श्री सबरीमाला मन्दिर है तो दूसरी ओर कपटी शकुनि का मन्दिर भी यहीं है। एक समुदाय जो अपने को कौरवों के वंशज मानता है, इस स्मारक में पूरी दृढ़ता, समर्पण और भक्ति से पूजन करता है। आश्चर्यजनक धरोहर.....

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पवनसुत आञ्जनेय के भक्तों ने अपने आराध्य देव का विग्रह अपनी श्रद्धा और भावनाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों में बनाए हैं। यह दुर्लभतम विग्रह भी अपने अंदर वैसे ही विलक्षणताओं को समाहित किए हुए हैं। इस विग्रह का निर्माण और स्थापना श्री व्यासराजा द्वारा करवाया गया था (१४६०-१५३९ ई.)। इस अनुपम विग्रह को "अवतारताराय-आञ्जनेय" के रूप में जाना जाता है। (चित्र-साभार) यह अद्वितीय विग्रह नव-वृंदावन, हम्पी, कर्नाटक (जो तुंगभद्रा सरिता के निकट एक द्वीप है) पर स्थापित हैं। इस अद्भुत विग्रह में तीन युगों के सनातनी अवतारों को अत्यंत सौंदर्यपूर्ण रूप में दर्शाया गया है। १. इनकी मुखाकृति अतुलितबलधामं, श्रीराम भक्त हनुमानजी के रूप में हैं। त्रेतायुग। २. इनकी भुजाएँ महाबली, गदाधारी कौन्तेय भीम के रूप में हैं। द्वापरयुग। (पुष्ट-बाहु/कंधे पर ध्यान दें)। ३. इनके कर में सुशोभित ग्रँथ-पांडुलिपियाँ, श्री माधवाचार्य जी के रूप में हैं। कलयुग। श्री आञ्जनेय अपने विरल रूप में भक्तों के मध्य अत्यंत लोकप्रिय हैं। अद्वितीय सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय श्री आञ्जनेय महावीर हनुमान जी 🙏🌺 जय महाकाल🙏🔱🚩 #...

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जब देवी माँ शुम्भ-निशुम्भ से युद्धरत थीं तो सभी देवों ने अपने स्त्री-शक्ति को देवी माँ की सहायता के निमित्त भेजे थे। ये स्त्री-शक्ति "सप्त मातृकाएँ" कहलाती हैं। ये देव ब्रह्मदेव, श्री विष्णु, देवाधीदेव महेश्वर, देवराज इन्द्र, षण्मुख कुमार, वाराह देव एवं नृसिंह देव हैं। सप्त-मातृकाओं में सात देवियाँ :- ब्रह्माणी, वैष्णवी, माहेश्वरी, ऐन्द्री, कौमारी, वाराही एवं नृसिंही हैं। इनके अतिरिक्त श्री विनायक अपने स्त्री शक्ति "विनायकी" को भेजे थे। सप्त-मातृकाओं में से एक माँ वाराही की यह अनुपम दुर्लभतम चतुर्भुजी प्रतिमा है। माँ वाराही भगवान नारायण के वाराह अवतार की स्त्री-शक्ति हैं। यह मनमोहिनी वाराही प्रतिमा श्री एकम्बरेश्वर मन्दिर के मण्डपम में निर्मित हैं। (चित्र-साभार) श्री एकम्बरेश्वर मन्दिर परमपिता भगवान महादेव को समर्पित है। श्री एकम्बरेश्वर मन्दिर प्राचीन काँची नगर, तमिलनाडु में स्थित हैं। इस वाराही प्रतिमा में सनातनी शिल्पकारों की कला निपुणता स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। माँ वाराही की मुखाकृति, वस्त्र, आभूषण, शस्त्र, एवं हस्त-मुद्रा में सनातनी शिल्पकारों की दक्षता और कल...

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यह नटराज की प्रतिमा अपने आप में कुछ विशिष्टता समेटे हुए हैं(चित्र -१)। नटराज की यह दुर्लभतम प्रतिमा कश्मीर संग्रहालय, कश्मीर में संरक्षित है। (चित्र-साभार) सामान्यतया प्रचलित नटराज की प्रतिमा(चित्र - २) अधिकांशतः देखने को मिलते हैं। इस प्रतिमा (जिन्हें "अंजली मुद्रा" कहा जाता है) में भगवान शिव के बाएँ हाथ में अग्नि जो संहारक शक्ति है। और सृष्टि के संहार और आवधिक विखंडन के पश्चात श्री ब्रह्मदेव को नई सृष्टि रचना के लिए आमंत्रण के संकेत हैं। दाएँ हाथ में डमरू जो अनाहत नाद व सृष्टि के स्पंदन के प्रतीक हैं। इनके पाँव के नीचे दानव 'अपस्मार' दबा हुआ है। जिसके सभी दानवी शक्तियों के दलन उपरांत भगवान शिव स्वयं संतुलित हैं। एक पाँव उठा हुआ है तो प्रकृति के सतत अग्रसर रहने की प्रवृत्ति को इंगित करते हैं। परन्तु इस चित्र - १ में भगवान शिव के दोनों पाँव ऊर्ध्व दिशा में हैं। इनके बाएँ हाथ के नीचे दानव 'अपस्मार' दबा हुआ है। अद्भुत, अनुपम, अनूठा प्रतिमा...!!! अप्रतिम सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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वैष्णव मन्दिरों में मन्दिर के मुख्य द्वार पर दोनों ओर द्वारपाल बने हुए होते हैं।  संलग्न चित्र में द्वारपाल श्री चेन्नाकेशवा मन्दिर, बेलूर और श्री होयसलेश्वर मन्दिर, हलेबीदु, कर्नाटक के हैं।(सभी चित्र-साभार) इन मूर्तियों के निर्माण की जटिलता को ध्यान से देखें.!!! शिल्पकारों ने अपने सम्पूर्ण कला को इन पाषाण खण्डों में उड़ेल कर विश्व के समक्ष प्रस्तुत कर दिया है। परन्तु, इस देश में सदियों तक उन अनाम सनातनी शिल्पकारों को सराहना और सम्मान से वामजीवियों के द्वारा वंचित रखा गया। सनातन धर्म के इन द्वारपालों के सम्बंध में अद्भुत पौराणिक कथा है। ये द्वारपाल जय और विजय श्री नारायण भगवान के निवास स्थान बैकुण्ठ के मुख्य द्वार पर रहते हैं। ये श्री विष्णु के अनन्य भक्त हैं। बैकुण्ठ शास्वत आनन्द का सर्वोच्च स्थान है। एक बार श्री ब्रह्मदेव के पुत्र सनकादिक ऋषि भगवान विष्णु से मिलने बैकुण्ठ गए। जय और विजय ने उन्हें बैकुण्ठ में प्रवेश नहीं दिया और ऋषि का उपहास करते हुए अपमानित कर दिया। ऋषि ने कुपित होकर जय विजय को पत्थर हो जाने का श्राप दे दिया। श्री लक्ष्मी जी और श्रीमन्नारायण के आग्रह पर ऋषि ने उनक...

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श्री परशुरामेश्वर मन्दिर सनातनी वास्तुशिल्प और स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। श्री परशुरामेश्वर मन्दिर देवाधिदेव महादेव को समर्पित है। श्री परशुरामेश्वर मन्दिर आर्यावर्त के कलिंग वास्तुकला के प्राचीन संरक्षित मन्दिरों में से एक है। श्री परशुरामेश्वर मन्दिर, भुवनेश्वर, ओडिशा में स्थित है। इस मन्दिर का निर्माण शैलोद्भव काल के सातवीं शताब्दी में माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण ६५० ई. में नागर शैली में किया गया है। इस मन्दिर में एक अद्भुत सहस्रलिंग शिवलिङ्गम स्थापित है। एक ही शिवलिङ्गम में सहस्र लिङ्ग समाहित हैं। इस मन्दिर के शिल्पकलाओं को देखकर अचंभित रह जाएँगे। आप इसमें निर्मित लघु मूर्तियों, ज्यामितीय संरचनाओं, पुष्पों आदि को देखकर यह सोचने को बाध्य होंगे कि सहस्रों वर्ष पूर्ण जब आधुनिक तकनीक उपलब्ध नहीं था तो सनातनी पूर्वजों ने इतने सम्पूर्णता से इसे कैसे निर्मित किए होंगे.!!(चित्र-साभार) यह अद्भुत शिल्पकला अब कहाँ लुप्त हो गए.?? धन्य हैं इनके निर्माण कर्ता और धन्य हैं वे शिव भक्त शासक जिन्होंने इन्हें बनवाया और कलाकारों को संरक्षण प्रदान किए। वैभवशाली सनातन...

सनातन धर्म

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सनातनी पूर्वजों के लिए धर्म का स्थान सर्वोपरि रहा था। अपने आराध्य देव के प्रति आस्था और समर्पण उच्चतम स्तर पर होने से ऐसा अकल्पनीय शिल्प का निर्माण सम्भव हो पाया। ये मूर्ति श्री चेन्नाकेशवा मन्दिर में स्थित हैं। Zoom करके देखने पर इसमें कोई भी १" ईंच का भाग भी बिना नक्काशी के नहीं है। ध्यान रहे... यह सम्पूर्ण निर्माण बिना किसी विद्युत चालित यंत्रों के स्वहाथों से ही किया गया है। उस लुप्त पाषाण वास्तुशिल्प विधा के बारे में सोचकर ही मन पुलकित हो जता है, रोमांच से भर जाता है। किन्तु दुर्भाग्य से विधर्मियों ने उन दिव्य ज्ञान से परिपूर्ण पुस्तकालयों नालंदा विश्वविद्यालय को जला कर समाप्त कर दिया। उस ज्ञान की विलुप्ति मात्र सनातनियों का ही नहीं अपितु समस्त मानव समुदाय का अपूर्णीय क्षति है। इसे देखकर शिल्पकार के परिश्रम और समर्पण के प्रति आदर से मस्तक झुक जाता है। महान सनातनी पूर्वजों का अद्वितीय निर्माण...!! वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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सृजनात्मकता का उच्चतम स्तर क्या हो सकता है यह जानना है तो सनातन संस्कृति के शिल्पकला को देखें.!! किसी भी शिल्प को मूर्तरूप देने से पूर्व उसका एक कल्पित चित्र मस्तिष्क में बनाना ही होता है। इस शिल्प को देखें...!! यह सनातनी शिल्पकार पूर्वजों के हाथों निर्मित एक अद्वितीय रचना है। जिसे आज कागज पर उकेरना भी असम्भव ही प्रतीत होता है उसे हमारे सनातनी पूर्वजों ने पाषाण, धातु, हाथीदाँत पर गढ़ कर विश्व को सौंप दिए हैं, वह भी सहस्रों वर्ष पूर्व ही। श्री रंगनाथस्वामी मन्दिर, श्रीरंगम के गोपुरम का यह लघु रूप हाथीदाँत पर निर्मित किया गया है। (चित्र-साभार) यह शिल्प वर्तमान में सैनफ्रांसिस्को के ऐशियाई संग्रहालय के कला संकाय में सुरक्षित है। ध्यान से इस शिल्प को देखें, कितनी निपुणता से प्रभु शेषशायी, शेषनाग, देवी देवताओं, गणों, ऋषियों, तोरणों, आभूषणों, अलंकरणों, मन्दिर इत्यादि को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया है। क्या किसी किताबी पंथ में ऐसा अद्भुत सृजन देखने को प्राप्त होता है.?? नहीं, कहीं नहीं.!! पुनः लौटें सनातन संस्कृति परम्परा की ओर.!! कथित आधुनिकता ने केवल आपसे छीना ही है, दिया कुछ नहीं.!! अकल...

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वामजीवियों का कहना है कि आर्यावर्त में "सुई" का भी निर्माण नहीं होता था जबतक कि विधर्मी म्लेच्छों और आँग्ल फिरंगियों ने इस देश में पैर नहीं रखा। उन सनातन द्रोहियों के लिए तो इस पवित्र भूमि पर हर ओर प्रमाण बिखरे पड़े हैं जो किसी "थप्पड़" के जैसे ही उनके मुखमण्डल को रक्तिम करने को पर्याप्त हैं। परन्तु निर्लज्ज को लाज कहाँ आता है। इस नयनाभिरामी वास्तुशिल्प को देखें..!! यह अद्भुत निर्माण आठवीं शताब्दी का माना जाता है। इसे पाण्ड्य शासकों ने बनवाया था, किन्तु किसी अज्ञात कारणवश यह अपूर्ण ही रह गया, कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं कर पाया। यह देखने पर किसी पुष्पित-पदम्-पुष्प (कमल के फूल) के सदृश लगता है। इसका निर्माण शैली महाराष्ट्र के अजन्ता कन्दराओं में बने कैलाश मन्दिर से मिलता है। यह अविश्वसनीय श्री वेत्तुवन कोइल मन्दिर, कलुगुमालाई, तमिलनाडु में स्थित है। (चित्र-साभार) तमिलनाडु के थूतुकुड़ी पहाड़ी के एक अखण्ड ग्रेनाइट पाषाण शिला को काटकर यह मन्दिर सृजित किया गया है। इसे देखकर ही उस समय के सनातनी वास्तुशिल्प के तकनीकी उत्कृष्टता का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। इसमें बने सूक्...

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एक बार दृष्टि घुमा कर तो देखें........ चहुँ ओर वैदिक सनातन संस्कृति के प्रमाण विद्यमान मिलेंगे। यह सृष्टि शिव से आरम्भ हो कर शिव में ही विलीन हो जाती है। देवालय और मन्दिर सनातनियों के मात्र पूजन स्थल ही नहीं थे अपितु धार्मिक/सांस्कृतिक/समाजिक क्रिया कलापों के महत्वपूर्ण कर्मस्थल थे। आज वर्तमान में भले ही हम कथित आधुनिक शिक्षा से प्रभावित होकर मतिभ्रम में उन देवालयों मन्दिरों को केवल धार्मिक पूजन स्थल मान बैठे हैं। सुदूर विदेशी भूमि पर एक अद्भुत मन्दिर को देखें..... बाली के सनातनियों का अद्भुत मन्दिर जिसे "स्वर्ग का द्वार" कहा जाता है। (चित्र - साभार) "पुरा लेम्पयांग मन्दिर" बाली, इंडोनेशिया। पुरा लेम्पयांग मन्दिर अमेद से आध घण्टे की दूरी पर स्थित है जो पूर्वी बाली का सबसे लोकप्रिय समुद्रतटीय नगर है। यह पेनतारण लेम्पयांग के नाम से भी जाना जाता है। पुरा लेम्पयांग मन्दिर माउण्ट लेम्पयांग की तराई में बना अतुलनीय संरचना है और दर्शकों को सम्मोहित कर लेता है। विश्व के भव्यतापूर्ण सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल 🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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चित्र - १ और चित्र - २ को Zoom करके ध्यान से देखें.....!!! चित्र - २ को विश्व का बच्चा - बच्चा जानता है। जितनी चर्चा विश्व में इस चित्र की होती है किसी दूसरे की नहीं होती है। अब चित्र - १ की बात करें तो विश्व समुदाय की तो बात ही छोड़िए यहां इस देश के आधिकांश जनसामान्य भी इस चित्र से अनभिज्ञ हैं। जबकि इस चित्र को यदि तुला के एक पलड़े पर रखें और विश्व के सभी चर्चित वस्तुओं को दूसरे पलड़े पर तो इस चित्र का पलड़ा ही झुका मिलेगा। ऐसा क्यों हुआ है.??? इसका सबसे बड़ा कारण हमारे सनातनी पूर्वजों के बनाए धरोहरों से हमारा मुंह मोड़ लेना और एक तिरस्कार वाली मानसिकता ही है। हम अपने अद्वितीय सनातन धरोहर को न तो संरक्षित कर पाए और ना ही इसे विश्व में प्रदर्शित कर पाए। दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना है ना..... क्या अपने धर्म संस्कृति परंपरा के प्रति हमारा कोई उत्तरदायित्व नहीं है.??? क्या इन धरोहरों के वैभवशाली इतिहास को जनसामान्य पहुंचाना हमारा कर्तव्य नहीं होता है.??? आइए मिलकर एक प्रयास तो करें.....!!! जिन्होंने भारतवर्ष के सनातन संस्कृति के अद्भुत मन्दिरों का भ्रमण कर दर्शन ही नहीं किया उनके लिए भारतीय वा...

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धर्म बिना जग सूना संतो... धर्म बिना जग सूना...!!! वैदिक काल से सनातन संस्कृति में "धर्म" का स्थान सर्वोपरि रहा है। परंतु कथित आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण में "धर्म" को सबसे अंतिम श्रेणी में रखने के कारण हिनूओं की अवनति/अधोगति हुई। "सिकुलरिज्म" जैसा संक्रामक रोग हिनू को छोड़ कर किसी भी अन्य पंथ/मजहब में नहीं देखने सुनने को मिलेगा। सनातनियों ने अपने कल्पना को सदा धर्म के दृष्टिकोण से सार्थक किया है और अकल्पनीय, अद्भुत, अनमोल, अद्वितीय शिल्प का निर्माण किये हैं। ऐसा ही एक अनूठा निर्माण यह श्री हरिहर धाम मन्दिर है। यह मन्दिर गिरिडीह, झारखंड में स्थित हैं। श्री हरिहर धाम मन्दिर देवाधिदेव महादेव को समर्पित हैं। यह मन्दिर एक शिवलिङ्गम के आकार में निर्मित है। इस शिवलिङ्गम रूपी मन्दिर की ऊँचाई ६५' फीट है। यह शिव भक्तों के लिए दर्शनीय स्थल हैं। वैभवशाली सनातन धरोहर...!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

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परम् पिता देवाधिदेव महादेव, सर्वशक्तिमान, सर्वग्राही, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी हैं। यह चराचर जगत उन्हीं के अनुकम्पा से चलायमान है। वे जब तक नहीं चाहेंगे तब तक किसी भी वस्तु का विनाश सम्भव ही नहीं है। हिमाचल प्रदेश में कहीं यह अतिप्राचीन शिव मन्दिर इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। (चित्र - साभार) जब लौकिक जगत की माया में उलझ कर सबों ने इस शिवालय को छोड़ दिया तो प्रकृति स्वयं इसे अपने अंक में भरकर इसे संरक्षित कर दिया है। अब तो इस विशाल वृक्ष के जड़/तना ही इस शिवालय के भीत और छत हैं। अनुपम शिवलिङ्गम मन्दिर में स्थापित हैं और अपने दिव्य तेज से वातावरण को प्रकाशित कर रहे हैं, अपना आशीर्वाद सबों पर बरसा रहे हैं। बाहर नन्दी महाराज भी प्रतीक्षारत हैं। कितना दिव्य अलौकिक दृश्य है। दुर्लभतम सनातन धरोहर....!! जय सनातन धर्म🙏🚩 जय महाकाल🙏🔱🚩 #प्रेमझा

सनातन धर्म

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सम्पूर्ण विश्व में सनातन धर्म संस्कृति के वैभवशाली देवालयों, धर्म स्थलों का निर्माण सनातनी धर्मियों द्वारा कहीं ना कहीं सतत चलता रहता रहा है। एक ओर जहां विधर्मी अपने जन्मप्रदत्त द्वेष एवं शत्रुता में सनातनी देवालयों धर्म स्थलों को अपवित्र और विध्वंस करता रहा है तो दूसरी ओर सनातन धर्मी अपने सृजनशीलता से पुनर्निर्माण में लगे हुए रहे हैं। यह अवश्य ही दूर्भाग्यपूर्ण रहा कि मध्यकाल में अपने देवालयों धर्म स्थलों के सुरक्षा संरक्षा में चूक हुई और असंख्य अकल्पनीय धरोहरों को सनातनियों ने खो दिया। इस वैभवपूर्ण श्री स्वामीनारायण मन्दिर समुच्चय, निसडेन, लंदन को जूम करके देखें...!! आप इसके सौन्दर्य से सम्मोहित हो जाएंगे...!! चमत्कृत हो जाएंगे...!! मन और दृष्टि इसे निहार कर ठहर जाएंगे...!! यह मन्दिर निसडेन मन्दिर के नाम से विख्यात है। यह मन्दिर सनातन पारम्परिक आराधना स्थल के पूर्णतः वैदिक वास्तुशास्त्र के नियमों के आधार पर निर्माण किया गया है। इस मन्दिर में श्री उमा - महेश्वर, श्री राधे - कृष्ण, श्री सीता - राम, श्री गणपति भईया, श्री आञ्जनेय महावीर, श्री स्वामीनारायण जी आदि मनमोहक रूप में स्थापित है...